व्यंग्य
आम प्रधान राष्ट्र नहीं, बेल प्रधान देश है भारत- सिरफिरों का सप्ताहांत

ग्रीष्म ऋतु के आगमन के साथ आज कल एक और शगल प्रारंभ हो जाता है आम की प्रजातियों के मध्य महानता का संघर्ष। लंगड़े की सरकार बनेगी या दशहरी की या अल्फांसो- यह महती प्रश्न राष्ट्र के समक्ष प्रस्तुत हो जाता है यदि पक्ष के प्रधानमंत्री चुनाव के लिए न उतर रहे हों और विपक्ष के युवराज अपना 12वाँ रीलॉन्च न कर रहे हों। 

विपक्ष के एक अन्य राजनैतिक परिवार के सुदर्शन युवराज टिकटॉक में अपने लिए एक वैकल्पिक रोज़गार ढूँढ चुके हैं, परंतु राजनीति के रुप्पन बाबू जब तक राजनीति को अपनी ओर से नमस्ते न कर दें, पत्रकारिता का पुनीत कर्त्तव्य है कि उनके रीलॉन्च का चक्र अनवरत चलता रहे। 

बहरहाल प्रश्न एक फल एवं उसके नकचढ़े अभिजात्य का था। आम भी अपने नाम के राजनेता की भाँति अब कहने को आम रह गया है। जैसे आम आदमी का ध्वज ले कर चलने वाले दिल्ली के मालिक हो गए हैं, फल के रूप में भी आम पर अभिजात्य का गुलाबी रंग चढ़ गया है, जिसकी नासिका आकाशोन्मुखी है। 

आम, अपनी सभी अभिजात्य-सुलभ धरती से जुड़े होने के अभिनय के बाद भी अपनी अभिजात्य अकड़ को बनाए रखता है। सत्य यह है कि यदि जून की चिलचिलाती दुपहरी में कोई फल वाकई में आम है तो वह है बेल। ग़ालिब की तुर्की जहानत को एक ओर रखें और सत्य के धरातल पर देखें तो बेल या बिल्व फल ही भारतीय संस्कृति से जुड़ा फल है।

बेल ही वह सड़क पर चलता श्रमिक है जो राष्ट्र निर्माण का सार्थक कार्य करता है जब आम वातानुकूलित वातावरण में चीनी बर्तनों में सज कर आत्मनिर्भर भारत के नारे लिखता है। आम्रपत्र धनी एवं संपन्न विष्णु का हृदय भले ही जीत ले, फक्कड़ देशी भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए बेलपत्र ही अनिवार्य होता है।

भारत बेल का देश है, भारतीय राजनीति बेल पर आधारित है। विगत कुछ समय से बेल पर ही राजनीतिक विमर्श हो रहा है। न्यायपालिका के बेल देने और न देने पर प्रश्न उठ रहा है। न्यायपालिका वाली बेल का भारतीय राजनीति में वही स्थान है, जो बेल फल का आम भारतीय के जीवन में है।

बड़ा नेता वही होता है जो बेल प्राप्त कर सकता है, और अपराधियों को बेल दिला सकता है। राजनीति में वह नेता भी स्थान बना सकता है जिसकी चुनाव में जमानत जब्त हुई हो यदि वह अपने वालों की जमानत करा सके।

यहाँ अपने वालों शब्द का विशेष महत्त्व है। जब बेल अपने वाले को मिलती है तो वह शिव शंभु का प्रसाद है, यदि बेल दूसरे वाले को मिले तो सड़क किनारे रस के ठेले पर पड़ा निर्धन का फल है। अपने वाले को बेल देने वाला जज न्याय का रक्षक है, उनके वाले को बेल देने वाला मिला हुआ है।

पराक्रमी नेता अपने चमचों को बेल के सुरक्षा चक्र में रखता है। उसके वाले सड़क पर किसी को गोली मार भी दें तो बेल का अधिकार रखते हैं। किंतु दूसरे का खिलौना बंदूक चलाने वाला भी बेल पा जाए तो भारत की न्याय व्यवस्था पर प्रश्न उठाने का अवसर प्रस्तुत हो जाता है।

सफूरा जरगर को बेल नहीं मिल रहा, तो लोकतंत्र खतरे में है। लोटन निषाद के कथित हत्यारों को मिल रही है तो भी लोकतंत्र खतरे में है। बेल क्यों मिलती है और कब मिलनी चाहिए, यह शोध का विषय है। अपना नेता बेल पर हो तो नैतिकता की प्रतिमूर्ति है, विपक्षी नेता बेल पर हो तो लोकतंत्र लड़खड़ा रहा है।

हमने बहुत समय इसे आम प्रधान राष्ट्र समझा। भारत बेल प्रधान देश है। आम अपने मिथ्या गर्व में फूलता रह सकता है। तथ्य यह है कि ख़ास लोटन निषाद की हत्या के बाद बेल प्राप्त करता है, ख़ास की बेल के लिए मध्यरात्रि को न्यायपालिका के द्वार खुल जाते हैं, परंतु आम विचाराधीन क़ैदी बन कर आजीवन कारावास में सड़ सकता है। आम के प्रारब्ध में उत्कृष्ट नागरिक बन कर गुठली हो जाने तक चूसा जाना है। 

राष्ट्र बेल का ही है। बेल ने हो तो इस महान राष्ट्र की राजनीति का अस्तित्व कठिनाई में पड़ जाएगा। बेल ही भारतीय राजनीति में वीरता, शौर्य एवं पुरुषार्थ जैसे सिद्धांतों को जीवित रखता है। भारतीय राजनीति की जिन छतों पर सज्जनता की खूबसूरत रातरानी की बेल सजती है उसी के दूसरी ओर बेल के निश्चिंत आश्वासन के तले हिंसा की गुलेल नागरिकों का निशाना लगाए बैठी रहती है।