व्यंग्य
हिंदी दिवस समारोह में ‘वेलकम’, कुछ उर्दू शेर सुनते जाइए- सिरफिरों का सप्ताहांत

आशुचित्र- भारत सरकार हिंदी दिवस का आयोजन कर सरकारी खर्च से निर्धन हिंदी लेखकों के लिए चाय एवं समोसे की व्यवस्था करके हिंदी की सेवा करती है।

अहा मित्र, शुभ दिन आया, कैसा मनोरम दिवस है आया। नगर में महामारी की बंद खुल रही है। जो बंद तंग पतलून के रूप में प्रारंभ हुआ था, वह अब लुंगी का स्वरूप धारण कर चुका है। कहने को बंद है परंतु होने को खुला है। सुंदरियाँ गोलगप्पे के विरह का भवसागर पार करके पुनः स्वाद के सुख का आनंद प्राप्त कर रही हैं। गोलगप्पे खाती युवतियों को ताड़ने हेतु युवाओं के मतवाले समूह सड़कों पर उतर गए हैं, अहो मित्र वातावरण काव्यात्मक हो गया है।

ठेले वाले सड़क पर हैं, पुलिस वाला उसपर से केले उठा कर खा रहा है, अहो मित्र, भारत अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है। राष्ट्र ने अंततः कोरोना को कह दिया है कि बहुत हुआ सम्मान, तुम्हारी ऐसी तैसी। मदिरालय पुनः खुल गए हैं, और मंदिर- मस्जिद में मेल कराने के कार्य में व्यस्त हो गए हैं।

सौभाग्य रहा तो पुस्तकालय भी खुल जाएँगे। मदिरालय से मंदिर मस्जिद का मेल ही नहीं होता, सरकार को कर प्राप्त होता है, पुस्तकालय से कर नहीं प्राप्त होता, नागरिक ज्ञानी होते हैं और जैसा सुधि पाठक जानते हैं, ज्ञान से ही दुख होता है। अज्ञान में ही आनंद है। इस अज्ञान को बनाए रखने के लिए प्राचीन रोम में युद्ध एवं खेल कराए जाते थे, आधुनिक लोकतंत्र में टीवी चैनल पर समाचार चलाए जाते हैं।

ऐसे भावपूर्ण, सुरम्य वातावरण में 14 सितंबर का दिन आता है, जिसे हम हिंदी दिवस के रूप में मनाते हैं। इस दिन हिंदी पर व्याख्यान दिए जाते हैं, हिंदी के महात्म्य पर वार्ताएँ आयोजित की जाती हैं। गणमान्य अतिथि हिंदी की प्रतिष्ठा में बड़े-बड़े भाषण देकर भारत-भारती में हिंदी को उसके योग्य सम्मान के स्थल पर पहुँचाने का प्रण लेते हैं।

राज्य के राजभाषा विभागों पर चमकीले कागज़ों को काट कर ‘वेलकम टू हिंदी दिवस समारोह’ लिखा जाता है। नेताजी शराब के व्यापारी द्वारा प्रायोजित पुरस्कार कलेक्टर साहब की कवियित्री पत्नी को प्रदान करते हैं। समारोह में प्रथम पंक्ति पर बैठे अंग्रेज़ी के लेखक ‘रामा, कृष्णा और अर्जुना’ के देश में हिंदी के पतन पर चिंता प्रकट करते हैं।

मुशायरों से भगाए हुए शायर उन्नत ग्रीवा को बल दे-देकर उर्दू शायरी का पाठ करते हैं, द्वितीय पंक्ति पर बैठे कन्याओं को ऑटोग्राफ देते हुए नई-हिंदी के ध्वजावाहक युवा लेखक को देखकर भावपूर्ण शेर प्रस्तुत करते हैं। मूर्धन्य लेखक महोदय को साहित्य पर संभाषण देने एवं नए लेखकों का मार्गदर्शन करने हेतु आमंत्रित किया जाता है। मूर्धन्य लेखक उद्घोषक के शब्दों एवं सभा के संदेश से विचलित हुए बिना नोटबंदी, फासीवाद, उग्र हिंदुत्व तथा राष्ट्र में बढ़ती असहिष्णुता पर बोलते हैं।

