व्यंग्य
श्रीमंत महत्वाकांक्षी महाराज, सन्नाटे में बैठा शहजादा और लालची राजा की कहानी

यह एक ऐसे शहजादे की त्रासद कहानी है, जो सन्नाटे में कैद है। इस कहानी में गड़बड़ करने वाला एक लालची और धूर्त राजा भी है, जो पराजित होकर भी विजेताओं से बड़ा है। किंतु कहानी के केंद्र में महल के झरोखे पर बैठे एक श्रीमंत महात्वाकांक्षी महाराज हैं। राजनीति के नाथ संप्रदाय की लाभ-शुभ की लीला के दर्शन तो हैं ही।

असंतोष और विद्रोह की ऐसी कहानियाँ अचानक उत्पन्न नहीं होतीं। विधाता ही इन कहानियों को रचता है। आप इन तीन दृश्यों को मेगा बजट की मल्टीस्टारर पॉलिटिकल सस्पेंस थ्री-डी हॉलीवुड मूवी की तरह देख सकते हैं…

दृश्य-1   

शहजादे की सक्रियता एयरपोर्ट पर है। बादशाह बनने की उम्र पार हो रही है लेकिन धक्के लगाने के बाद भी शहजादा है कि एक कदम आगे नहीं बढ़ पा रहा। शहजादे के उजाड़ चेहरे की दाढ़ी देखते-देखते ही खिचड़ी हो गई। वह एक भटके हुए जर्जर जहाज़ का कप्तान है, जो हर तरफ एक नए तूफान से घिरा हुआ है।

अंदर की आफतें भी कम नहीं हैं। नादान, अनाड़ी, रणछोड़दास और फिसड्‌डी शहजादा शहजादा ही बना हुआ है। न माथे पर सेहरा बंध रहा। ताज तो बहुत दूर है अभी! पिछली पराजय के बाद वह सिद्धार्थ-सा सौम्य हो गया है। जैसे एक साथ एक शव, एक रुग्ण और एक वृद्ध देखकर वैराग्य सिर पर सवार हो।

राजकुमार रात में कभी भी निकल सकते हैं। निकलेंगे कहाँ? थाईलैंड या कोलंबिया। बिल क्लिंटन ने अभी खुलासा किया है कि व्हाइट हाऊस में काम के दबाव से राहत पाने के लिए वे मोनिका से जुड़े थे। हमारे आधुनिक सिद्धार्थ थाईलैंड या कोलंबिया से तात्कालिक राहत पाकर एयरपोर्ट पर लौट आते हैं। हर बार आते-जाते खाली हाथ…

जनपथ से लेकर एयरपोर्ट और थाईलैंड-कोलंबिया के तटों तक चोट खाया शहजादा साइडलाइन है। अपने ही घर में हाशिए पर। उपेक्षित, उदासीन। वक्त है कि काटे नहीं कटता। दीदी प्रधानमंत्री पिता को मिले सरकारी तोहफों से उठा ली गई पेंटिंग 2 करोड़ रुपये में बेचकर अपना चूल्हा जला रही हैं। अक्सर नाक कटाने वाला दामाद बुढ़ापे में भी स्ट्रगलर है। अमरबेल की तरह सूखते वृक्ष पर लदा है।

मई 2019 के बाद से शहजादा सन्नाटे में है। साँप जैसा कुछ सूंघ गया है। बोली चली गई। शुक्र है, थाईलैंड या कोलंबिया हैं। वर्ना वृद्ध राजा के बाद 61 वर्षीय मुकुल के पाणिग्रहण संस्कार जैसे समाचार कितने चिढ़ाने वाले हैं, कोई कैसे बताए।

बैठे-ठाले कुछ तो कीजिए। कुछ करने के लिए निर्णय करने की ज़रूरत है। निर्णय के लिए दम चाहिए। उनमें इतना भी दम नहीं होता कि वे दम से कह सकें कि उनमें दम नहीं है, बेहतर होगा कोई और ढूंढ लीजिए। वे तो फिर से उस कुर्सी पर आने वाले हैं, जहाँ पहले भी बेदम थे। अभी 2029 के पहले फटकने का कोई चांस नहीं है।

आंध्र में युवराज जगनमोहन ने तभी निर्णय ले लिया था। देर-अबेर हुई मगर अपनी मंजिल पर पहुँचे। जूनियर पायलट अभी एक अटका हुआ निर्णय हैं। मिलिंद भी बीच मार्ग में हैं। सब यहाँ-वहाँ ताकाझाँकी कर रहे हैं। एक किस्म की मायूसी है। गुस्सा भी है। शर्म सबसे ऊपर होना चाहिए।

