विचार
दक्षिण भारतीय फिल्मों की ओर क्यों आकर्षित हुआ है हिंदी दर्शकवर्ग

हाल के समय में जब कई बॉलीवुड फिल्में प्रसिद्ध “सितारों’ और ठीक-ठाक विषय चयन और निर्देशन आदि के बावजूद बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुँह गिर पड़ीं, या इस महामारी काल में अपने रिलीज़ होने की तारीख को ही बढ़ा दिया, तो वहीं दूसरी तरफ “मसाला-टाइप” मानी जाने वाली दक्षिण-भारतीय फिल्मों ने अपनी सफलता और लोकप्रियता के झंडे हिंदी पट्टी में भी गाड़ दिए।

यह सफलता मात्र ‘मसाला-टाइप’ सफलता नहीं मानी जा सकती, जैसा कि कुछ हिंदी फिल्म समीक्षकों ने इसे प्रचारित करने का प्रयास किया। और जहाँ तक मसाला टाइप होने का प्रश्न है भी तो हिंदी सिनेमा में भी अधिकांश “सफल” और अच्छा कारोबार करने वाली फिल्मे मसाला-टाइप ही रही हैं।

अगर वे मसाला-टाइप नहीं भी हैं तो भी मौलिकता और नयेपन के नाम पर ‘विश्व-सिनेमा’ से चुराई या जुटाई गई सामग्री भर हैं, मौलिकता के नाम पर इनमें कुछ भी नहीं है। भारतीय दर्शक वैश्वीकरण के इस युग में इन कट-पेस्ट की गई फिल्मों को आसानी से समझ लेता है और एक सिरे से इसे नकार भी देता है।

जैसे ‘ठग्स ऑफ़ हिंदुस्तान’ देखने वालों ने यह मान लिया कि यह ‘पाइरेट्स ऑफ़ द कैरिबियन’ से किसी-न-किसी रूप में प्रेरित है। इसी तरह ‘बर्फी’ जैसी फिल्म, जिसके दृश्य दुनिया के दो दर्जन से भी अधिक फिल्मों से चुराए गए थे, को ऑस्कर में भेजने का घनघोर दुस्साहस क्यों और कैसे किया गया यह भी चयनकर्ताओं की योग्यता और निष्पक्षता पर प्रश्न खड़े कर देता है, क्योंकि उसी समय ‘पानसिंह तोमर’ जैसी शानदार फिल्म भी थी जो एक अच्छा विकल्प हो सकती थी।

वैसे तो पिछले कुछ वर्षों से दक्षिण भारतीय फिल्में हिंदी-पट्टी में अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज करती ही रही हैं, लेकिन ‘पुष्पा:द राइज़’ और ‘अखंडा’, ‘असुरन’ आदि दक्षिण भारतीय फिल्मों ने कोविड काल में जिस तरह से पूरे भारत के दर्शक वर्ग को अपनी तरफ आकर्षित किया है, उसने भारतीय सिनेमा प्रेमियों में होने वाली एक नई कलात्मक चेतना के विकास को दिखाया है।

इसमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों को पहचानने का एक प्रयास तो है ही, साथ ही यह संपूर्ण भारतीयता को भी एक सांस्कृतिक-सूत्र में बांधने का सकारात्मक अभियान जैसा प्रतीत होता है। और अगर मोटे तौर पर देखें तो इस अखिल-भारतीय सांस्कृतिक चेतना का बिगुल दक्षिण भारत में ‘बाहुबली’ ने ही व्यापक तौर पर फूँक दिया था और तबसे अपने सांस्कृतिक व ऐतिहासिक धरोहरों को बड़े पर्दों पर आत्मविश्वास के साथ दिखाने का साहस किया जाने लगा जिसे आगामी फिल्म ‘आरआरआर’ में भी देखा जा सकता है।

गौरतलब है कि इस तरह के सांस्कृतिक धरोहरों के प्रदर्शन के साहस के मामले में हिंदी सिनेमा आमतौर पर एक द्वंद्व में ही रहा या फिर इसने छद्म-धर्मनिरपेक्षता और आधुनिकता के कारण हिंदी पट्टी को अनेक तरह से भ्रमित ही किया- कभी ऐतिहासिक तथ्यों की हत्या करके और कभी वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक सच्चाइयों की लिपा-पोती करके- जैसे ‘शिकारा’ और ‘पद्मावत’, ‘मोहेंजोदारो’ जैसी अनगिनत फिल्में हैं।

