व्यंग्य
बुद्धिजीवी वामपंथी कांग्रेस जाकर डिंपल बाबा को दे रहे प्रशिक्षण- सिरफिरों का सप्ताहांत

बुद्धिजीवी परशाद प्रातः काल प्रकट हो गए, कहने लगे– “चलो तुम्हें एक बड़े आदमी से मिलाते हैं।” बुद्धिजीवी परशाद के मुखमंडल पर विचित्र-सी आभा एवं व्यक्तित्व में अलौकिक उत्साह था। 

हमें संदेह हुआ कि वामपंथ के दो बचे खुचे झंडाबरदारों, अखिल महतो एवं भारत पांडे अस्वस्थ हो गए हों जिनकी अनुपस्थिति में वामपंथियों के अखिल भारतीय प्रदर्शन में ये हमें ले जाना चाहते हों। पिछले ही सप्ताह हम वामपंथ के गुरुजी से बाल-बाल बचे थे।

हमने डरते-डरते उनसे अपनी स्थिति के क्रांति का प्रतिकूल होने का और अपने कतई कूल होने का जिक्र करते हुए बताया कि किस प्रकार लेखक, सो भी हिंदी लेखक, तिस पर भी व्यंग्यकार और उसमें भी प्राचीन पति होने के नाते हम मनुष्य प्रजाति में हीनता की निम्नतम सीढ़ी पर हैं और क्रांति जैसे महती उपक्रम के लिए हमारा शौर्य सर्वथा अनुपयुक्त हैं।

बुद्धिजीवी परशाद ठठाकर हँस दिए। उन्हें हँसते हुए देखकर हमें वह ऐतिहासिक वाहन याद हो आया जिसके ध्वनि एवं रूप के अद्भुत संगम को एक समय भोपाल में भटसूअर कहा जाता था। बुद्धिजीवी परशाद जब प्रसन्न होते थे, उसी सार्वजनिक यातायात के उसी वाहन के प्रतिरूप जान पड़ते थे। हालाँकि ऐसे कम ही होता था।

एक प्रतिबद्ध वामपंथी की भाँति मातम बुद्धिजीवी परशाद जी के मुख का मूल भाव होता था। वे आमतौर पर दुखी ही रहते थे, एवं उनकी विभिन्न विषयों को लेकर चिरंतन चिंता उनके चेहरे पर एक स्थाई कब्ज़ियत का भाव बनाए रहती थी।

एक कुशल बुद्धिजीवी सदैव क्रुद्ध रहता है। क्रोध एवं चिंता का स्थाई भाव बुद्धिजीवी परशाद को एक विलक्षण वामपंथी विचारक का स्थान देता था। परंतु आज बुद्धिजीवी परशाद प्रसन्न थे और मैं यह नहीं समझ पा रहा था कि यह हर्ष का विषय है या चिंता का।

हम तुम्हें कांग्रेस मुख्यालय ले जाएँगे”बुद्धिजीवी परशाद एकदम– ‘हम तुम्हें मेला ले जाएँगे’के भाव से बोले। मैं चकित हो गया। भारतीय आम आदमी का मूल स्वाभाव चकित हो जाना है। वह तो पुलिस को चौकी पर, विद्यालय में शिक्षकों को, बाबू में ईमानदारी को और तो और बजट में टैक्स को देखकर भी चकित हो जाता है।

बहरहाल यहाँ चकित होने का उचित कारण भी था। मैंने पूछा– “परंतु आप तो वामपंथी थे।” बुद्धिजीवी मेरी मध्यमवर्गीय मूर्खता पर मुस्कुराए और बोले- समाजवाद तो कांग्रेस लेकर चली गई। डांगे जी डींगें मारते रह गए, करात जी कुछ कर नहीं सके और येचुरी जी की तिजोरी से समाजवाद की चोरी हो गई। मैंने युवावस्था में बहुत वामपंथ की सेवा की, परंतु जब वामपंथ ही कांग्रेसी हो गया हो तो मैं वहाँ रहकर क्या करूँगा।”

