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“अंग्रेजों ने लोकतांत्रिक मूल्य नहीं दिए, भारत का लोकतंत्र सबसे पुराना”- जेएनयू कुलपति

नई दिल्ली में जेएनयू कुलपति शांतिश्री धूलिपुडी पंडित ने शुक्रवार को कहा, “भारत एक लोकतंत्र है क्योंकि इसकी एक राजनीतिक संस्कृति है और विविधता इसकी शक्ति है।”

दिल्ली विश्वविद्यालय में तीन दिवसीय अंतर-राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन पूर्ण सत्र में बोलते हुए उन्होंने कहा, “हम लूट, नरसंहार और दुष्कर्म में विश्वास नहीं करते हैं। हम संस्कृति और व्यापार में विश्वास करते हैं। हमारा लोकतंत्र बहुत पुराना है। अंग्रेजों ने हमें लोकतांत्रिक मूल्य नहीं दिए हैं।”

उन्होंने कहा, “भारत का एक लोकतंत्र है क्योंकि इसकी एक राजनीतिक संस्कृति है। एक ऐसी संस्कृति, जो 3,000 करोड़ देवताओं में से किसी को भी चुन सकती है। इसके अतिरिक्त, हमको और किस विविधता की आवश्यकता होगी।”

पंडित ने कहा, “भारत को संविधान से बंधे एक नागरिक राष्ट्र में बदलना इसके इतिहास, प्राचीन विरासत, संस्कृति और सभ्यता की अवहेलना करता है। मैं भारत को एक सभ्यता आधारित राष्ट्र के रूप में देखती हूँ। केवल दो ऐसे सभ्यता वाले राष्ट्र हैं, जहाँ परंपरा के साथ आधुनिकता, क्षेत्र के साथ उसका प्रभाव एवं बदलाव के साथ निरंतरता मौजूद है। ये दो राष्ट्र भारत और चीन हैं।”

जेएनयू कुलपति ने कहा कि विश्वविद्यालय प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि सहयोगी हैं। विकृत इतिहास की चुनौतियों के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा कि इतिहास उसकी कहानी है, लेकिन उसकी कहानी भी आनी है।

हिंदू धर्म के बारे में बात करते हुए कुलपति ने कहा, “यह जीवन का एक तरीका है।”

पंडित ने कहा, “बाल गंगाधर तिलक पहले जन नेता थे। कई लोग सोचते हैं कि गांधी गोपाल कृष्ण गोखले के शिष्य थे। मैं कहूँगी कि वह लोकमान्य तिलक के शिष्य थे क्योंकि उन्होंने सत्याग्रह और राम राज्य जैसे जन आंदोलन लाने के लिए इसी तरह के प्रतीकों का उपयोग किया था।”