विचार
फिल्म आरआरआर की व्यावसायिक सफलता और उसका क्षीण इतिहासबोध

आरआरआर क्या मात्र एक फिल्म है? नहीं! कत्तई नहीं! बल्कि मनोरंजन, राजनीति और इतिहासबोध के मिश्रण से प्रेरित व्यवसायिक सफलता के कीर्तिमान का भी नाम है। सिनेमा आप अगर हॉल में देख रहे हैं तो इसमें संदेह नहीं कि मनोरंजन करने में किसी भी हिंदी सिनेमा से यह कोसों मील आगे है, और हमें तो यहाँ तक लगा, जो अतिशयोक्ति भी हो सकता है, कि राजमौली अगर वर्ष में पाँच-छह सिनेमा भी बना दें तो बॉलिवुड को मनोरंजन के लिए सिनेमा बनाने की कोई आवश्यकता ही नहीं, दक्षिण सिनेमा की समुद्री आंधी में वैसे भी हिंदी सिनेमा की साँसें फूली हुई हैं।

इस फिल्म में राजनीतिक निहितार्थों को ढूंढें तो वह सबकुछ है जो वर्तमान राजनीति के केंद्र में है, जैसे श्रीराम शब्द की राजनीतिक माँग के अनुरूप इसमें नायक का चित्रण किया गया है, जो मनोरम है। और इतिहासबोध की बात करें तो यह ऐतिहासिक नायकों पर बनी एक “वास्तविक” फिल्म होने का आभास तो दे ही देती है।

इस फिल्म में कथ्य और शिल्प से अधिक जिस चीज़ का सबसे अधिक प्रयोग किया गया है वह है आधुनिक तकनीक और भारी-भरकम सेट जो कि इस निर्माता की फिल्मों की एक विशेषता भी रही है, और दर्शक को आकर्षित करने के लिए यह भी महत्व रखता है, जिसे हिंदी सिनेमा में संजय लीला भंसाली की फिल्मों में भी देखा जा सकता है।

ऐतिहासिक विषयों पर बनी फिल्मों की सफलता अनिवार्य रूप से ऐतिहासिक तथ्य नहीं होते, लेकिन दुर्भाग्य से इस फिल्म ने कुछ ऐसा ही इतिहास रचा है। ऐसी फ़िल्में भले ही यह दावा करें कि ये डॉक्यूमेंटरी नहीं हैं, बल्कि इसमें कल्पना है, अनुमान है, और फैंटेसी है, लेकिन भारत का एक बड़ा दर्शकवर्ग उसे ही अंतिम प्रामाणिक इतिहास मानकर चलता है और उसी रूप में अपने अतीत को स्मृति में रखता है।

इतिहास मनोरंजन नहीं है, यह संवेदनशील विषय है। सिनेमा जैसे अत्यंत लोकप्रिय माध्यम में इसे दिखाने के लिए गंभीर शोध करने की आवश्यकता होती है, लेकिन इसे इतने गैर-जिम्मेवार तरीके से दिखाया जाता है कि वास्तविक तथ्य मिट जाते हैं और कल्पना या फैंटेसी निर्विवाद तथ्य के रूप में लोक-विमर्श में चले जाते हैं। यह भारतीय सिनेमा की एक भयावह त्रासदी है।

कहा गया है- राजनीति से आप संबंध रखें न रखें, लेकिन राजनीति आपसे पूरा संबंध रखती है। आप कभी गैर-राजनीतिक नहीं होते, और अगर ऐसा दावा करते हैं तो इसका अर्थ है या तो सामाजिक या राजनीतिक चेतना विकसित ही नहीं हुई है या फिर आपकी राजनीति अधिक परिपक्व और दूरदर्शी हैं। और यह सिनेमा निर्माण पर भी लागू होती है।

सिनेमा और राजनीति के बीच वही संबंध है जो नेताओं और अभिनेताओं के बीच है। तय करना कठिन हो जाता है कि अभिनेता बड़ा नेता है या फिर नेता बड़ा अभिनेता। सिनेमा भी समकालीन राजनीतिक हितों और आकांक्षाओं को ध्यान में रखकर बनाया जाता है। स्वतंत्रता से लेकर अबतक सिनेमा निर्माण को देखें तो इसके भीतर छुपे राजनीतिक झुकावों, जैसे राईट, लेफ्ट, आंबेडकराईट आदि विचारधाराओं को आसानी से समझा जा सकता है।