साहित्य से इतर सब विषयों पर बोलने के पश्चात जब तक वे बैठते हैं, कॉफी का समय आ जाता है। नए हिंदी लेखक अपनी कृतियाँ लेकर उनके पास जाते हैं तो वे उनमे चंद्रबिंदुओं की त्रुटियाँ बताकर भाव-भंगिमा से उन्हें पशु विकास एवं मुर्गीपालन जैसे क्षेत्र में अपनी प्रतिभाओं का उपयोग करने के मूक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। नए कवियों को वे अपने पद्म पुरस्कार से सम्मानित ‘ब्रेड, चूहा और फ्रिज’ नामक काव्य संकलन पढ़कर अपने कवित्त को सुधारने का ज्ञान देते हैं। कन्याओं का निरंतर स्नेह नई हिंदी के सुदर्शन लेखक की ओर देखकर उनके हृदय में वैसे ही बहुत पीड़ा होती है।   

जब उनके राजनीति-निष्ठ भाषण, उर्दू शायर की उर्दू-निष्ठ शायरी के बाद नई हिंदी के लेखक का भाषण प्रारंभ होता है तो वरिष्ठ साहित्यकार का दुख अंतिम सीमा तक पहुँचने लगता है। नया सितारा स्टेज पर पहुँचकर भाषण देता है और रोब की भाषा में सभा को संबोधित करता है।

साहित्य की परिभाषाओं को तोड़ता सितारा जब स्वैग के साथ मंच पर उतरता है, वरिष्ठ साहित्यकार अपने सत्ता को खिसकता हुआ पाते हैं। इसी द्वंद्व में वे अंग्रेज़ी में लिखे हुए उस लेख को अपने फ़ोन से ही समाज के साथ साझा करते हैं जिसमें लेखक के अनुसार हिंदीवाद से मैथिली, मगही, अवधी, भोजपुरी जैसी भाषाओं पर प्रकोप मंडरा रहा है। नेताजी के कर कमलों से साहित्यकार जी के कर कमलों में एक नारियल एवं एक शाल चला जाता है, अंतिम पंक्तियों पर बैठे हिंदी लेखक, कवि एवं पाठक फोम के बने चाय के कप को किनारे रखकर करतल ध्वनि से सभा को गुंजायमान करते हैं।

क्षिण भारत में दो-तीन विज्ञापन जिनमें नीचे कहीं कोने में हिंदी-देवनागरी  में शब्द लिखे होते हैं, जिनके दर्शनमात्र से स्वाभिमानी दक्षिण-भारतीयों के नेत्रों में मोतियाबिंद गिर गया होता है, उन्हें कालिख से पोतकर क्षेत्रीय संस्कृति की रक्षा की जाती है। सरकार उन्हें आश्वासन देकर हिंदी थोपे जाने के भय से मुक्त करती है, ताकि वे अंग्रेज़ी और उर्दू पढ़कर अपने राज्य के गौरवशाली इतिहास की रक्षा कर सकें।

रूसी वामपंथियों के नाम पर अपनी संतानों के नाम रखकर क्षेत्रीय राजनीति के पुरोधा क्षेत्रीय संस्कृति की रक्षा करते हैं। आम जनता को क्षेत्रीय भाषा के सेवा करने का दैवी दायित्व सौंपकर अपने बच्चों को अंग्रेज़ी शिक्षा देते हैं। जब सारा समाज संस्कृति, भाषा और साहित्य की सेवा करके पुण्य कमाएगा तब सत्ता के  संचालन जैसे तुच्छ एवं हेय कार्यों के लिए आत्मलिप्सा एवं स्वार्थ-विहीन ये महामानव अपने संतानों को अंग्रेज़ी जैसी भाषाओं के ज्ञान प्राप्त करने उसी प्रकार में लगा देते हैं जैसे महादेव ने देवों को अमृत दे कर स्वयं विष का पान किया था।

इस प्रकार प्रत्येक वर्ष भारत सरकार हिंदी दिवस का आयोजन करती है और सरकारी खर्च से निर्धन हिंदी लेखकों के लिए चाय एवं समोसे की व्यवस्था करके हिंदी की सेवा करती है। सभा का समापन ‘रेस्पेक्टेड गेस्ट्स’ को धन्यवाद और एक भारतेंदु जी के विगत 70 वर्षों के हिंदी दिवसों में घिसे हुए हिंदी दोहे- निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटे न हिय के सूल– साथ होता है। लेख में चाय समोसे का प्रबंध तो संभव नहीं है परंतु स्वराज्य के आप सभी पाठकों को हिंदी दिवस की समोसा-विहीन बहुत शुभकामनाएँ, अगले वर्ष पुनः इसी विषय पर इसी चर्चा की आशा के साथ।