व्यंग्य
शिक्षा नीति से विद्या की अर्थी उठाने वाले ‘सिरफिरे’ ढपलीधारी विद्यार्थियों का क्या होगा!

प्रसंग- ‘सिरफिरों के सप्ताहांत’ में नई शिक्षा नीति के विश्लेषक बने व्यंग्यकार।

विश्व में दो प्रकार के विशेषज्ञ होते हैं, एक वह जो विश्व को दो वर्गों में विभाजित करते हैं, दूसरे जो नहीं बाँटते। जानकार बताते हैं कि वर्तमान व्यवस्था में पहले प्रकार के विशेषज्ञ का स्कोप अधिक होता है।

व्यंग्यकार की विशेषज्ञ होने की औकात होती है ही सुरविन्यास। इसलिए एक व्यंग्यकार जब विशेषज्ञ की खाल ओढ़ता है तो उसे प्रथम प्रकार का विशेषज्ञ बनना चाहिए ताकि वह एक विशेषज्ञ एवं विश्लेषक के रूप में चहुँओर सम्मान प्राप्त कर सके, कम से कम तब तक जब तक उसके व्यंग्यकार होने का रहस्य संसार में प्रकट हो जाए। इस बीच यदि एकाध सेमिनार में स्थान प्राप्त हो जाए तो और उत्तम।

भारत संभावनाओं से भरा देश है, यहाँ स्वास्थ्य विशेषज्ञ के रूप में पिछली सरकार को सलाह एवं साधुवाद देने वाली तथा वर्तमान सरकार की आलोचना करने वाली प्रखर पत्रकार महोदया की शिक्षा आलोचनात्मक माध्यम और सांस्कृतिक दर्शन या क्रिटिकल मीडिया एवं कल्चरल स्टडीज़ में प्राच्य एवं अफ़्रीकी शिक्षा के केंद्र से इंग्लैंड में हुई है।

विदेश से तो जो भी कुछ भी पढ़कर आ जाता है उसे हमारे देश में ज्ञानी मानने की ऐतिहासिक परंपरा रही है। इसी परंपरा के तहत हम लंदन से द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण नेहरू को पुणे में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण तिलक से श्रेष्ठ मानते हैं।  

वहीं पर एक सज्जन जो अर्थशास्त्र के प्रोफेसर और राजनेता रहे हैं, चुनाव हारने के बाद से गले में गमछा बांधे कृषि से लेकर सुरक्षा एवं शिक्षा पर सामान रूप से भारतीय जनता को अपने ज्ञान से लाभान्वित करते रहे हैं।

यदि एक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का व्यक्ति चिकित्सा जैसे विशिष्ट नैपुण्य के क्षेत्र में पांडित्य का प्रसाद बाँट सकता है तो क्यों नहीं एक अभियन्ता व्यंग्यकार शिक्षा नीति पर समीक्षा करे। वैसे भी उदार कला क्षेत्रों पर विगत वर्षों में वामपंथी शिक्षाविदों के अतिक्रमण के बाद मेरा भी यहाँवहाँ निकल जाना स्वागत योग्य भी हो तो क्षम्य अवश्य है।

विस्तृत भूमिका बनाने के पश्चात एक सम्मानित विशेषज्ञ के नाते मेरा कहना यह है कि विद्यार्थी दो प्रकार के होते हैं, एक जो विद्या के अर्थी होते हैं अर्थात जिनका उद्देश्य विद्या प्राप्त करना होता है, दूसरे वे होते हैं जिनका उद्देश्य विद्या की अर्थी उठाना होता है।

सरकार ने नई शिक्षा नीति की घोषणा कर दी है। 34 वर्षों की प्रतीक्षा के पश्चात भारत को नई शिक्षा नीति प्राप्त हुई है। भारत में स्वतंत्रता के पश्चात से शिक्षा एवं नीति दोनों का नितांत अभाव रहा है। हम समाजवाद से गुटनिर्पेक्षतावाद से रूस समर्थक से चीन प्रेमी से अमेरिका समर्थक समय-समय पर होते रहे हैं।

नीति के विषय में हम सदा चपल-चंचल रहे हैं। एक नीति से दूसरी नीति की ओर धकेले जाने के मध्य जो ज्ञान हम पाते रहे हैं, उसे ही हम शिक्षा मानकर स्वीकार करते रहे हैं। आज जब एक साथ शिक्षा एवं नीति का आगमन भारतीय परिप्रेक्ष्य में हुआ है, जनमानस प्रफुल्लित है। 