बहुत विचार के पश्चात मैं इस निर्णय पर पहुँचा हूँ कि एक अधेड़ होते वामपंथी बुद्धिजीवी को कांग्रेस में भर्ती हो ही जाना चाहिए ताकि बुढ़ापा कम से कम आराम से कटे। कांग्रेस ही बुद्धिजीवियों का वानप्रस्थ स्थल है। कांग्रेस भले ही सत्ता से बाहर हो, वहाँ अब भी बहार है। वहाँ सम्मलेन हैं, संगठन है, शक्ति है, शैम्पेन है।

‘जब हमारी भैंस ही कांग्रेसी खोल ले गए तो हम खूँटे की क्या पहरेदारी करें।‘ बुद्धिजीवी गहरी साँस लेकर बोले
कांग्रेस को बुद्धिजीवियों की आवश्यकता है। आज जब कांग्रेस चुनाव नहीं जीत पा रही है, तो चौथे स्थान पर रह कर भी महाराष्ट्र में सरकार बनाए, और कभी गलती से राजस्थान में जीत जाए तो राज्यपाल को धमका कर सरकार बचाएदोनों परिस्थितियों में इसे लोकतंत्र की रक्षा का पुण्य कर्तव्य दिखने के लिए बुद्धिजीवियों की आवश्यकता होती है।

प्रकृति रिक्तता या वैक्यूम नहीं स्वीकार करती है मित्र, चमचा-वर्ग में कांग्रेस में बहुत भर्ती खुली है, पुराने कांग्रेसी जा रहे हैं, अंतरात्मा के फ़ोन पर फ़ोन आ रहे हैं। सत्य परेशान, प्रताड़ित होकर तमाम किस्म के करतब कर रहा है। वहाँ बुद्धिजीवियों का बहुत स्कोप है। मैं तो कहता हूँ तुम भी एक फैब इंडिया का लंबा कुरता ले लो, दोनों भाई हँसी-खुशी चाटुकारिता करके जीवनयापन करेंगे। मैं यह बात दबा ले जाऊँगा कि तुम एक व्यंग्यकार हो।”

“परंतु आप कांग्रेस मुख्यालय में जाकर करते क्या हैं?”, मैंने पूछा। वे बोले, देखिए, हमारा प्रमुख कार्य तो युवराज का मनोरंजन करना है। परंतु वहाँ कम्पटीशन बहुत है, युवा चाटुकार हैं जो फ़र्ज़ी मुकदमे दायर करके उन्हें आनंदित रखते हैं और वकीलनेताओं के रोज़गार की व्यवस्था किए रहते हैं। आजकल हमें बाबा को बुद्धिजीवी बनाने का कार्य मिला है।

परसाई जी तो बहुत पहले लिख गए हैं कि बुद्धिजीवी समाज नहीं बदलता परंतु यह समझता है कि वही समाज में परिवर्तन का कारक है। बुद्धिजीवी वह टिटहरी है जो आकाश की ओर पाँव उठाकर लेटा रहता है और यह सोचता है कि आसमान उसके पैरों पर ही टिका है।

राहुल जी में यह बुद्धिजीवी विश्वास कूट-कूटकर भरा है, चाहे तो उनका चीन या कोरोना पर वक्तव्य देख लो। उन्हें पूर्णतया प्रशिक्षित बुद्धिजीवी बनने के लिए सिर्फ कुछ भाषा एवं हाव भाव का प्रशिक्षण चाहिए। बड़ी कठिनाई के पश्चात बाबा के केश रेणुकट किए गए हैं एवं गौर वर्ण को सांवला करके परिपक्व बनाने का प्रयास किया गया है।

जब इंजेक्शन लगा के तरबूज को मीठा बनाया जा सकता है तो राहुल जी को गंभीर चिंतक बनाना क्यों ही संभव न होगा। उन्हें चेहरे पर कब्ज़ियत के भाव लाकर क्षुब्ध दिखने का अभ्यास कराया गया है।

