व्यंग्य
डिंपल बाबा को अधेड़ों के ग्रेटा थनबर्ग बनने की प्रेरणा देने के लिए “कौन ज़िम्मेदार है”

प्रसंग- ‘सिरफिरों का सप्ताहांत’ था, डिंपल बाबा अपने आश्रम में शून्य भाव में थे, फिर कैसे आया रोष प्रकट करने का विचार?

गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, “जब जब धर्म की हानि होती है, तब धर्म के पुनरुद्धार हेतु मैं जन्म लेता हूँ।” व्यंग्य भी एक धर्म है। भारत के एक बहुमुखी प्रतिभा-संपन्न विपक्ष के राजनेता की भी भारत के राजनीतिक पटल पर व्यंग्य के संदर्भ में वही भूमिका है।

कांग्रेसी चाटुकार समाज के अनुसार ये 50-वर्षीय युवा नेता सुंदर, सुशील, कान्वेंट एजुकेटेड, उच्च कोटि के तैराक, बंदूकबाज़, गृह कार्य में दक्ष होने के साथ, पाजामे के नाड़े के साथ-साथ कराटे का ब्लैक बेल्ट भी धारण करते हैं।

जनता का मानना है कि गीता के श्लोक की तर्ज पर ‘यदा यदा हि व्यंग्यस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानम हास्यस्य तदात्मानम सृजाम्यहम’ के अनुसार जब भी संसार में हास्य व्यंग्य का क्षय होने वाला होता है, राष्ट्र पर दुख एवं गहन गंभीरता का भाव गहराने लगता है, यह सज्जन अवतरित होते हैं।

इनके दादा पारसी थे परंतु उस पीढ़ी में इनके परिवार ने उस पीढ़ी में मातृसत्तात्मक व्यवस्था अपना रखी थी, अतः इनके पिता हिंदू थे, इनकी पीढ़ी पुनः पितृसत्तात्मक हो गई अतः माता के कैथोलिक होने के बावजूद कयास लगाए जाते हैं कि ये जनेऊधारी ब्राह्मण हैं।

उसी प्रकार इनकी नागरिकता के संबंध में भी भिन्न-भिन्न भ्रामक गाथाएँ हैं जिनके अनुसार ये कभी-कभी त्रुटिवश स्वयं को किसी भी राष्ट्र का नागरिक बता देते हैं।  संत कबीर एवं संत आमिर खान के शब्दों में ‘जात न पूछो साधू की, पूछ लीजिए ज्ञान’ और ‘बहती हवाओं सा था वो’ दोनों दोहे इन्हीं नरपुंगव को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग कालखंड में लिखे गए थे।

विचित्र रामायण में एक प्रसंग है जिसमें प्रभु श्रीराम ने अट्टहास को राक्षसी जानकर हँसने पर प्रतिबंध लगा दिया था। कहते हैं कि तब ब्रह्मा जी ने राहुल जी के त्रेता अवतार की रचना की जिसे देखकर अयोध्याजनों में पुनः हास-परिहास की परंपरा का प्रारंभ हुआ। इस प्रकार कलयुग में भी इन्हें जन्मा न मानकर अवतरित ही मानना उचित होगा।

यह डिंपल बाबा का नहीं भारत का दुर्भाग्य है जो इस अवतारी पुरुष को समझ नहीं पा रहा है। डिंपल बाबा महान हैं क्योंकि उनके पिताजी भी महान थे। डिंपल बाबा राजनीति के करन जौहर हैं। महानता उनकी वंश परंपरा है।

अपने पूर्वजों की भाँती डिंपल बाबा महानता को परिवार से बाहर नहीं जाने देते हैं और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार महानता को वंश से बाहर निकलने का प्रयास करते देखते ही उसे बाथरूम में बंद करके सिटकिनी लगा देते हैं।

लोग कहते हैं कि भारत महान है, परंतु वे ये नहीं जानते कि भारत इसलिए महान है क्योंकि यहाँ डिंपल बाबा का वास है। जिस प्रकार प्रकार देव पुरुष राष्ट्र रक्षा हेतु बारंबार अवतार लेते हैं, यह भी प्रत्येक चुनाव के पूर्व पत्रकारिता के चयनित पंडो द्वारा लॉन्च एवं रीलॉन्च किए जाते हैं।

कहते हैं कि कठिन समय में मनुष्य का चरित्र निखरकर आता है। भारत के लिए 2020 एक ऐसा ही समय प्रतीत हो रहा है। चीन से निकली कोरोना की महामारी ने विश्व को दुख से दोहरा कर रखा है। ऐसे समय आम मनुष्यों के सामान नरश्रेष्ठ भी अपने घर के कारागृह में हैं।

