व्यंग्य
चुनावी रंगों से होली का ‘खेला होबे’: रंगासियारों से इस बार जनता खेलेगी फाग

जो नेता पाँच वर्षों तक एक-दूसरे को अपनी-अपनी राजनीतिक शुचिताओं की शाल ओढ़ाते रहते हैं, उनका चुनावी रंगों में “खेला होबे” जैसी हुंकारें भरना रंगासियारों की चेतावनी से ज्यादा कुछ नहीं है।

शायद वे आचार संहिता की मजबूरी में जनता को पूरी तरह से अंधा-बहरा समझ लेते हैं! वह कहते हैं न कि “सब लत अच्छी पर गफलत खराब।” पर जनता भी इस मौसम में ‛खेला होबे’ के लिए मन बना ही लेती है। उसे पता है कि पाँच वर्ष बाद मिले इस एकमात्र अवसर पर लोकतंत्र को आत्मनिर्भर भी तो बनाना है और होली का रंगारंग मजमा भी तो जमाना है!

चुनावी रंगों व होली की हुड़दंग में वही जनता नेताओं को लोकतंत्र का टीका लगाने के लिए अपने क्षेत्र में क्वारन्टाइन कर ही देती है। नेता आचार संहिता में अपना आचरण स्वच्छ भारत अभियान की तरह चमकाना चाहता है, पर हार की घबराहट से राजनीतिक चरित्र कई बार दम तोड़ ही देता है।

कभी वह अपनी कौम की कसमें खाता है, तो कभी अपने तथाकथित धर्म-जाति की अफीम व विदेशी रंग जनता पर अपनी धर्मनिरपेक्षता की पिचकारी से छिड़कता है। वहीं कभी नोट के बदल वोट, तो कभी साड़ी, टीवी, बाईक के बदले वोट का ‛खेला होबे’ खेलता है। वह लोकतंत्र को खेल समझने की गफलत कर बैठता है और फिर हार का ठीकरा ईवीएम पर फोड़कर पाँच वर्ष के लिए घर बैठ जाता है।

“जनता जब भी मन बनाती है तो अपने ही मन की बात सुनती है।” वैसे भी आजकल “आपको केवल हाथों को लहराते हुए और बड़े वाहनों में सड़कों पर चलते हुए वोट नहीं मिलते हैं।” सोशल मीडिया पर ऊंगलियाँ भी संभालकर चलाना होती है और बड़ी गाड़ी से नीचे उतरना भी पड़ता! “बाहें चढ़ा-चढ़ाकर भाषण देने से कुछ नहीं होता है।” बाहें चढ़ाकर झाड़ू पकड़कर वोट बटोरने के स्वच्छता अभियान में कूदना भी पड़ता है।

जनता का आदर्श रंग पाँच वर्षों का हिसाब-किताब एक घड़ी में कर देता है। लेकिन अब भी बहुत से राज दरबारी नेताओं की राजनीति में “लोकतंत्र कभी-कभी गूंगी कब्बड्डी खेलते हुए या फिर कभी कभी लंगड़ी घोड़ी जैसे खेल खेलते हुए अपनी परिभाषा से भटक जाता है।”

इस ‛चुनावी रंग’ में लोकतंत्र भी रंगरेज हो जाता है! और फिर वही लोकतंत्र जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए से अलग किसी खास व्यक्ति का, किसी विशेष परिवार का, किन्हीं प्रभावशाली व्यक्तियों और समूहों का उन्हीं के लिए चुना गया विधिगत शासन रंगा बन जाता है!

धीरे-धीरे यह लोकतंत्र प्रजातांत्रिक मधुर स्वर की जगह दरबारी राग बेसुरे आलाप लेने लगता है! कहाँ तो उम्मीद यह थी कि लोकतंत्र के मधुर स्वरों से जनकल्याण की महफिलें जवां रहेंगी ! जनता विकास का फाग खेलेगी। पर दरबारी गाते-गाते ऊलजलूल बकने लगते हैं!

और फिर परिणाम में सत्ता के दरबारी रागों व रंगों के कारण सारे ‛रॉन्ग नंबर’ ईवीएम में घुस जाते हैं। और अंत में बेचारी ईवीएम पर ‛नाच न आए तो आंगन टेढ़ा की’ तरह ठीकरा फोड़ ही दिया जाता है।

आखिर में इस चुनावी रंग में जो मैदान मारता है, वही माननीय हो जाता है! उसे ही हम सफेदपोश माननीय मान बैठते हैं। पर वही रंगरेज जनता को रंगता रहता है। जनता अपना मत देकर मन मारकर अगले पाँच वर्षों की लोकतांत्रिक फाग यात्रा पर निकल जाती है। और अंत में चुनावी रंग का परिणाम सिर्फ़ अकादमी ओटलों व टीवी चैनलों की पिचकारियों से निकलकर देश की हवाओं में पाँच वर्षों तक सराबोर रहता है।