आज़ादी की लड़ाई की ठेकेदारी से 60 साल तक कमाती-खाती रही शहजादे की थकी हुई कमजोर सेना की कमर टूट गई है। वह तख्तो-ताज की आदी थी। वह दशकों पहले धूप में झुलसना भूल गई थी। आज उसके पास जख्मी अश्व हैं। टूटे चके हैं। घिसे जंग खाए तीर हैं। टूटे धनुष हैं। बूढ़े और लाचार योद्धा हैं।

विचार शून्यता और दृष्टिहीनता की गहन अंधकारमय विचारणीय स्थिति। वामियों ने कुछ चप्पू संभाल रखे हैं। नौका डूबने की कगार पर है। जिनके पास जितनी आयु है, उनका भविष्य उतना ही अंधकारमय है। जनपथ के ओटलों पर पुराने मिलावटी दुकानदार ही अपने मुनाफे के आखिरी टुकड़े के मिलने तक धूल खाए बैठे रहेंगे। ऐसी घुटन में पेशवाओं के योद्धा सेनापति निर्णय नहीं लेंगे तो कौन दिखाई देता है, जो निर्णय ले।

दृश्य-2

संध्या का समय है। महल के झरोखे पर चिंतातुर महाराज विराजे हैं। महात्वाकांक्षा तेवर से जाहिर है। लेकिन कुछ गुस्से में भी हैं। उनका अपना अंदाज है। आधार है। खानदानी विरासत यहाँ भी है। आज़ादी की लड़ाई तक नहीं, पानीपत के मैदान की यादों तक फैला एक पुराना खानदान। आज तक उनका अपना सुरक्षित और असरदार गढ़ भी है।

अनुयायी हैं। सीटों पर असर है। जीत-हार में अहम किरदार है। सुदर्शन हैं। भाषण में बहकते नहीं हैं। संजीदा हैं। जहाँ पटककर रखे गए, वहाँ से ज्यादा के हकदार हैं। बीते हुए सवा साल दूध में मक्खी की तरह निकालने की पीड़ा से भरे 125 साल जैसे कष्टप्रद थे। दुत्कारने के अंदाज में कह दिया गया था कि उतरना है तो उतर जाइए सड़क पर। आपकी औकात क्या है? उतर जाइए। किसी भी स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए यह व्यवहार निर्णायक अति है।

वे महात्वाकांक्षी श्रीमंत हैं ही इसलिए कि बड़ा निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं। वे तख्त गिराने का दम रखते हैं। दम तो बहुतों के पास होता है। दम दिखाने का दम दुर्लभ है। दिखा दिया। इसीलिए श्रीमंत हैं। वर्ना हम बगल में ही आँख मारता हुआ देख रहे हैं कि ऐसे नॉन सीरियस शहजादे बेदम ही हुआ करते हैं।

कम से कम ये निर्णय तो वे ले ही सकते थे। यह तो अपने बारे में लिया गया निर्णय है। उन्होंने 2018 में जी-जान से लगने के बाद सवा साल शानदार धैर्य का प्रदर्शन भी किया। कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई। वे अपने श्वेत महल के झरोखे से देखते रहे सत्ता के नाथ संप्रदाय की लाभ-शुभ की लीला…

दिवंगत श्रीमंत और दादी साहेब स्वर्ग में बहुत प्रसन्न होंगे। पुराने हिसाब चुकता हों तो ऐसा ही होता है। कायर नेतृत्व के लिए अपनी निष्ठा व्यर्थ बरबाद करना बुद्धिमानों का लक्षण नहीं है। लालची और सब कुछ हड़पने वाले तुच्छबुद्धियों के बीच अधिक समय तक रहना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। ऐसे में अपना अलग रास्ता चुनना ही स्वाभिमानियों को शोभा देता है।

उन्होंने त्याग-पत्र नहीं लिखा है, एक ऐतिहासिक दस्तावेज लिख दिया है। साहस के साथ निर्णय लेने का दस्तावेज। सब्र के इम्तहान का प्रमाण-पत्र। बेशक यह सियासत है। सेवा अपनी जगह है, लेकिन ताकत तो ओहदों से आती है। इसलिए इस एक्शन स्टोरी में एक श्रेष्ठ सामंत की तरह आने वाले कल का सब कुछ बारीकी से तय किया ही होगा।

चंबल के डरावने बीहड़ों और असरदार पानी के इलाके में पूरी राजनीति का समाजशास्त्र अब बदलेगा। महल को खुलना होगा। श्रीमंत के आभामंडल काे अब तोड़ने की ज़रूरत है। महलों के वैभवशाली राजमार्ग से लोकप्रिय जननायक निकलें, कितना मनोरम दृश्य होगा।

