संस्कृति
गुरु पूर्णिमा- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भगवा ध्वज को क्यों देता है गुरु का स्थान

भगवा ध्वज है अखिल राष्ट्र गुरु, शत-शत इसे प्रणाम।
लेकर भगवा, ध्येय मार्ग पर, बढ़े चलें अविराम।।

संघ की विचारधारा कोई नया आविष्कार नहीं है। इसने अपने परम् पवित्र सनातन हिंदू धर्म, अपनी पुरातन संस्कृति, अपने स्वयं सिद्ध हिंदू राष्ट्र और अनादि काल से प्रचलित भगवा ध्वज को ही गुरु माना है। आइए, गुरु पूर्णिमा के अवसर पर एक गुरु के रूप में भगवा ध्वज की भूमिका को समझते हैं।

व्यक्ति चाहे जितना भी महान् हो, वह निरंतर अचल और पूर्ण नहीं रह सकता। इसीलिए उस सनातन संस्कृति के प्रतीक भगवा को गुरु माना गया है जिसमें हमारा इतिहास, परंपरा-राष्ट्र के स्वार्थ त्याग, राष्ट्रीयत्व के सभी मूल तत्वों का समन्वय हुआ है।

इससे जो स्फूर्ति हमें प्राप्त होती है वह अन्य किसी भी मानवीय विभूति से प्राप्त होने वाली ऊर्जा की अपेक्षा श्रेष्ठ है। भगवा रंग और भगवा संस्कृति हमारे सनातन राष्ट्र की पहचान है। मानव इतिहास के पूरे काल खंड में संपूर्ण राष्ट्र जीवन का प्रत्यक्षदर्शी गवाह भगवा ध्वज ही है।

ध्वज किसी भी राष्ट्र के चिंतन और ध्येय का प्रतीक तथा स्फूर्ति का केंद्र होता है। इस भगवा ध्वज से स्वयंसेवक ऊर्जा और प्रेरणा लेकर भारत माता को परम् वैभव पर पहुँचाने के कर्म यज्ञ में अपनी आहुति डालते हैं।

भगवा रंग उगते हुए सूर्य के समान है जो कि ज्ञान और कर्मठता का प्रतीक है। भगवा ध्वज यज्ञ की ज्वाला के अनुरूप होने के कारण त्याग, समर्पण, जन कल्याण की भावना, तप, साधना आदि का आदर्श रखता है। यह समाज हित में सर्वस्व अर्पण करने का प्रतीक है।

स्वामी रामतीर्थ भगवा रंग के बारे में कहते हैं, “एक दृष्टि से मृत्यु तथा दूसरी दृष्टि से जन्म ऐसा दोहरा उद्देश्य यह रंग पूरा करता है।” भगवा ध्वज का सतयुग से कलयुग का संपूर्ण इतिहास देखने के बाद यह ध्यान में आता है कि हिंदू समाज और भगवा ध्वज एक-दूसरे से अलग करना संभव नहीं है।

हिंदू राष्ट्र, हिंदू समाज, हिंदू धर्म, हिंदू संस्कृति, हिंदू जीवन पद्धति, हिंदू तत्वज्ञान इन सबका भगवा ध्वज से अटूट नाता है। त्याग, वैराग्य, निःस्वार्थ वृत्ति, शौर्य, देश प्रेम ऐसे सब गुणों की प्रेरणा देने का सामर्थ्य भगवा ध्वज में है।

भगवा ध्वज महाभारत में अर्जुन के रथ पर भी विराजमान था। भगवा रंग दक्षिण के चोल राजाओं, छत्रपति शिवाजी महाराज, गुरु गोविंद सिंह और महाराजा रंजीत सिंह की पराक्रमी परंपरा और सदा विजयी भाव का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक है।

इसमें यदि सम्राट हर्ष और विक्रमादित्य का प्रजा-वत्सल राज्य अभिव्यक्त होता है तो व्यास, दधीचि और समर्थ गुरु रामदास से लेकर स्वामी रामतीर्थ, स्वामी दयानंद महाऋषि अरविंद, रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद तक का वह आध्यात्मिक तेज भी है।

आदि शंकर ने घोषित किया कि राष्ट्र को जोड़ते हुए ही धर्म प्रतिष्ठित हो सकता है। इसी पर चलते हुए पंजाब में पृथकवादी ताकतों के विरुद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दीवार की तरह खड़ा है।

मोगा और डबवाली में शाखा में हमला होने पर स्वयंसेवकों का बलिदान हो चाहे पंजाब प्रांत के सह-संघचालक ब्रिगेडियर जगदीश गगनेजा का बलिदान हो, असंख्य बलिदान स्वयंसेवकों द्वारा अपने तपोमार्ग पर चलते हुए दिए गए हैं, भगवा ध्वज द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलते हुए दिए गए हैं।

भगवा ध्वज से ऊर्जा और नव स्फूर्ति लेकर अखंड भारत का संकल्प लेते हुए सभी में यह आत्मविश्वास भरना होगा कि भारत माता को परम् वैभव पर पहुँचाने का अपना सभी का प्रयास शीघ्र ही निकट भविष्य में पूरा होगा।