वैकुंठ उनकी प्रतीक्षा में हैं, जंघा देश के नर-नारी उसी प्रकार दुख में डूबे हुए हैं जैसे श्रीकृष्ण के गोकुल छोड़ने के पश्चात गोकुलवासी थे, परंतु वे इस जालिम दुनिया के चंगुल से निकलने में स्वयं को असमर्थ पा रहे हैं। ऐसे दुःख के समय में जब समस्त भारतवासी, महामारी के एवं जंघादेश वासी विरह वेदना के भार तले दबे हैं, पत्रकार समाज ने डिंपल बाबा के पुनः लॉन्च के पुनीत कार्य को शिरस्थ किया एवं वेबिनारों की शृंखला का प्रारंभ किया।

प्राचीन काल में कुलीन परिवारों के पारिवारिक पुरोहित होते थे, आधुनिक काल में उनका स्थान पारिवारिक पत्रकारों ने ले लिया है। इनका कार्य होता है कि यह कुछ अंतराल के पश्चात नियमित रूप से राहुल महाम्त्य का गायन करें एवं जब जब संसार व्यंग्यविहीन हो चले, राहुल जी के पुनः लॉन्च का पुनीत प्रयास करें।

चीन के भारतीय क्षेत्र में अतिक्रमण एवं शर्मनाक हिंसा के पश्चात ऐसे ही एक पत्रकार बंधु डिंपल बाबा के आश्रम पर पधारे। प्रातःकाल को जब अर्धरात्रि में डिंपल बाबा उदीयमान हुए तब पुरोहित पत्रकार महोदय ने उनके दर्शन प्राप्त किए।

डिंपल बाबा ने अधखुले नेत्रों से पत्रकार महोदय की अनावलोकनीय छवि का अवलोकन किया। इन्हें देखकर डिंपल बाबा के स्मृति में उनके पूर्वज आ जाते थे और हृदय में आटे के गोले खिला के पिंड दान करने का विचार आ जाता था।

शैम्पूस्वामी के अनुसार यह एक हिंदू परंपरा थी और चुनाव में ऐसी परंपरा का निर्वहन करने का लाभ मिल सकता था। परंतु चुनाव अभी निकट नहीं था। फिर ये सज्जन यहाँ क्यों पधारे यह सोच डिंपल बाबा के मस्तिष्क का मंचूरियन बना रही थी।

“महाराज, चीन के साथ सीमा पर झड़प हुई है।”, पत्रकार बोले।
डिंपल बाबा शून्य भाव से उन्हें देखते रहे। पत्रकार कुछ देर विचार करते रहे कि बाबा विचारमग्न हैं या विगत रात्रि अधिक सामग्री-सेवन के कारण समाधि में चले गए हैं।

उन्होंने पुनः प्रयास किया।
“महाराज, चीनियों ने संभवतः भारत की कुछ भूमि भी अतिक्रमित करने का प्रयास किया है।”
डिंपल बाबा थोड़े हिले, फिर डुले, फिर बोले।

“तो क्या हुआ? अब आप क्या चाहते हैं कि तिब्बत तक की भूमि पर जीजाजी ही कब्ज़ा करें। कुछ काम तो दूसरों को करने दें। आप भी अब खुद कहाँ लिखते हैं, कांशीराम पुरस्कार के बाद केजरीवाल पुरस्कार प्राप्त करने के बाद से तो अब आप भी तो ‘लिखते हैं फलाने, तो पूछते हैं ढिकाने’ करके ही जीवन यापन कर रहे हैं। जीजाजी को अब हम तिब्बत नहीं भेज सकते इस लॉकडाउन में।”

“सर, ये वो वाला कब्ज़ा नहीं है। ये दूसरा कब्ज़ा है। सेना से झड़प हुई है। राष्ट्र उद्वेग में है।”

तब तक डिंपल बाबा के दीवान के बाईं ओर उपस्थित शैम्पूस्वामी उठ गए थे एवं अपनी प्रचुर केशराशि में हाथ फेर रहे थे। शैम्पूस्वामी अंतर्राष्ट्रीय व्यक्तित्व थे और उन्हें पीलीभीत की खबर भले न हो, पैलेस्टाइन के विषय में सब पता रहता था।

उन्होंने ही डिंपल बाबा को लॉरेन्स ऑफ़ अरबिया दिखाकर, खलीफा के अरबी पहनावे का लोभ दिलाकर कांग्रेस का तुर्की में दफ्तर खुलवाया था। डिंपल बाबा ने प्रश्नसूचक दृष्टि से उनकी ओर देखा, पुछा- “क्या युद्ध हो गया है?”

