अर्थव्यवस्था
आरबीआई की डिजिटल मुद्रा समझदारीपूर्ण पर विनियमित निजी मुद्रा को भी मिले अनुमति

जुलाई में भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने घोषणा की कि चरणबद्ध तरीके से अपनी डिजिटल मुद्रा जारी करने की उसकी योजना है। यदि आप सोच रहे हैं कि बिटकॉइन या किसी भी अन्य क्रिप्टो मुद्रा (जैसे इथेरियम, डॉजकॉइन, टेथर, बिनान्स कॉइन, आदि) का यह भारतीय समकक्ष होगा तो भूल जाइए।

संभवतः हमें एक प्रकार की डिजिटल मुद्रा मिलने वाली है जो नकद से अधिक अलग नहीं होगी। अंतर बस यह होगा कि यह साइबर क्षेत्र में होगी और केंद्रीय बैंक नज़र रख रहा होगा कि किसके पास कितनी मुद्रा है।

बिज़नेस स्टैंडर्ड में तमल बंदोपाध्याय का एक लेख प्रकाशित हुआ था, जिसके अनुसार केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (सीडीबीसी) एक डिजिटल वॉलेट से अधिक और कुछ नहीं होगी। यह किसी भी तरह से क्रिप्टो नहीं होगी। संभवतः यह एक अच्छी बात है। तीन बातें आपको स्पष्ट हों-

पहली, एक डिजिटल मुद्रा होना अच्छी बात है। यदि यह कुछ अधिक नहीं भी करती है, तो भी कम-से-कम नोट छापने पर होने वाले खर्च की बचत तो करती ही है। करेन्सी नोट प्रेस से प्राप्त जानकारी के अनुसार महामारी से पहले, वर्ष 2019-20 में 50 रुपये का एक नोट छापने में 1.22 रुपये लगते थे।

इसी तरह 500 रुपये के नोट में 2.71 रुपये और 200 रुपये के नोट में 2018-19 में 2.48 रुपये लगते थे। 100 रुपये के नोट में लगभग 2 रुपये और 10 एवं 20 रुपये के नोट में लगभग 1 रुपये लगते हैं।

जितना छोटा नोट, मूल्य के अनुपात में उसकी छपाई उतनी महंगी पड़ती है। दैनिक लेन-देन में खर्च होने वाले छोटे नोटों को छापना व्यावसायिक रूप से उपयुक्त नहीं है। इसलिए हर दृष्टि से डिजिटल उपयुक्त लगता है।

दूसरा, किसी भी मुद्रा के मूल्य की लघु से मध्यम अवधि में कुछ निश्चितता तो होनी चाहिए। 3-5 प्रतिशत की मुद्रास्फीति के बावजूद नकद व डिजिटल मुद्रा को निश्चित ही माना जाता है क्योंकि कुछ महीनों में गिरावट न के बराबर होती है। वहीं दूसरी ओर देखें कि बिटकॉइन का मूल्य कैसे चढ़ता-उतरता है।

पिछले 10 महीनों में इसका मूल्य 64,000 डॉलर तक गया है और 10,000 डॉलर तक गिरा है जो दर्शाता है कि मुद्रा लेन-देन की बजाय क्रिप्टो सट्टेबाज़ी का खेल है। यहाँ तक कि गलत काम करने वाले लोग भी कहते हैं कि कोई ड्रग डीलर भी क्रिप्टो में लेन-देन नहीं करेगा यदि यह इतना चढ़ता-उतरता रहेगा।

तीसरा, कोई सरकार या केंद्रीय बैंक नहीं चाहेगा कि एक पूर्ण रूप से मुक्त साइबर मुद्रा हो जो मौद्रिक या वित्तीय नीति के नियंत्रण से बाहर हो। मुक्तिवादी इसे पसंद नहीं करेंगे लेकिन उनकी सुनता कौन है? इसलिए एक केंद्रीय बैंक की डिजिटल मुद्रा सर्वश्रेष्ठ होगी।