सत्ता के लिए सिनेमा एक ‘कोमल-विचारधारात्मक’ नियंत्रण की तकनीक रही है जिसके द्वारा सत्ता अपने कार्यों व उदेश्यों को व्यापक जनसमुदाय में वैधता प्रदान करवाती है। और इसलिए सेंसर-बोर्ड से लेकर सिनेमा की ग्रेडिंग तक की प्रणाली विकसित की गई। सिनेमाई संसार में कलात्मक स्वतंत्रता वस्तुतः एक मिथ्या है, जो अगर कहीं अपने अस्तित्व में है भी तो उसका कोई जीवित अस्तित्व नहीं।

आरआरआर एक ऐसी ही फिल्म है जो प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक तटस्थता के साथ दिखती प्रतीत होती है, लेकिन वास्तविकता इसके उलट है। इसने एक साथ ही दो विपरीत राजनीतिक विमर्शों के माध्यम से संपूर्ण भारतीय दर्शकवर्ग को प्रभावित करने का प्रयास किया है। वर्तमान राजनीति और समाज के बीच जो कुछ भी अच्छा-बुरा घट रहा है उसका व्यावसायिक लाभ लेने में यह पूरा सफल रहा है।

इसमें एक तरफ हिंदूवादी परंपरा के सबसे आलोच्य प्रतीकों, जैसे ‘जनेऊ’ आदि को सकारात्मकता के साथ संभवतः पहली बार मजबूत तरीके से दिखाने का भयंकर दुस्साहस भी है, और साथ-साथ वर्तमान हिंदुत्ववादी बहाव के विपरीत जाकर मुस्लिम दर्शकवर्ग को भी सिनेमा हॉल में रिझाने के लिए पर्याप्त सामग्री रखी गई है।

ऐसा प्रतीत होता है निर्माता-निर्देशक एक साथ ही ‘सेकुलरिज्म’ और हिंदूवादी राजनीति दोनों के ही स्वाद लेना चाहते हैं। यह एक साथ ही सबको खुश करनेवाली मासूमियत भरी लेकिन बेहद चालाकीपूर्ण कलात्मक अभिव्यक्ति है। राजमौली के सिनेमा की राजनीति उपरोक्त “गैर-राजनीतिक” वाली ही राजनीति मानी जा सकती है, जो वर्तमान राजनीति में अपना हित देखते हुए भविष्य की बदलती हुई राजनीति के लिए भी जगह बनाए रख रही है।

इतिहास के दो महान् नायकों के इर्द-गिर्द घूमती इस कहानी ने सबसे अधिक अत्याचार ऐतिहासिक तथ्यों के साथ ही किया है। इसने गोंड नेता कुमरम भीम के क्रांतिकारी जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं को अनछुआ छोड़ दिया, जैसे कि उनकी कम्युनिस्ट पार्टी से निकटता और उनके योगदानों पर कोई चर्चा नहीं है।

इसी तरह उनके जीवन का अधिकांश हिस्सा निज़ामों, उसके तालुकदारों या जमींदारों से संघर्षों में बीता, यहाँ तक कि उनकी हत्या भी वर्ष 1940 में आदिलाबाद के घने जंगलों में निज़ाम की पुलिस द्वारा की गई जिसका नेतृत्व आसिफाबाद के तालुकदार अब्दुल सत्तार कर रहे थे। ऐसा नहीं है कि राजमौली को यह बात पता नहीं होगी, लेकिन उन्हें यह अच्छे से पता है कि उत्तर-भारतीय लोग दक्षिण-भारत के बारे में अधिक जानकारी नहीं रखते, जो हद तक सच भी है, और इसी का लाभ उठाते हुए राजमौली ने कुमरम भीम जैसे महानायक को ‘बजरंगी-भाईजान’ बना दिया।

दावे के साथ कहा जा सकता है कि उत्तर भारत में ऐसे दर्शक ऊंगली पर गिने जा सकते हैं जो फिल्म देखने से पहले इन नायकों का नाम भी सुने हों। ऐसे में उनके भीतर किस तरह का इतिहासबोध विकसित हुआ होगा! फिल्म देखकर दर्शक, विशेषकर उत्तर-भारतीय दर्शक इस भ्रम में ही रहा कि उनका संघर्ष मात्र पश्चिमी उपनिवेशवाद से ही था और वह भी मात्र एक बच्ची को बचाने को लेकर।