हिंदी सिनेमा के साथ सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि इसने स्वयं के वैश्विक-सिनेमा होने का भ्रम पाल लिया, जबकि आज भी यह आइटम सॉन्ग, बेडरूम और बाथरूम दृश्यों से निकल नहीं पाया है। हास्य बुद्धिमता से उपजती है लेकिन यहाँ हास्य अश्लीलता में खोजी जा रही है। अश्लीलता को हास्य मानने का ऐसा प्रचलन रहा कि ‘थ्री-इडियट’ जैसी अच्छी फिल्म में भी भद्दे संवादों को दिखाया गया।

ऐसा नहीं है कि दक्षिण की फिल्में इन मामलों में दूध की धूली हैं। उनके भीतर भी अनगिनत गंभीर विसंगतियाँ हैं, फिर भी जिस तीव्रता से उन्होंने हिंदी दर्शकवर्ग को अपनी तरफ खींचा है और मुंबैया हिंदी सिनेमा के समकक्ष ला खड़ा किया है, उसके कुछ कारणों को भी समझा जा सकता है।

बॉलीवुड पर दीर्घ समय से आरोप लगता रहा है कि वह कुछ परिवारों का ‘घरेलू उद्योग’ बन गया है। वे जिसे चाहते हैं, उन्हें फिल्मों में जगह मिलती है और जिसे नहीं चाहते वे अपनी तमाम प्रतिभाओं के बावजूद इंडस्ट्री से बाहर कर दिए जाते हैं।

जैसे इरफ़ान खान, पीयूष मिश्रा, पंकज त्रिपाठी और नवाज़ुद्दीन सिद्दकी जैसे कालजयी कलाकारों को स्वयं को सिद्ध करने में दशकों लग गए, जबकि फिल्मी घरानों के पुत्र-पुत्रियों को रातोंरात स्टार बनाने की अनिगिनत कहानियाँ हैं। ‘डेब्यू’ जैसे शब्द ऐसे ही स्टार पुत्रों/पुत्रियों के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं। क्या कभी आपने सुना कि इरफ़ान खान या नवाज़ुद्दीन जैसे कलाकार ‘डेब्यू’ होने वाले हैं?

समय-समय पर इन भेदभावों पर विभिन्न कलाकारों ने प्रश्न उठाया, लेकिन सुशांत सिंह राजपूत मामले के बाद यह राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन गया और लोगों के बीच यह स्पष्ट संदेशश चला गया कि हिंदी सिनेमा प्रतिभा नहीं बल्कि पूँजी और सत्ता से चल रहा है, और धीरे-धीरे उनका इससे मोहभंग भी हुआ।

इसी तरह इस इंडस्ट्री पर यह भी आरोप लगता रहा कि यह आपराधिक तत्वों के चंगुल में है, जैसे अंडरवर्ल्ड का पैसा यहाँ की फिल्मों में लगता है। कैसेट किंग गुलशन कुमार की हत्या से इसकी शुरुआत को देखा जा सकता है। और बाद में भी कई ऐसे मामले सामने आये जिसने इसके भीतर की भयंकर गंदगी का पर्दाफाश किया जैसे संजय दत्त का हथियार मामला।

और अभी हाल-फिलहाल में शाहरूख खान के बेटे की ड्रग केस में गिरफ़्तारी ने इसके भीतर की सच्चाई को सबके सामने खोल कर रख दिया। भारतीय दर्शक बड़े भावुक किस्म के होते हैं। वे अपने अभिनेताओं में अपना रोल-मॉडल या आदर्श ढूंढते हैं और इस मामले में हिंदी सिने अभिनेताओं के विभिन्न आपराधिक कारनामों ने इन्हें दुखी किया।

अभिनेता या अभिनेत्री के ‘रील’ और ‘रियल’ ‘लाइफ’ में विरोधाभास को वे सहन नहीं कर पाते। और इस मामले में दक्षिण भारतीय अभिनेताओं का प्रभाव दर्शकों पर प्रारंभ से ही प्रभावशाली रहा है, और यह भी एक कारण है कि दक्षिण में इन अभिनेताओं और अभिनेत्रियों का राजनीतिक भविष्य भी अक्सर सफल ही रहा है वहीं हिंदी सिनेमा में अमिताभ जैसे कलाकारों को भी राजनीति से मैदान छोड़कर भागना पड़ा।

