व्यंग्य
भारतवर्ष के कालखंड में 10 वर्षों के कलयुगीन यूपीए काल की कथा और उसकी स्मृतियाँ

यह कलयुग के एक कालखंड की कथा है। देश का इतिहास युगों पुराना है। द्वापर युग, त्रेतायुग, सतयुग और फिर कलयुग। यह कथा कलयुगीन यूपीए काल की है। भारतवर्ष के इतिहास में यह कालखंड 10 वर्ष का था। इस काल में अनेक नायक अवतरित हुए। वे अनेक प्रकार के कौशल दिखाते थे। यह अलग-अलग दिशाओं से अलग-अलग ध्वजाओं वाले भिन्न-भिन्न वैचारिक समूहों से चुनकर आए नायक थे, जो राष्ट्र की राजधानी में एकत्रित हुए थे।

इनके बीच आकर्षक संधियाँ थीं। संधि ने ही एकता के सूत्र बांध दिए थे। अदृश्य संधि धन और साधनों पर अपना एकाधिकार करने की थी। सबने अपनी सुविधा से अपनी सुदृढ़ स्थिति राजधानी से लेकर दूर अपने प्रांतों तक बना ली थी। चूँकि कोई भी बहुमत में नहीं था इसलिए बीस अल्पमत मिलकर बहुमत के गणित की सिद्धि प्राप्त कर चुके थे। यह ऐसा ही था जैसे एक पैर के 10 लोग मिलकर पाँच पूरे होने का अंक विजयी मुद्रा में बताएँ।

देश की स्वतंत्रता के आंदोलन में कुछ के योगदान थे। वे गर्व से इसे दोहराते रहते थे। दोहराते हुए ही उन्हें 70 साल हो चुके थे। यही एकमात्र उनकी पूंजी थी। सबकी सुविधा में ही सबकी सुविधा थी। इसलिए असुविधाजनक कुछ भी नहीं था।

सबसे ऊँची राजा की कुर्सी पर एक ऐसे मौन साधक को बैठा दिया गया था, जो इस पूरे कालखंड में निर्विकल्प समाधि में ही रहा। सुख, दुख, पीड़ा, शुभ, अशुभ कुछ भी हो, उसके चेहरे पर कभी कोई भाव आते ही नहीं थे। वह उतना ही बोलता, जितना सबके लिए सुविधाजनक हो। जो सबके लिए सुविधाजनक था, वही राजा के लिए सुविधाजनक था। एक जनाधारविहीन राजा के लिए लगातार दो शपथ के अवसर मानव योनि में आने के लिए पर्याप्त कारण थे।

राजा के सारे मंत्री महारथी थे। बड़े खिलाड़ी थे। सत्ता के एकाधिकारी थे। वे ऐसे राज कर रहे थे कि अब कभी सिंहासनों से उतरेंगे नहीं। वे ऐसे चलते थे कि धरती पर उनका ही साम्राज्य हो। वे धीरे-धीरे उच्छृंखल होते गए। यह गुन-गुने पानी की तरह बढ़ते तापमान सरीखा था। तब देश ने कई तरह के घोटालों के नाम सुने। यूपीए के कुछ शक्तिशाली सामंतों के नाम प्राचीन ग्रंथों में इस प्रकार अंकित हैं-

केसर प्रधान कश्मीर से आचार्य अब्दुल्ला अपने सुयोग्य सुपुत्र के साथ तीन पीढ़ियों से सत्ता के हिंडोले पर घाटी की मनोरम जलवायु में विचरण कर रहे थे…

काशी-मथुरा-अयोध्या के सबसे विशाल प्रांत से दो समूह बारी-बारी से केंद्र में संतुलन बनाए रखते थे। यदुवंश के समस्त पुरुष पात्र एक समूह में अपना वर्चस्व बनाए हुए थे, जो अवसर आने पर महामुनि लोहिया की विचारधारा की ध्वजा हाथों में फहराते दृष्टिगोचर हो उठते थे…

नीली ध्वजाओं वाला दूसरा समूह मनुवादियों को दिन-रात अपशब्द कह-कहकर सुदृढ़ हुआ था। इसकी कमान एक प्रचंड देवी के हाथाें में थी, जो समारोहों में मुद्राओं के हार पहनती, भव्य महलों में विराजती, लिखा हुआ ही पढ़ती और दलित-दमित समुदाय की देवी कहलाते हुए आनंदविभोर हाेती…

