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बिनाका गीतमाला की लोकप्रियता के कारण हुआ विविध भारती सेवा का आरंभ (गिटार- 2)

पिछली बार भारतीय फिल्म संगीत में गिटार के बारे में आपको बताते-बताते (यहाँ पढ़ें), मैं एक कहानी अधूरी छोड़कर आपसे विदा ले गया था। आइए पहले उस कहानी को पूरा करते हैं और फिर भारतीय फिल्मों में गिटार के जादू को समझने का प्रयास करेंगे।

तो जब केसकर साहब ने ऑल इंडिया रेडियो पर अपनी नकेल कस डाली तो इसका फायदा उठाया रेडियो सीलोन ने और श्रोतागणों को एक अमूल्य भेंट पेश कर डाली जिसका नाम था बिनाका गीतमाला। यह कार्यक्रम सिर्फ और सिर्फ भारतीय फिल्मी गीतों को समर्पित था।

जिस व्यक्ति ने इस कार्यक्रम को अमर करते हुए खुद को एक अलग धरातल पर खड़ा कर दिया उनका नाम था अमीन सयानी। उन्होंने अपनी मनमोहक आवाज़ और अंदाज़ से सबका दिल जीत लिया था। बिनाका गीतमाला में अमीन सयानी लोगों की गीतों की मांगों को पूरा करते हुए हिंदी फिल्म गीत प्रस्तुत करते थे।

रात आठ बजे सड़कें सुनसान होने लगती थीं और लोग अपनी डायरी में गीतों की लिस्ट बना कर रखने लगे थे। जैसे-जैसे भारत में रेडियो सीलोन की लोकप्रियता बढ़ी, केसकर का प्रभाव कम होता गया और सरकार को प्रतिबंध हटाने के लिए मजबूर होना पड़ा।

अंततः 1957 में विविध भारती सेवा प्रस्तुत की गई जो नॉन-स्टॉप फिल्म संगीत प्रसारण करती थी। और फिर इसी के साथ आने वाले दशक में आती है सुपरहिट फिल्म चाइना टाउन। शक्ति सामंत द्वारा निर्देशित और निर्मित फिल्म में संगीत रवि ने दिया था।

जी हाँ, इसमें गिटार पर अपने हाथ आज़मा रहे थे शम्मी कपूर। शंकर-जयकिशन कहाँ चूकने वाले थे। उन्होंने भी दिल अपना और प्रीत पराई के सुपर हिट गीत में गिटार से नाता जोड़ ही डाला। आप कहीं यह समझ बैठे हों कि 1950 के दशक के पहले हिंदी फिल्म में गिटार का उपयोग ही नहीं हुआ तो ऐसा नहीं है।

अभी तक मैं आपको परदे पर गिटार का जादू दिखा रहा था। अब मैं आपको ले चलता हूँ करीब सौ साल पहले जब सहारनपुर में 12 अक्टूबर 1929 को डेविड कुमार का जन्म हुआ था। एक रोज़ सर्कस में वहाँ बज रहे बैंड को देख डेविड इतने उत्साहित हो गए कि गिटार हाथ में थाम लिया।

अगला कदम था 16 साल की आयु में ही स्कूल से भागकर बंबई आना और नौशाद से मिलना। उन्होंने अपने हुनर से नौशाद को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने उन्हें अनमोल घड़ी में नूरजहाँ और सुरैया के साथ गाने रिकॉर्ड करने के लिए एक ब्रेक डाला था।

इसके बाद दर्द, अंदाज़ और दुलारी में भी डेविड कुमार ने अपना कमाल दिखाया। कुछ समय बाद राम गांगुली ने उन्हें राज कपूर की आग के दो गानों में बजाने के लिए कहा, जो दोनों ही लोकप्रिय साबित हुए।

अनिल बिस्वास ने अनोखा प्यार, गजरे, प्यार की जीत और लाडली; और हुस्नलाल भगत राम ने उन्हें जलतरंग, राखी, सावन-भादो, आधी रात और बिरहा के लिए डेविड के गिटार को ही चुना।

उनके लिए अगला बड़ा ब्रेक खेमचंद प्रकाश की महल के रूप में आया। उनके गिटार ने “आएगा आने वाला” के लिए वह प्रसिद्ध दीवार घड़ी के टन-टन की आवाज़ निकाली थी।

यह वही गीत है जिसे ख़ास अंदाज़ देने के लिए एक बड़े हॉल में रिकॉर्ड किया गया था और लता मंगेशकर ने धीरे-धीरे माइक तक चलते हुए इस गीत को रिकॉर्ड किया था। उन्होंने इस फिल्म में अशोक कुमार और मधुबाला के बीच के अधिकांश शुरुआती दृश्यों के पार्श्व संगीत में भी अपना कमाल दिखाया था।

यहाँ उनके साथ थे एक प्रतिष्ठित वायलिन वादक, सहारनपुर के एक अन्य संगीतकार, जिन्होंने उनके साथ गिटार भी बजाया था। उस दोस्त का नाम था वान शिपली, जिनके बारे में हम आगे आने वाले दिनों में बात करेंगे।

फिलहाल डेविड कुमार की कहानी को अगले सप्ताह के लिए छोड़ देते हैं और लेते हैं आपसे विदा इस खूबसूरत गीत के साथ जिसे रोशन साहब ने संगीतबद्ध किया था।

मनीष श्रीवास्तव इंडिका टुडे जैसे कई मंचों से जुड़े लेखक हैं। वे @shrimaan के माध्यम से ट्वीट करते हैं।