इन सब के अतिरिक्त सबसे मूलभूत बात जो दक्षिण सिनेमा को मुंबैया हिंदी सिनेमा से ऊपर उठा देती है, वह है इसका अपनी संस्कृति और इसके प्रतीकों से गहरे जुड़ा होना। इन्हें अपनी पहचान और परंपरा को लेकर किसी प्रकार की कोई कुंठा नहीं है, लेकिन हिंदी सिनेमा आजतक अपनी सांस्कृतिक पहचान के मामले में विशुद्ध पश्चिमी मूल्यों के सहारे अपनी वैश्विक छवि गढ़ने में व्यस्त रहा।

वह भूल गया कि वैश्विक होती दुनिया में दर्शक के पास विकल्पों की कोई कमी नहीं है। हिंदी सिनेमा जिस आधुनिकता के मूल्यों की वकालत करता रहा, उसके लिए दर्शकों ने हिंदी सिनेमा के बदले सीधे ‘विश्व-सिनेमा’ को ही देखना पसंद किया, और जब कभी उसे सांकृतिक मूल्यों और परंपराओं पर आधारित चीज़ी की आवश्यकता हुई, तो क्षेत्रीय सिनेमा ने उन्हें कभी निराश नहीं किया जिसमें दक्षिण अग्रणी रहा।

एक तरह से कहें तो भारत में सिनेमा की तीन धाराएँ बह रही हैं- पहली, क्षेत्रीय सिनेमा जिसमें तेलगु, तमिल, मलयालम, कन्नड, मराठी, भोजपुरी, पंजाबी आदि हैं। दूसरा पश्चिमी या ‘वैश्विक-सिनेमा’ जिसमें फ्रेंच, जर्मन और अंग्रेज़ी आदि फिल्में हैं और तीसरा मुंबैया हिंदी सिनेमा।

तीनों का अपना अलग-अलग चरित्र है। क्षेत्रीय सिनेमा अपनी सांस्कृतिक जड़ों को केंद्र में रखकर बनाई जा रही हैं। फ्रेंच, जर्मन, इतालवी और अंग्रेज़ी आदि फिल्मों का अपना एक वैश्विक दर्शक वर्ग है, तो स्वाभाविक रूप से इसे आधुनिक और ‘वैज्ञानिक’ मूल्यों के साथ ही सिनेमा बनाने होंगे।

लेकिन इन दोनों के बीच में मुंबैया हिंदी सिनेमा एक भँवर में है। यह न तो पूरी तरह से आधुनिक और वैज्ञानिक फिल्में ही बना पा रहा और न ही सांस्कृतिक और परंपरागत चीज़ों को ही जोरदार तरीके से प्रस्तुत कर पा रहा है। मुंबैया हिंदी सिनेमा न तो अपना कोई राष्ट्रीय चरित्र ही निर्धारित कर सका, और न ही सांस्कृतिक पक्षों के साथ ही स्वयं को सिद्ध कर सका, और वह इस बात से भी अनभिज्ञ है कि ‘विश्व-सिनेमा’ को चुनौती देने के लिए इसके पास ‘स्वाभाविक-सामर्थ्य’ भी नहीं है।

दुनिया में जो राजनीतिक दौर है, उसमें ‘सांस्कृतिक-जागरण’ के भी तत्व हैं और वैश्विक वैज्ञानिकता का भी महत्त्व है, लेकिन हिंदी सिनेमा इन बातों को अबतक समझ नहीं पाया है। लेकिन दर्शक किसी भी द्वंद्व में नहीं हैं, वे बहुत स्पष्ट हैं। मनोरंजन के साथ-साथ उन्हें अपनी देसी पहचान भी चाहिए तो वे देखते हैं- ‘पुष्पा’, ‘बाहुबली’, और ‘अखंडा’। और जब राजनीतिक और सामाजिक ठगैती से वे छटपटाते हैं तो फिर देखते हैं जे फोनिक्स अभिनीत ‘जोकर’। यह भारतीय दर्शक का वर्तमान ‘लोकल’ और ‘ग्लोबल’ मनोविज्ञान है।

बिधु भारद्वाज बिहार स्थित मोतिहारी सेंट्रल जेल में जेल सुपरिटेनडेंट हैं। केयूर पाठक सीएसडी, हैदराबाद से पोस्ट-डॉक्टरेट हैं।