शिक्षा के क्षेत्र में भी हम एक बिना पतवार की नौका की भाँति लहरों के साथ यहाँ-वहाँ लुढ़कते रहे हैं। भारत में छात्र संस्कृत एवं भारतीय भाषाओं में पढ़ते रहे और अचानक मुग़ल सरकार ने तय किया कि सरकारी काम फ़ारसी में होंगे, छात्रों ने शिखा त्यागकर ईरानी टोपी पहनी और फ़ारसी सीखी ही थी कि मैकॉले साहब ने कर 1835 में घोषणा कर दी कि अरबी एवं संस्कृत सब हटाकर सारा कार्य अंग्रेज़ी में होगा।

स्वतंत्रता के पश्चात भारत के शिक्षा मंत्री बने मौलाना आज़ाद जिनकी शिक्षा अनौपचारिक ही रही थी। उनके बाद भी महाभारत के युद्ध में पांडव परिवार में जो भूमिका नकुलसहदेव की रही वही भूमिका मंत्रिमंडल में शिक्षामंत्रियों की रही है। ये पांडव सेना में थे, पाँच भाइयों में से थे परंतु करते क्या थे यह रहस्य ही रहा।

संभवतः शिक्षा की दुर्दशा के पीछे जनता के ज्ञान को घटाकर जनप्रतिनिधियों के स्तर पर लाने का प्रयास रहा हो। शिक्षा मंत्रियों ने प्रधानमंत्री की भावना का आदर करते हुए यह समझा कि उनके अस्तित्व का उद्देश्य चमत्कार करना नहीं है, सिर्फ एक आभासी भूमिका में शेरवानी में गुलाब लगाकर उत्तीर्ण होने वाले छात्रों को बधाई एवं अनुत्तीर्ण होने वाले छात्रों को सहानुभूतिपूर्वक आश्वासन देना है।

शिक्षा का स्तर राजनीति के स्तर के साथ गिरता गया। आपातकाल में संजय गांधी ने भविष्य के प्रति उदासीन एवं वर्तमान से निराश छात्रों में छिपी संभावनाओं को पहचाना और उन्हें राजनीतिक रोज़गार देने की परंपरा की नींव डाली। इसी के साथ विपक्ष की दृष्टि भी इस मुक्त, सस्ती दरों पर उपलब्थ मानव संसाधन पर पड़ी।

धीरे-धीरे गैर-राजनीतिक रोज़गार की अनुपलब्धता एवं राजनीतिक रोजगार की उपलब्धता को देखकर विद्यार्थियों में दूसरे वर्ग के विद्यार्थियों की संख्या बढ़ने लगी। शिक्षकों को भी वामपंथ का लाभ दिखा, जहाँ शिक्षा प्रदान करके छात्रों के हाथ में कलम देने से सरल छात्रों के हाथ में ढपली देना हो गया। सरस्वती के वीणा की ध्वनि विद्या स्थलों में कम होती गई और वामपंथी ढपलियों का स्वर बढ़ता चला गया।  

विद्यार्थी राजनीतिक दलों के कर्कश ऑर्केस्ट्रा के सहगान में स्वर देने वाली भजन मंडली बनते चले गए। आदर्श छात्र शिक्षकों को आतंकित रखता था, एक आदर्श शिक्षक ऐसे आदर्श छात्रों को चेला बनाकर रखता था एवं राजनीतिक धरना प्रदर्शनों के लिए उचित मूल्यों पर उपलब्ध कराता था।

शिक्षा का स्तर गिरने से अनुत्तीर्ण होते छात्रों की संख्या बढ़ी तो जहाँ संभव हुआ परीक्षा की व्यवस्था ही समाप्त कर दी गई, और जहाँ इसे समाप्त करना संभव नहीं था, वहाँ नकल एवं सिफारिश की व्यवस्था की गई। इस प्रकार नेता एवं जनता के मध्य बनी हुई बौद्धिक दूरी को नापा गया, ताकि जनता और जन नेता सामान रूप से मूर्ख एवं अज्ञानी हों।

वैज्ञानिक विषयों में वैचारिक भिन्नता का स्थान नहीं होता है। इस कारण वैज्ञानिक विषयों से जुड़े संस्थानों में बांग्लादेशी अवैध शरणार्थियों की भाँति उदार कलाओं की शिक्षा को घुसाने का कार्यक्रम प्रारंभ हुआ।