हालाँकि, फिर भी निजी पक्षों द्वारा जारी नई प्रकार की विनियमित मुद्रा को अनुमति देने की भी संभवनाएँ होनी चाहिए। हमें आवश्यकता है तो मौद्रिक नियंत्रण के लिए कुछ दिशानिर्देशों की।

जो आरबीआई के विनियमनों का पालन करने के लिए तैयार हो, उसे कुछ मूलभूत नियमों के आधार पर अपनी मुद्री जारी करने की अनुमति मिलनी चाहिए। उदाहरण स्वरूप, इसकी पूरी संभावना है कि कोई निजी मुद्रा जारीकर्ता वादा करे कि उसकी 10 प्रतिशत मुद्रा सोने पर आधारित होगी।

इससे अपने आप असीमित मुद्रा बनाने पर रोक लग सकेगी जबकि फिएट मुद्रा के साथ ऐसा नहीं हो पाता है। ऐतिहासिक रूप से मुद्रा नोट भी इसी तरह अस्तित्व में आए- वास्तव में वे जारीकर्ता के स्वर्ण भंडार की व्यापार-योग्य रसीदें होते थे।

इसी प्रकार, बड़ी खुदरा कंपनियों को अनुमति दी जानी चाहिए कि वे अपनी सीमित उपयोग की मुद्रा जारी कर सकें। यह अभी भी एक प्रकार से अस्तित्व में है जैसे वे कूपन या खरीद पर रिवॉर्ड अंक देते हैं जिससे उनकी दुकानों से भावी खरीद की जा सके।

भविष्य में इन मुद्राओं की विस्तृत उपयोग भी हो सकता है जैसा कि पूर्वी अफ्रीका में मोबाइल टॉक-टाइम के साथ कुछ वर्षों पहले हुआ था। कर्मचारी भोजन एवं खाद्य भुगतान प्रणाली सोडेक्सो भी एक प्रकार की नकद आधरित रुपये लेन-देन की प्रणाली है।

भारत के राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) ने ई-रुपी नामक एकल उपयोग की वाउचर मुद्रा हाल ही में जारी की है जो एक प्रकार का डिजिटल रुपया ही है जिसके एक विशिष्ट या कई उपयोग किए जा सकते हैं।

बात बड़ी सरल है। डिजिटलीकरण की दिशा में भारत ने जो छलांगें लगाई हैं (विशेषकर विमुद्रीकरण के बाद से), वह अवसर देती हैं कि बड़ी इकाइयाँ और केंद्रीय बैंक ऐसी डिजिटल मुद्रा जारी करें जो विनियमन नियंत्रणों के अधीन आती हों।

क्रिप्टो मुद्रा सही दिशा नहीं है। डिजिटल मुद्रा के कई प्रकार जैसे सीमित वैधता वाली निजी मुद्राएँ, भले ही अत्यंत साहसिक न हों परंतु वे मुद्रा का नया विश्व हैं। वे भले ही क्रांतिकारी न हों लेकिन समझदारीपूर्ण हैं।

अनेक प्रकार के पैसे की संभावना एक अवधारणा पर आधारित हैं- प्रतिस्पर्धा। आरबीआई चिंतित है कि एनपीसीआई का यूपीआई एकाधिकारवादी न बन जाए इसलिए वह इस क्षेत्र में नए निजी खिलाड़ियों को आने दे रहा है।

उसी प्रकार उसे इसपर भी चिंतित होना चाहिए कि इसके द्वारा जारी डिजिटल मुद्रा एक निर्दयी एकाधिकारी बन जाएगी। विनियमन सदैव ही एकाधिकार क्षेत्र में ही रहेगा लेकिन जारी मुद्राओं को एकाधिकारवादी होने की कोई आवश्यकता नहीं है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं।