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सैमी दौला का “चांद-सा रोशन चेहरा” उन्हें महान् संगीतकार बनाता है (सरगम के सितारे)

मुझे उम्मीद है कि अब तक गिटार का जादू आप सभी के सर पर चढ़कर बोल रहा होगा। आपको याद होगा कि जब मैं पंचम के नवरत्न आपके सामने लेकर आया था तब मैंने आपको सिर्फ भानु दा और भूपी दा से यहाँ मिलवाया था। पंचम दा के ही एक ख़ास साथी गिटार वादक टोनी वाज़ साहब से भी आपकी मुलाकत मैं पहले यहाँ करवा चुका हूँ।

लौटकर आता हूँ उनके ऊपर जिन्होंने कुमार साहिब यानी डेविड कुमार में नंगे पैरों में विभाजन के मुश्किल समय में चप्पल पहनाई थीं। वे थे कुमार साहिब के चचेरे भाई सैमी दौला।

वैसे तो कहा जाता है कि नैय्यर साहब के लिए ज़्यादातर हज़ारा सिंह साहब ही गिटार बजाया करते थे लेकिन इस बार दौला साहब को जब मौका मिला तो वे इस एक धुन से अपने को हमेशा के लिए अमर कर गए। जब आप यह धुन सुनेंगे तो आप बिना बोलों के भी इस गीत को पहचान सकते हैं।

शानदार संगीतकार होते हुए भी सैमी दौला ने बॉम्बे में अपना निवास स्थल नहीं बनाया था, बल्कि वे लुधियाना में ही रहते रहे। लुधियाना में रहते हुए वे संगीत के कार्यक्रमों में शिरकत किया करते थे और काम आ जाने पर कभी-कभी बॉम्बे का चक्कर लगा आया करते थे।

उनके चचेरे भाई-बहनों द्वारा डेविड कुमार साहब और दौला साहब को गुमनामी के जिस दौर से निकाला गया यह कम नहीं है और इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं। सैमी दौला और उनके पिता के बारे में उनके रिश्तेदारों ने एक किस्सा साझा किया था।

“दौला” वास्तव में एक फारसी उपाधि है जैसा कि आप “सिराज-उद-दौला” या “इत्माद-उद-दौला” में देख सकते हैं और यह उपाधि मुगलों द्वारा कुछ ही लोगों को दी जाती थी। इससे यह बात तो तय हो ही जाती है कि सैमी दौला के पैतृक परिवार में कुछ बहुत ही शानदार, शक्तिशाली और धनी पूर्वज शामिल रहे होंगे।

जब सैमी दौला का जन्म हुआ, तब तक दौला लंबे समय से इस्लाम से ईसाई धर्म में परिवर्तित हो चुके थे, लेकिन जैसा कि उत्तर भारतीय ईसाइयों में अक्सर देखा जाता था, उन्होंने अपनी संतानों को जो नाम दिए, वे मुस्लिम और पश्चिमी नामों का मिश्रण बने रहे।

इसीलिए अल्फ्रेड मोइनुद्दीन दौला ने अपने बेटे का नाम सैमुअल नसीरुद्दीन दौला रखा। फिर उसके बाद विभाजन हो जाता है और पिता अल्फ्रेड दौला को लगता है कि मुस्लिम विरोधी क्षेत्र में रहते हुए मुस्लिम नाम रखना खतरनाक हो सकता है।

इस कारण वे अपना नाम अल्फ्रेड महादेव दौला रख लेते हैं और बेटे का नाम सैमुअल नरिंदर दौला कर देते हैं। आप अपनी सुविधा के लिए इसे गुरमीत राम रहीम सिंह जैसा कुछ मान सकते हैं।

सैमी दौला द्वारा बजाए गए जिन गीतों का पता चल पाया है, उसमें बस कश्मीर की कली, फिर वही दिल लाया हूँ, तुमसा नहीं देखा और चाइना टाउन शामिल हैं। इन सभी में “चांद-सा रोशन चेहरा” ही उन्हें महान् संगीतकारों की श्रेणी में रखने के लिए शामिल है। विदा लेने से पहले आपको दौला साहब के एक लाइव कार्यक्रम की झलकी दिखाता चलता हूँ।