व्यंग्य
व्यंग्य- राहुल गांधी के सपनों का भारत

कहते हैं कि जब तक आपके सपनों का मज़ाक नहीं उड़ाया जाता तब तक आपके सपने इतने बड़े नहीं हैं। और इसलिए राहुल गांधी का इतना उपहास होने के बाद भी वे अपने सपनों को प्रत्यक्ष रखने से ज़रा भी नहीं कतराते हैं।

बात सही भी है, जब तक सपने देखेंगे नहीं तब तक पूरे कैसे होंगे? लेकिन क्या आप जानते हैं कि राहुल गांधी का सबसे बड़ा सपना क्या है? उनका सपना है भारतीय संस्थानिक व्यवस्था को सुदृढ़ करना। यह विचार 2014 के बाद से शुरू हुआ क्योंकि इससे पहले कांग्रेस की सरकार थी तो उन्हें सपने देखने की आवश्यकता नहीं थी।

राहुल गांधी का मानना है कि भाजपा और संघ ने भारतीय संस्थानिक व्यवस्था को अपंग कर दिया है। लेकिन यही अपंगता उन्हें नेहरू और इंदिरा गांधी के काल के लिए महसूस नहीं होती। सही भी है, अपनी विरासत का अपमान तो नहीं किया जा सकता। और इस सम्मान को बचाने के लिए गांधी ने 1984 के सिख दंगों में कांग्रेस की भूमिका तक को नकार दिया।

अब राहुल गांधी के सपनों के भारत में प्रवेश करते हैं- लोगों के पास रहने-खाने के उपयुक्त साधन नहीं हैं लेकिन लोग गरीब भी नहीं हैं क्योंकि उनके अनुसार गरीबी मात्र एक मनोवृत्ति है। और उनकी कांग्रेस सरकार ने लोगों के मन से इस मनोविकार को सफलतापूर्वक मिटा दिया है।

देश की सुरक्षा को किसी प्रकार का खतरा नहीं है। किसी भी विदेशी आक्रमण से पहले ही हम छोटा-सा भूभाग देकर झगड़े का निपटारा कर देते हैं। सीमा पर लड़ रहे जवानों का प्रोत्साहन राहुल गांधी अपने ‘धोका-लाम’ जैसे बयानों से करते हैं। इसके साथ ही वायु सेना भी सबल हो गई है क्योंकि पड़ोसी देश (फ्रांस) में गांधी के ननिहाल (इटली) ने सिफारिश लगाकर राफेल विमान अत्यंत कम दामों पर अपने नातिन को दिलवा दिया है।

हर तहसील में एक फैक्ट्री लग गई जहाँ वे ‘मेड इन…’ के स्टिकर छापते हैं और चीन से सामान खरीदकर उस पर दनादन चिपकाकर बेचते हैं। अब दलित इस धरती पर नहीं रहते हैं क्योंकि वे जूपीटर की एस्केप वेलॉसिटी से पृथ्वी को छोड़कर कहीं और जा बसे हैं।

इसी बीच धनतेरस का त्यौहार आया और गहने खरीदने के लिए महिलाओं ने बाज़ारों की बजाय खेतों की ओर रुख किया। वहाँ उन्होंने ज़मीन से आलू निकाला और ‘राहुल गांधी प्रधानमंत्री योजना’ के तहत लगी हुई मशीन से सोना पाकर खुशी-खुशी घर लौट गईं।

लेकिन यह क्या लंदन में 25 अगस्त 2018 को राहुल गांधी ने कहा था कि वे प्रधानमंत्री बनने का सपना नहीं देख रहे हैं, जब यह सपना ही नहीं देखा तो उपरोक्त सपने कैसे पूरे होंगे?

यह व्यंग्य हल्के मन से पढ़ने के लिए है। इसका उद्देश्य किसी का अपमान करना नहीं है।