इतिहास आदि को मन का बनाकर उसे राजनीतिक आवश्यकताओं के आधार पर परिवर्तित किया गया। दंत कथाओं के नायक के प्रचलितमैं इतिहास बदलने आया हूँके सिंहनाद को शिक्षाविदों ने मन पर लिया और जमकर इतिहास बदला और जमकर भसड़ मचाई।  

भाषायी रूप से भारत को बाँटने का कार्य भी इसी सब में चलता रहा। क्षेत्रीय भाषा के नाम पर हिंदी को हाशिये पर धकेल के उर्दू के स्कूल एवं विद्यालय खोले गए। हिंदी की सूचनापट्टिकाओं पर कालिख पोतने वालों ने क्षेत्रीय भाषाओं में काम होते लेखन, घटते शोध पर कभी ध्यान नहीं दिया। द्वेष और रोष से रक्तिम नेत्र सत्य को देख नहीं पाते हैं।

ईवीएम के आने के बाद राजनीति का शौर्यकाल समाप्त होने लगा, वीरभोग्या वसुंधरा का सिद्धांत धराशायी होने लगा और वामपंथी क्रांतिगीत राग दरबारी में गाया जाने लगा तो ढपलीधारी योद्धा सहसा भौंचक्के से रह गए।

विद्यार्थी राजनीति में स्थान पाए तो क्या करे। एक लम्पट विद्यार्थी के लिए रोज़गार के अवसर कम होने लगे। कुछ को राजनीति की छोटी बहन पत्रकारिता ने शरण में लिया परंतु कुल मिलाकर स्थिति बिगड़ रही थी।

जिन बुज़ुर्ग छात्रों ने नवांगतुकों के मार्गदर्शन का कार्य अपने बलिष्ठ कंधों पर लिया था, वे अप्रासंगिक होने लगे। अब सुना है नई शिक्षा नीति में कुछ वृतावस्थाअनुकूल कोर्स भी समाप्त हो रहे हैं। इसको लेकरअफ़्रीकी समाज में मुर्गों की प्रजनन व्यवस्था‘, ‘मैगी एवं दलित उद्धारतथाश्रावण में उभरती हुई पुरुषसत्तात्मक हिंदूवादी व्यवस्था से श्वान प्रजाति में हताशाजैसे महती राष्ट्रीय महत्त्व के शोध पर भी अनिश्चितता का वातावरण है। 

नीति तो गई है, नीति के कार्यान्वयन में शिक्षा मंत्री पार्थ सिद्ध होते हैं या नकुल यह तो समय ही बताएगा। बहरहाल एक विशेषज्ञ के रूप में बिना तथ्यों के ज्ञान के मैंने 1,000 शब्दों का लेख लिखा है, इसे पढ़कर आप आनंदित हों। यदि आप किसी टीवी चैनल पर शिक्षा नीति पर बहस कराने के लिए सस्ती दरों पर मुझे बुलाने को इच्छुक हों तो मैं उपलब्ध हूँ एवं एक भूतपूर्व अभियांत्रिकी छात्र होने के नाते विरोधी वार्ताकारों को उनकी आदरणीय माताओं बहनों का स्मरण कराके एक गंभीर, उच्चस्तरीय बहस करने के लिए सर्वथा प्रशिक्षित हूँ। 

कुल मिला कर इस गंभीर लेख का सार श्रीलाल शुक्ल राग दरबारी में कर गए थे जब उन्होंने छंगामल विद्यालय के ससंदर्भ लिखा था –

“बहुत पहले इस देश में यह शोर मचा था कि अपढ़ आदमी बिना सींग-पूँछ का जानवर होता है। उस हल्ले में अपढ़ आदमियों के बहुत-से लड़कों ने देहात में हल और कुदालें छोड़ दीं और स्कूलों पर हमला बोल दिया। हज़ारों की तादाद में आए ये लड़के स्कूलों, कॉलेजों, यूनिवर्सिटियों को बुरी तरह घेरे हुए थे। भारत की शिक्षा के मैदान में भभ्भड़ मचा हुआ है।”    

वही भभ्भड़ अब भी चल रहा है। देखें शिक्षा सामाजिक एवं राष्ट्रीय उपयोगिता की ओर मुड़ती है या नहीं या आटा चक्की खोलने चले रामाधीन भीखमखेड़वी नित नए शिक्षा संस्थान खोलते चले जाएँगे जहाँ नए-नए रुप्पन बाबू अधिकार जमाकर बैठेंगे।

साकेत लेखक व ब्लॉगर हैं जो @saket71 के माध्यम से ट्वीट करते हैं।