बाबा अपने 3 मिनट के वीडियो में धीरे-धीरे करुणामयी मुद्रा में एक कुशल बुद्धिजीवी की भाँति गर्दन को 38 डिग्री के कोण में झुकाने में भी प्रवीण होते जा रहे हैं। उन्हें सुबहशाम दो घंटे बुद्धिजीवी शब्दकोष जैसेगरीब, दलित, लेनिन, मार्क्स, ब्राह्मणवाद का अंत, हिंदुत्व से रक्षाजैसे शब्दों का पाठ कराया जाता है। उन्हें इसमें बहुत आनंद रहा है।

दो सीटें जीतकर भी टीवी पर आधे घंटे फुटेज खाने की वामपंथी कला इन्हीं शब्दों पर आधारित थी, हम बाबा को वही सीखा रहे हैं। हमारी शोध संस्था ने यह पाया कि ऐसे भारी भरकम शब्दों के साथ चार वाक्य बोलने से चार दिन की डिबेट में वामपंथी छाए रहते थे।

सो बाबा ने पत्रकारों पर निर्भर रहने के स्थान पर, प्रधानमंत्री जी के आत्मनिर्भर भारत के संदेश को आत्मसात करते हुए स्वयं ही चलता-फिरता भारी भरकम शब्दों से लैस 3 मिनट का मैगी न्यूज़ चैनल बनने का निर्णय लिया है।

हर्ष का विषय है कि इस इंस्टेंट समाचार विश्लेषण के क्षेत्र में उतरने से सिर्फ जंघादेश के दीर्घध्वनिमुर्ग नगर से लॉकडाउन के काल में दूरी के कारण उनके जीवन में आई रिक्तता को भरा जा रहा है, संवाददाताओं द्वारा बाबा के एक और पुनराविष्कार के समाचार को बनाया जा रहा है, मनरेगा के सामान हम जैसे वयोवृद्ध वामपंथियों के लिए भी रोज़गार के मार्ग खुल गए हैं।”

बुद्धिजीवी तो कांग्रेस के साथ पहले भी रहे हैं। प्रेमचंद भी तो थे।”, मैंने कहा।
मेरी मूर्खता पर उन्होंने मुंडी अविश्वास के भाव के साथ दाएँ से बाएँ हिलाई और बोले– “तुम बहुत भोले हो। प्रेमचंद कांग्रेस में इसलिए नहीं थे कि कांग्रेस विरोधियों  की वर्तनी का दोष सार्वजनिक करके उन्हें आतंकित करके चुप कराएँ। ही वे इसलिए कांग्रेस में थे कि एक गुट बनाकर विपक्ष को पुरस्कार लौटा-लौटाकर घेरें।

वे इस लिए कांग्रेस में थे ताकि वे कांग्रेस को अपने विचार एवं दिशा दे सकें। उनके कांग्रेस में होने से कांग्रेस को लाभ था, कि उन्हें साहित्य समारोहों के निमंत्रण मिलते थे। आज जहाँ कांग्रेसी बुद्धिजीवी इसकी टोपी उसको पहनाता है, प्रेमचंद अपने फटे जूते छोटे भाई को देकर नंगे पाँव घुमते थे। तुम्हें नंगे पाँव नहीं घूमना है तो चलो मेरे साथ।”

मैंने बुद्धिजीवी परशाद की बात पर विचार किया और 31 जुलाई को मुंशी प्रेमचंद के जन्मदिवस से डिंपल बाबा बुद्धिजीवी प्रशिक्षण दल का सदस्य बनने का प्रण लेकर चमरौधा पहनकर बुद्धिजीवी परशाद के साथ कांग्रेस मुख्यालय को चल पड़ा। प्रेमचंद के फटे जूतों से क्रांति आती होती तो अब तक चुकी होती।

साकेत लेखक व ब्लॉगर हैं जो @saket71 के माध्यम से ट्वीट करते हैं।