व्यंग्य
उरी ट्रेलर के बाद फिल्म समीक्षक केजरीवाल को जनता का आह्वान

फिल्मों की समीक्षा करने के लिए प्रसिद्ध दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की राय की माँग ‘उरी’ के ट्रेलर के बाद और भी बढ़ गई है। कुछ दिनों पूर्व 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक पर आधारित फिल्म ‘उरी’ का ट्रेलर रिलीज़ हुआ। इसके बाद ट्विटर पर इस फिल्म के संबंध में अरविंद केजरीवाल की राय जानने के लिए लोग अपनी उत्सुकता व्यक्त करने लगे।

खैर लोगों की उत्सुकता ऐसे ही नहीं है, इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं- पहला यह है कि जब यह सर्जिकल स्ट्राइक की गई थी तो केजरीवाल को इस पर यकीन नहीं था। हालाँकि उन्होंने इसके लिए सेना की प्रशंसा की लेकिन पाकिस्तान का मिथ्या प्रचार रोकने के बहाने इस ऑपरेशन का साक्ष्य भी माँगा।

दूसरा कारण तो बहुचर्चित और बहुप्रचलित है। बैंग-बैंग, पीके, मसान, गब्बर इज़ बैक, दृश्यम और उड़ता पंजाब जैसी फिल्मों को अपने अमृत वचन से केजरीवाल ने लाभान्वित किया। केजरीवाल की राय से प्रभावित होकर कई लोगों ने ये फिल्में भी देखीं और कुछ लोग उनके समय प्रबंधन से प्रभावित भी हुए कि मुख्यमंत्री पद की ज़िम्मेदारियों के साथ केजरीवाल फिल्में देखने का समय कैसे निकाल लेते हैं।

देखते-देखते फिल्म समीक्षक के रूप में केजरीवाल की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि लोग मानने लगे कि मुख्यमंत्री पद की ज़िम्मेदारियाँ केजरीवाल को बखूबी अपना काम नहीं करने दे रही है और वे अगले चुनावों में केजरीवाल को इस भार से मुक्त करके पूर्ण रूप से फिल्म समीक्षक बनने में उनकी सहायता करने के पक्षधर हो गए।

कुछ लोग केजरीवाल के इस हुनर को पहचान नहीं पाए व आलोचना करने पर उतर आए कि केजरीवाल दिल्ली की बजाय फिल्मों पर ध्यान दे रहे हैं। अपनी कर्तव्यनिष्ठता सिद्ध करने के लिए केजरीवाल ने अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर फिल्मों पर टिप्पणी करना बंद कर दिया। लेकिन आज भी फिल्म समीक्षक के रूप उनकी लोकप्रियता बनी हुई है और लोग उनकी राय का इंतज़ार कर रहे हैं।

कुछ लोग पूर्वानुमान भी लगाने लगे हैं कि कहीं केजरीवाल यह न कह दें कि गरीबों का पैसा छीनकर मोदी सरकार ने फिल्म बनाई है। और कुछ लोगों का यह भी मानना है कि यह फिल्म अरविंद केजरीवाल की साक्ष्य की भूख को मिटाएगी।

खैर केजरीवाल यह फिल्म देखेंगे या नहीं देखेंगे या अपनी राय व्यक्त करेंगे या नहीं, यह तो भविष्य के गर्त में छिपा है लेकिन वर्तमान में हमारा उन्हें संदेश है, “कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।” और उनसे निवेदन है कि वे लोक चर्चा के भय से अपना शौक न छोड़ें।

यह व्यंग्य हलके मन से पढ़ने के लिए है। इसका उद्देश्य किसी का अपमान करना नहीं है।