अशोभनीयता की सीमा तक आपस में जमकर युद्ध मचाने वाले उत्तर प्रांंत के ये दोनों दुर्दांत समूह राजधानी में यूपीए का अंग थे। अपने-अपने सेनापतियों की संख्या के हिसाब से सत्ता में अपना हिस्सा कब्जाकर आनंदपूर्वक आवागमन करते थे। उल्लास मनाते थे। उत्सवपूर्ण जीवन का आनंद लूटते थे।

मगध में एक ऐसा ही शक्तिशाली योद्धा अपनी विशुद्ध देहाती वेशभूषा और ध्यानाकर्षण करने वाली भाषा सहित सदन में बैठता। उसके परिवार में पत्नी, बेटे, बेटी, साले सबके सब सत्ता के शिखरों पर रहने के लिए जन्में थे। ये अनूठे वाक् चातुर्य के साथ राजधानी में शोभायमान थे। वातावरण में हँसी के ठहाके जहाँ आवश्यक हों, यही श्वेत केशधारी योद्धा खैनी चबाते हुए एक वक्तव्य देता और अगले दिन समाचार माध्यमों के शीर्षक इसी के नाम चमचमाते। यही राष्ट्र की सेवा थी।

दक्षिण में शिवगंगा की रूखी-सूखी भूमि से एक धवल धारा निकली थी और यूपीए कालखंड के दस वर्षाें में चिदंबरम के प्रसिद्ध नटराज मंदिर जैसी चमकी थी। वे पिता-पुत्र बहुत शक्तिशाली थे। अत्यंत प्रभावशाली थे। बड़े निर्णय करते थे। निडर होकर करते थे। ऐसे करते थे जैसे अनंतकाल तक करते रहेंगे और कोई उनका स्थान नहीं लेगा।

अलग-अलग प्रांतों के ये सब समूह अल्पसंख्यक नाम के देश भर में फैले एक विशाल जाति समूह को प्रसन्नचित्त बनाए रखने के लिए किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार रहते। इन्होंने उस कालखंड में एक अद्भुत शब्द का आविष्कार किया था, जो ये ईश्वर प्रदत्त उपाधि की तरह अपने साथ जोड़कर रखते थे। उत्खनन में अब तक प्राप्त शिलालेखाें में वह शब्द है- सेक्युलर

10 वर्षों तक इन सब समूहों ने मिलकर देश को एक ऐसे प्रीतिभोज में बदल दिया था, जहाँ सब देश को ही चरने लग गए थे। यूपीए का केंद्र बिंदु एक ऐसा परिवार था, जिसके संचित पुण्य कब के समाप्त हो चुके थे। इस परिवार का देश के इतिहास में जितना योगदान था, उससे कई गुना ज्यादा जोता जा चुका था। प्राचीन प्रतिष्ठा की खुरचन पर परिवार का आश्रय अवशेष था।

एक माँ थी। एक बेटा था। बेटी का ब्याह हो चुका था। वह ससुराल में थी। ससुराल मायका एक ही था। उसका नाम यूपीए था। इसमें एक दामाद भी था, जिसकी अपनी शौर्य पताकाएँ थीं। हर तरफ के चुके हुए चाटुकारों ने राजधानी के जनपथ की एक शासकीय इमारत को अपना खूँटा बना लिया था, जहाँ से बंधे रहकर वे आनंदपूर्ण मुद्रा में जुगाली करते रहते थे। चूँकि उनकी अपनी शक्ति शून्य की सीमा तक सीमित हो चुकी थी। वे एक धुआँ छोड़ती मशाल रह गए थे। दस अंधेरे मिलकर एक उजाले का गणित सिद्ध कर रहे थे।

उस मधुर और कालातीत युग में मखमली टोपियाँ इफ्तारी के जलसों की रौनक हुआ करती थीं। वे एक बनी बनाई लीक पर चलते थे। सबकी लीक अपनी सुविधा से तय थी। एक को किसी दूसरे से कोई समस्या नहीं थी क्योंकि दूसरे को पहले वाले से कोई संकट नहीं था। अपनी लीक पर चलते हुए कोई दूसरे की लीक को काटता नहीं था। सेकुलर होना उनके स्वभाव का साझा लक्षण था।

