संस्कृति
रावण और श्रीराम, दोनों देवी शक्ति का आशीर्वाद पाने में लगे (अकाल बोधन भाग- 7)

रावण शिव का परम् भक्त था तथा उन्हें पितातुल्य पूजता था। इस प्रकार, देवी शक्ति का माँ के रूप में आह्वान करते हुए वह श्रीराम के विरुद्ध युद्ध की प्रार्थना व याचना करता है। माँ शक्ति हेतु रावण की स्तुति निराश हुए एक बालक का क्रंदन मात्र प्रतीत होती है। एक ऐसे बालक का रुदन जो अपनी माँ हेतु बिलख रहा है। (पिछला भाग यहाँ पढ़ें)

रावण अपनी स्तुति में यही विलाप करता है पिता स्वरूप महाशिव विमुख हो चुके हैं तथा अब माँ शक्ति ही उसकी एकमात्र शरणस्थली हैं। वह कातर स्वर में याचना करता है, “हे माँ तारिणी, दीनों की जननी, पतित-पावनी, पापहारिणी, जगतपालिनी तुम कहाँ हो, मुझ पर सदय हो जाओ तथा असमय दर्शन देकर मेरी रक्षा करो।”

“हे कालिके, तुम ही शक्ति हो, तुम तृप्ति हो, तुम सर्वत्र व्याप्त हो। इन तीनों भुवनों में तुम्हारा नाम तथा गुण व्यक्त है। रूप गुण अव्यक्त है, उसका निरूपण नहीं हो सकता। जो तुम्हारी शरण लेता है उसपर कोई विपत्ति नहीं आती। राम के साथ इस युद्ध में में विराट संकट में आन पड़ा हूँ।

इस विशाल संसार में तथा अन्य कोई सहाय नहीं। देव शंकर ने मुझे त्याग दिया है, अतः माँ तुमसे ही याचना करता हूँ। पुकारता हूँ। हे माँ, अपने इस दुखी सेवक की दिशा में करुणामय-नेत्रों से देख कृपादृष्टि द्वारा मेरा शोक दूर करो। तुम दयामयी माँ हो, ऐसा मेंने पुराणों में सुना है।”

रावण के ऐसे वचनों तथा स्तुति से माँ हैमवती का हृदय प्रसन्न हो गया। माँ ने क्षण मात्र में रावण को अपने दिव्य दर्शनों से लाभान्वित किया तथा रावण को अपने आँचल में विराज लिया। माँ शक्ति ने रावण को आश्वासन दिया,

“पुत्र दशानन, यह क्रंदन अब व्यर्थ है। अब किंचित भय की आवश्यकता नहीं। यदि तुम्हारे विरुद्ध अब महादेव भी युद्धरत हो जाएँ, मैं स्वयं उनसे युद्ध करूँगी।” माँ शक्ति से आश्वासन प्राप्त होते ही रावण ने हुँकार भर श्रीराम को युद्ध हेतु चुनौती दे डाली तथा बाणों की वर्षा प्रारंभ कर दी।

रघुपति राम, रावण की चुनौती सुनकर युद्ध हेतु अग्रसर हुए किंतु जैसे ही उन्होंने रावण के रथ पर माँ हैमवती को देखा, राम ने विस्मित होकर धनुष-बाण त्याग दिया। वह माता पार्वती को प्रणाम कर युद्ध स्थल से शीघ्र ही प्रस्थान कर गए तथा विभीषण सम्मुख प्रकट हुए।

श्रीराम ने विभीषण को संबोधित किया, “हे मित्र, रावण के विनाश में अब विपदा आन पड़ी है। इन परिस्थितियों में अब किसी का भी सामर्थ्य
नहीं कि वह दशानन का वध कर सके। यदि स्वयं शिवभार्या भगवती लंकेश की रक्षा कर रही हैं तो लंकेश को पराजित कौन कर सकेगा?”

जलदवरणी के आँचल में दशानन को देख विभीषण भी हतप्रभ रह जाते हैं। विभीषण विचार करते हैं कि जब स्वयं तारा ने ऐसा व्याघात उपस्थित कर दिया तो दशानन का वध कौन करेगा भला? विभीषण को चिंतातुर देख श्रीराम भी दुखी हो जाते हैं।

पालनहार श्रीराम को दुखी और व्याकुल देखकर देवगण सहस्रलोचन इंद्र से इस समस्या का हल सुझाने को कहते हैं। इंद्रदेव ब्रह्मा से इसका उपाय सुझाने का निवेदन करते हैं तो ब्रह्मा यह भेद बताते हैं कि चंडी की आराधना में ही विधि है अर्थात् असमय-बोधन में ही रावण की मृत्यु है।