“युद्धप्राय ही है। सैनिक आत्माहुत हुए हैं। जनता में रोष है। वह विपक्ष ही क्या जो जनता के रोष पर सवार होकर सरकार पर आक्रमण न करे, और वह पत्रकार ही क्या जो इसके लिए भूमिका न बनाए। हमने अपना कार्य किया, अब आप आगे बढ़ें।”

“कुछ तो करना ही होगा।” शैम्पtस्वामी बोले।
“हम इसमें क्या कर सकते हैं? मोमो और चाऊमीन खाना छोड़ दें?”, डिंपल बाबा जम्हाई लेते हुए बोले।

“उससे कुछ नहीं होगा। वामपंथी सड़क पर उतर गए हैं। कल अपने दोनों बचे हुए कार्यकर्ताओं का उन्होंने शपथ-पत्र द्वारा अखिल कुमार और भारत महतो नामकरण करा दिया, और शाम को उनके साथ अजॉय भवन के बाहर अखिल और भारत के साथ खड़े होकर अखिल-भारतीय प्रदर्शन के नाम से प्रेस विज्ञप्ति दे दी।”

“हमने केश भी घुंघराले कर लिए हैं। दीदी की दादी नाक को कुछ कुछ तो हम अब टक्कर दे ही सकते हैं। बताइए क्या करना है।”, डिंपल बाबा बोले।

“प्रभु, राजनीति परिवार के बाहर हो रही है, दीदी और जीजाजी से बाहर निकलिए।”, पत्रकार जी फ्रस्टियाने लगे थे।

“क्यों न हम चीन के राजदूत के साथ वेब पर साक्षात्कार कर लें? हमारे वेगवान लहरों के सामान केशगुच्छ के भी प्रशंसक हो गए हैं।”

“हे देव, चीन के राजदूत के कारण आपकी पहले ही थू-थू हो चुकी है। उस दिशा में न बढ़ें। आपकी पार्टी की चीन की पार्टी से संबंध पर विपरीत प्रेस मिल रहा है। राजनीति में कुछ करने से अधिक आवश्यक कुछ करते हुए प्रतीत होना है। जैसे प्रवासी श्रमिकों के संदर्भ में हमने किया। चिंता करें एवं चिंता की चर्चा करें।”, शैम्पtस्वामी बोले।

“हैशटैग चलवा देते हैं ‘डिंपल कुमार-सर्वश्रेष्ठ सांसद’ दो -तीन अभिनेताओं, चिरकुट निर्माता निर्देशकों को लगाकर। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की एक थोक हैशटैग विक्रेता से पहचान है, ठीक-ठीक दाम लगवा देंगे।”, डिंपल बाबा बोले।

“हाउ हाउ से काम नहीं चलेगा। हैशटैग तो मंडल जी से मीणा जी तक चला लेते हैं, कुछ ठोस करना होगा।”, पत्रकार बोले।

“चीन से संबंध सुधारने के लिए चीनी युवतियों से मैं संवाद स्थापित करने का प्रयास करता हूँ।”, शैम्पूस्वामी बोले।

पत्रकार उखड़ गए – “आप हर जगह अपना ही देखते रहते हैं। न चीनियों को आपकी अंग्रेज़ी समझ आएगी न आपको उनकी चीनी।”

तुम क्यों समझोगे बाबूमोशाय मोहब्बतों की कहानियाँ वाले अंदाज़ में पत्रकार को घूरकर शैम्पूस्वामी विचारमग्न हो गए, शून्य में देखते हुए अचानक बोले- “एक उपाय है। यह कमाल का आइडिया मुझे अपने पत्रकार मित्र से ही आया है। उत्तर न दीजिए, समाधान मत दीजिए, रोष प्रकट कीजिए।

देखिए ग्रेटा थनबर्ग को, उसने बस रोष प्रकट किया, बोली ‘हाउ डेयर यू- आपका साहस कैसे हुआ? न एक पेड़ लगाया, न पौधा, आज देखिए पर्यावरण से लेकर कोरोना कमिटी, कोरोना कमिटी से लेकर तमाम अंतर्राष्ट्रीय समितियों में वह है।

मुझे तो लगता है कल को यदि बेहतरीन पुदीने की चटनी बनाने की विधि पर कोई अंतर्राष्ट्रीय समिति बानी तो उस पर भी ग्रेटा होंगी। ग्रेटा में वोकत्व एवं ट्रोलत्व का अद्वितीय मेल है। वोक वह मनुष्य होता है जो अपनी अज्ञानता जो क्रांति का आवरण प्रदान कर सकता है, ट्रोल वह होता है जो अकर्मण्यता को अराजकता में बदल सकता है।”

डिंपल बाबा यह सुझाव पाकर हर्षित हुए। अधेड़ों के ग्रेटा बनने का यह विस्मयकारी विचार उन्हें बहुत पसंद आया। शैम्पूस्वामी को चीन समस्या पर ग्रेटा शैली का एक भाषण लिखने का कार्य सौंपकर डिंपल बाबा अपने लहरिया केश विन्यास पर कार्य करते हुए बाहर चले गए।