इन समूहों का न्यूनतम साझा कार्यक्रम था लुटियंस के भव्य परिसर में आयोजित पंगत अर्थात् प्रीतिभोज में बैठना। बैठने के बाद बैठे ही रहना। हिलमिलकर बैठना। पत्तल में प्रस्तुत स्वादिष्ट व्यंजनों का आनंद लेना। इस आनंद को अगली पीढ़ी को अपने जीते-जी सौंपते हुए पंगत में स्वयं भी बैठे रहना। सत्ता के आनंद को शाश्वत बनाने के प्रयास निरंतर करना। तो कश्मीर से लेकर मगध तक हर समूह का प्रमुख अपनी अगली पीढ़ी को भी यूपीए के आनंददायी युग में देश के सम्मुख प्रस्तुत करता जा रहा था। देश भी मुग्ध मन से पंगत को निहारने में लगा था।

माँ ने बेटे को तैयार किया। बेटे के माथे पर मुकुट रखा और मुख पर प्रसन्नता छा गई। बेटे को प्रसन्न देखकर माँ कितनी प्रसन्न होती होगी, कल्पना के परे है। प्रजा ने संकेत कई बार दिए कि पुत्र की प्रकृति पंगत के अनुकूल प्रतीत नहीं होती। किंतु माँ तो माँ होती है। उसका हृदय अपार होता है। वह हर स्थिति में संतान का सुख ही चाहती है।

पुत्र ऐसा निर्दोष और निश्छल था कि उसे अपने होने, न होने का कोई भान ही नहीं होता था। माथे पर मुकुट सजा दिया है तो उसे लगा कि वह इसी का अधिकारी है। जन्मजात अधिकारी। उसे कोई संवाद लिख देता। वह हाथ हिलाते हुए पढ़ देता। वह इसे ही राष्ट्रनायक बनने की कसौटी मानकर चलता रहा।

न जाने किस घड़ी उसके माथे पर मुकुट रखा गया था। 10 साल का कालखंड पूर्ण हुआ तो प्राचीन वल्लभी और प्रभासपट्‌टन प्रांत से दो विकट योद्धा राजधानी में आ गए। 10 वर्षों से चल रहा आनंद उत्सव अब उठने को हुआ। पंगत उजड़ गई। किसी चमत्कार की भाँति वे योद्धा प्रकट हुए थे और उनके आते ही सारे प्रांतीय समूह बिखर गए। सबकी ध्वजाएँ धूल-धूसरित हो गईं। मखमली टोपियाँ वायु वेग में समा गईं। दृश्य बिल्कुल विपरीत हो गया। इसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी।

पशु आहार प्रेमी मगध का राजा कारागृह में जा पहुँचा। उसकी अयोग्य संतानें अलग-अलग कारणों से यश कमाने लगीं…

कश्मीर के पिता-पुत्र कंपित घाटी का शोर सुनने के लिए शेष रह गए। तीसरी पीढ़ी का राजयोग बाधित हो गया…

उत्तर प्रांत की महादेवी के अनुज की महासंपत्ति ने दमित-दलितों के नेत्र चौंधिया दिए…

उत्तर प्रांत के ही यदुवंशी आपस में लड़-भिड़कर सिकुड़-सिमटने लगे…

दक्षिण के चमचमाते चिदंबरम को समाचार माध्यमों ने भगोड़े की संज्ञा दी। प्रहरी एक दिन उन्हें भी पकड़ लाए…

मध्यप्रांत के एक राजा को एक साध्वी ने युद्ध के मैदान में पराजित कर दिया…

सब सत्ता से खदेड़ दिए गए। पंगत की पत्तलें चारों तरफ बिखर गईं। आसन उजड़ गए। व्यंजनों की सूची का विमोचन हो गया। चंद चाटुकारों के अतिरिक्त जनपथ की खूंटी से रस्सी छुड़ा-छुड़ाकर भागने वालों की लंबी कतार देखी गई।

एक दिन माँ-बेटे शून्य में ताकते हुए सदन में एकाकी थे। यूपीए का स्वर्णिम कालखंड उनकी स्मृतियों में चमक रहा था। किंतु नेत्रों के समक्ष सिवाय अंधकार के और कुछ सूझ नहीं रहा था। बेटा अपने माथे पर टटोल रहा था। मुकुट कहीं खो गया था। संभवत: सदा के लिए…

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं व वे कई पुरस्कारों से सम्मानित हैं। स्वराज्य के सहयोगी लेखक।