जल-जंगल और ज़मीन के प्रश्नों पर उनके अवदानों की घोर उपेक्षा इस फिल्म में की गई है। फिल्म ने कुमरम भीम के कद को बढ़ाया नहीं, बल्कि हद दर्जे तक छोटा ही कर दिया। और लगता है राजमौली इस फिल्म में हिंदी सिनेमा के एजेंडे वाली सोच से बुरी तरह प्रभावित हो गए। उन्होंने इस फिल्म में रोमांस करती ‘गोरी-मेम’ को तो दिखाया जिसका हृदय इतना कोमल था कि भारतीय मजदूरों के प्रति उसमें “दया” और “करुणा” की भावना थी, लेकिन उन्हें कुमरम भीम की पत्नी सोमबाई का वह अद्वितीय संघर्ष नहीं दिखा जिसमें भीम की मृत्यु के बाद वह गोद में छोटी बच्ची को लेकर सशत्र संघर्ष में कूद पड़ी थी। इनके संघर्ष में आधुनिक तेलंगाना आंदोलन के भी बीज छुपे थे*। राजामौली ने भीम और उनकी पत्नी दोनों के ही महान् संघर्षों को एक ही झटके में विद्रूपित कर दिया।

इसी तरह फिल्म के दूसरे ऐतिहासिक नायक अल्लूरी सीताराम राजू जिनका उपनिवेश-विरोधी आंदोलन में बड़ा योगदान रहा है। उन्हें भी फिल्म के लगभग अंत तक अंग्रेज़ों के एक ऐसे अधिकारी के रूप में ही दिखाया गया जिनका अंतिम उद्देश्य मात्र अपने गाँव के लोगों के लिए हथियार इकठ्ठा करना था।

इशाई मिशनरियों के विरुद्ध अभियान रहा हो, या फिर वन अधिकार या पोडू (पारंपरिक खेती) को लेकर जनजातीय आंदोलनों का नेतृत्व, सबमें उनका करिश्माई योगदान रहा। इशाई मिशनरियों को उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के एक उपकरण के रूप में देखा था और इसके लिए जनजातियों में अपने सांस्कृतिक धरोहरों के लिए एक आत्म-सम्मान के भाव विकसित करने का प्रयास किया, लेकिन राजमौली को यह भी नहीं दिखा, क्योंकि दक्षिण के ईसाइयत में मतांतरित विशाल दर्शकवर्ग को इससे दुख हो सकता था।

उनकी वीरता का आतंक इतना था कि अंग्रेज़ों को उन्हें पकड़ने के लिए उस समय में उनपर 10,000 रुपये का ईनाम और उनके सहयोगी घटाम डोरा और मल्लम डोरा पर 1-1,000 का ईनाम रखना पड़ा था तब जाकर बड़ी कठिनाई से उन्हें मारा जा सका। उनकी मृत्यु के उपरांत नेहरू, गांधी और सुभाष बोस तक ने उनकी वीरता और शौर्य की प्रशंसा की थी। भारत सरकार ने उनके नाम पर वर्ष 1986 में एक डाक-टिकट भी जारी किया था।

निर्माता ने इतने महान योद्धाओं पर एक व्यवसायिक फिल्म बनाने में इनके जीवन के महत्वहीन पक्षों का मनमाना प्रयोग किया और उनके असली चरित्र और संघर्षों को जान-बूझकर गौण कर दिया। निर्माता के लिए लाभ केंद्र में था, न कि कुमरम भीम और अल्लूरी सीताराम राजू। अल्लूरी सीताराम राजू के माध्यम से उन्होंने एक तरफ हिंदू दक्षिणपंथी शक्तियों को खुश करने का सफल प्रयास किया और कुमरम भीम को आधी फिल्मों तक एक मुस्लिम गैरेज मिस्त्री बनाकर सेक्युलर होने की भी खाल ओढ़े रखी।

इस फिल्म में इतिहास के एक महा-पाषाण को किनारे से काटकर एक छोटी सी आकृति गढ़ी गई और शेष हिस्से को पुनः काल के गर्भ में ही दफ़न कर दिया गया। राजमौली ने ‘बाहुबली’ की सफलता से जो अखिल भारतीय दर्शकवर्ग बनाया था उसके लिए ही उन्होंने एक विकृत इतिहास का कुपाठ किया। विकृत इतिहासबोध से बेहतर इतिहासबोध का न होना है।

*- Keyoor Pathak  & Chitranjan Subudhi (2021), Political Movements and Forgotten Women of Telangana, in Antyaja: Indian Journal of Women and Social Change (1-5)

केयूर पाठक सीएसडी, हैदराबाद से पोस्ट-डॉक्टरेट हैं और बिधु भारद्वाज मोतिहारी सेंट्रल जेल, मोतिहारी में जेल सुपरिटेनडेंट हैं।