लेकिन सेक्युलर ढाँचे में ढले श्रीमंत जय-जयश्रीराम में कितने सहज होंगे? 370 का टंटा भी अटका है। सीएए सुलगकर शांत हो रहा है। कॉमन सिविल कोड और जनसंख्या नियंत्रण नीति का इंतज़ार है। यह नया व्याकरण है, जिस पर श्रीमंत के मुखारविंद से नए अंदाज के डायलॉग सुनना सबके लिए रोचक होगा।

अब उनके भाषणों में नेहरू नहीं, शिवाजी, राजमाता और मोदी के उद्धरण आएँगे। अयोध्या से उनकी राजसी तस्वीरें आएँगी। वे कश्मीर की घाटी में गूंजेंगे। क्या यह मान लिया जाए कि हिंदुत्व को एक और प्रभावी प्रवक्ता मिल गया है?

ऐसी कहानियाँ और उनके किरदार अचानक उत्पन्न नहीं होते। इनके बीज बहुत पहले अंकुरित हो चुके होते हैं। फिर हर वाक्य की रचना बहुत सोच-समझकर होती है। कौन क्या करेगा? सबसे पहले कौन किससे मिलेगा? उससे मिलकर क्या कहेगाा? भीतर क्या कहेगा? बाहर क्या बताएगा?

दिल्ली में कौन-सा दृश्य होगा, भोपाल में कौन-सा और बेंगलुरू में कौन-सा? किस लोकेशन का इंचार्ज कौन? विमान-रिसॉर्ट का मैनेजर कौन? आखिर में कौन उतरेगा? कौन किसकी अगवानी कहाँ करेगा? त्याग-पत्र में क्या लिखा जाएगा? तारीख कौन-सी लिखी जाएगी? भेजा कब जाएगा? यह मेगा बजट की मल्टीस्टार पॉलिटिकल सस्पेंस थ्री-डी की बाहुबली जैसी मूवी है। सब कुछ भव्य। प्रभावी। पलक झपकना भूल जाएँ।

दृश्य-3

राजभवन के पीछे सर्च लाइट में कोई हेराफेरी करते हुए नज़र आ रहा है। मिलीभगत में खूब खुसफुस हो रही है। वह चुपचाप अपने एजेंडे पर यूँ लगा है जैसे असल चलाएदार यही हो। उसकी करतूतें बहुतों को नागवार गुज़र रही हैं।

कहानी के इस खतरनाक मोड़ पर पहुँचते ही एक सब दूर सुनाई देने वाली धमाकेदार दुर्घटना होती है। सब कुछ ढहने लगता है। हेराफेरी करने वाला वह एकमात्र आत्मघाती सिरफिरा कौन है? दृश्य में 2019 में जोरदार दचका खाने वाला एक चतुर राजा यहाँ से वहाँ जाता दिखाई देता है। उसने वही किया, जो सत्ता में आने वाला हर सामंत करता है। अपनी अगली पीढ़ी की सत्ता में सुरक्षित प्राण प्रतिष्ठा। और भविष्य में उसकी चुनौतियों को चतुराई से खत्म करने की हर मुमकिन तरकीबें। बुरी आदतें तो अक्सर स्थाई होती ही हैं।

यह एक खोई हुई जागीर के संयोग से ही फिर से मिलने पर मची बेलगाम लूटमार का लालची दृश्य है। जब ऊपर बादशाहत कमज़ोर और दिशाहीन हो तो नीचे लालची छुटभय्यों की मनमानी मूर्खताओं का यही नज़ारा इतिहास के ऐसे फरेबी मोड़ पर सदा ही दिखाई दिया है।

2018 की जीत को एक लावारिस जागीर मानकर अपना हक जमाकर कौन बैठ गया था? श्रीमंत को ऐसी अपमानजनक स्थिति में लाने वाला पराजित, कथन-कलंकित, चिरपरिचित धूर्त धृतराष्ट्र कौन है? किसके लिए 15 साल बाद लौटी सत्ता अपने अंडे-बच्चे कुर्सियों पर रखने का खुशगवार मौसम बन गई?

हर शाख पर नए शिकारी परिंदे गर्दनें घुमाने लगे। तबादलों के प्राचीन लाभदायक व्यवसाय ने कुपोषित योद्धाओं को डेढ़ दशक की दरिद्रता से ऊपर उठाने में भरपूर सहायता की। विश्वविद्यालयों में वैचारिक गंदगी फैलाने की राजाजी की सबसे विकट जल्दबाजी हैरत में डालने वाली थी। जैसे कोई गंदगी से शुद्धिकरण करे!

तभी सुनाई दिया सत्ता के नाथ संप्रदाय के अधिष्ठाता की तरफ से श्रीमंत को सड़कों पर संघर्ष करने का अभिशाप! जो अभिशाप को वरदान में बदल दे, वही तो असल विजेता है।