ब्रह्मा के यह वचन सुन इंद्र ब्रह्मा से यह सुखद समाचार स्वयं श्रीराम तक पहुँचाने की प्रार्थना करते हैं। पद्मयोनि ब्रह्मा श्रीराम के समक्ष अकाल बोधन की विधि का वर्णन करते हैं। वह श्रीराम को सुझाव देते हैं कि यदि आप देवी महेश्वरी की प्रार्थना-याचना करेंगे तभी रावण का संहार हो सकेगा।

श्रीराम ब्रह्मा से विमर्श करते हैं, “माँ शक्ति महेश्वरी प्रार्थना हेतु वसंत ऋतु ही माननीय तथा शुद्ध समय है तथा माँ के बोधन हेतु शरद ऋतु असमय है। ऐसा विधान भी निर्धारित है कि देवीनिद्रा भंग हेतु कृष्णनवमी दिवस भी उपयुक्त है किंतु वह दिवस भी बीत चुका है।”

शोक में विलीन राम यह भी कहते हैं, “प्रतिपदा पर राजा सुरथ के कल्पारंभ का योग बनता था किंतु वह दिन भी व्यतीत हो चुका है।
मैं विचार नहीं कर पा रहा हूँ कि माँ शक्ति की पूजा का आयोजन किस प्रकार किया जाए? प्रातः शुक्ल षष्ठी होंगी। यह मास कन्याराशि का अवश्य है किंतु, हे विधाता, मुझे पूजा का कोई योग बनता नहीं प्रतीत होता।”

ब्रह्मा ने उत्तर दिया, “हे राम, मैं उसी समस्या का विधान लेकर उपस्थित हुआ हूँ। तुम षष्ठी-कल्प पर माँ का बोधन करो। इसमें कोई बाधा नहीं होगी। मुझे ज्ञात है कि विधि का खंडन कर राजा सुरथ ने भी असमय कल्प-खंड आरंभ किया था तथा देव शक्ति का आशीर्वाद प्राप्त किया था।”

ब्रह्म उपदेश सुनकर श्रीराम अतिप्रसन्न हुए तथा सर्वदिशाओं में प्रकाश प्रकट होने के पश्चात् श्रीराम स्नान-ध्यान-दान कर पूजा-अर्चना के विधि-विधान पूर्ण करने में जुट गए। सागर तट समीप श्रीराम द्वारा षष्ठी दिवस, पूजा-अर्चना प्रारंभ हो चुकी थी। राम ने स्वयं मृदा-प्रतिमा स्थापित कर वनपुष्प, कंद-मूल अर्पित किए।

रघुपति प्रवाहित नेत्रों से माँ महेश्वरी की स्तुति-नमन में लीन हो गए। देवी की महिमा का वर्णन करते हुए रघुपति चंडी पाठ में मग्न थे। दिवाकर अस्त होते ही श्रीराम ने देवी शक्ति का बोधन करते हुए माँ अभ्या को आमंत्रित किया तथा माँ शक्ति का विल्वाधिवासन करते हुए महापापी, दुष्ट रावण पर युद्ध में विजय प्राप्ति हेतु यथाविधि आरती वंदन किया।

अर्चना पद्धति-प्रकरण के नियमानुसार लभ्य-अलभ्य सभी द्रव्यों को माँ को अर्पित किया। रात्रि भर आयोजन में भगवन श्रीराम लीन रहे। षष्ठी समाप्त हुई। सुप्रभात होते ही स्नान आदि पश्चात् प्रभु ने पुनः वेदोक्त, शुद्ध तथा सात्विक विधि से पूजन आरंभ करते हुए चंडीपाठ द्वारा दिवस सप्तमी अर्चना का समापन किया।

दिवस अष्टमी रघुनाथ विधि-विधान पूर्ण अर्चना में लीन रहे तथा निशाकाल में संधिपूजा की। नृत्य-गीत आदि में विभावरी जाती रही। नवमी पूजन हेतु श्रीराम द्वारा देवी वंदना, निशा-जागरण आदि विभिन्न ढंग से माँ शक्ति की चरण वंदना का आयोजन किया गया।

श्रीराम के आदेशानुसार, संध्या वंदना हेतु, कपि कंद-मूल तथा अशोक, कांचन, मल्लिका, मालती, पलाश, पाटली, मौलश्री, गंधराज आदि विभिन्न प्रकार के वनपुष्प संगृहीत करने हेतु प्रस्थान कर गए। (श्रीराम की शक्ति पूजा पर लेख यहाँ पढ़ें)

आगे की कथा अगले भाग में।

मनीष श्रीवास्तव इंडिका टुडे जैसे कई मंचों से जुड़े लेखक हैं। वे @shrimaan के माध्यम से ट्वीट करते हैं।