संस्कृति
श्रीराम की आराधना से प्रसन्न होकर देवी ने दिया रावण को त्यागने का वचन (अकाल बोधन)

श्रीराम की इच्छा तथा आदेशानुसार थलकमल, कदंब, पारुल, शतदल, कुमुद, कल्हार, नल, पारिजात, हरसिंगार, करवी, कनक-चंपा, सहस्र पत्र कोकनद, अतसी, अपराजिता, झंपक, चंपक, नागेश्वर, काठमल्लिका, गुलमेंहदी, जूही, द्रोणपुष्प, माधवी, चांदनी, तुलसी, अलसी, धातकी, भूचंपक, केतकी, पद्मवक्र, कृष्णकलि, सोन-जूही, हरसिंगार, कुर्ची, गुलाब पुष्प, मनोहर कृष्णचूड़ा आदि वनपुष्पों का ढेर लगाते हुए चंदन चर्चित केले के गौदों यथा अद्वितीय तथा अनन्य वनफलों द्वारा नैवेद्य का आयोजन किया गया।

श्रीराम परमानंद में लीन सात्विक भाव से विधानुसार, तंत्र-मंत्र-सम्मत शंकरी की पूजा-अर्चना करते रहे किंतु माँ महेश्वरी को प्रकट होता ना देख दुखी हो गए। श्रीराम को दुखी जानकर विभीषण ने विचार प्रकट किया कि यदि कौशल्यानंदन माँ शक्ति के चरणों में देव-दुर्लभ अष्टोत्तर शत नीलोत्पल अर्पण करें तो संभव है कि माँ चंडी तुष्ट हों। इस देव-दुर्लभ पुष्प को प्राप्त करने में अपनी असमर्थता प्रकट करने पर हनुमान इस देव-दुर्लभ पुष्प को श्रीराम को सौंपने का वचन देते हैं। (पिछला भाग यहाँ पढ़ें)

हनुमान के प्रस्थान पश्चात् श्री रघुनाथ पुनः देवी वंदना में मग्न हो गए। विभीषण के सुझाव अनुसार हनुमान पवन वेग द्वारा देवीदह से अष्टोत्तर शत नीलोत्पल लेकर श्रीराम के समक्ष प्रकट होते हैं। अपने सम्मुख नीलकमल देख श्रीराम पुनः पुलकित चित्त से विधि-विधानुसार मूत्र-मंत्र का उच्चारण करते हुए शंकरी के चरणों में अष्टोत्तर शत नीलोत्पल अर्ध्य संकल्प धारण करते हुए नील-कमल अर्पण करना प्रारंभ करते हैं।

शंकर-प्रिया शक्ति श्रीराम के संकल्प की परीक्षा हेतु एक कमल वहाँ से लुप्त कर देती हैं। अर्पण समाप्ति के समय जब श्रीराम अंतिम कमल लुप्त पाते हैं तो अचंभित हो जाते हैं। उनके हृदय में संकल्प-भंग का भय उपजता है। वह हनुमान को एक और कमल उपलब्ध कराने की आज्ञा देते हैं जिसमे हनुमान अपनी असमर्थता प्रकट करते हैं। हनुमान अपना विचार प्रकट करते हैं कि अंतिम कमल लुप्त होना, हे प्रभु, माँ की ही परीक्षा है।

पवन-नंदन के इस विमर्श से रघुनंदन विस्मित हो दुखी हो जाते हैं तथा उनके नेत्र सजल हो उठते हैं। प्रवाहित नेत्रों द्वारा वे पुनः माँ शक्ति की प्रार्थना में लीन हो जाते हैं। वे विनयपूर्वक माँ शक्ति से याचना करते हैं, “हे दुःखहारिणी दुर्गा, आप दुर्गतिनाशिनी तारा, दुर्गम विंध्यगिरि निवासिनी, दुराराध्या, ध्यानसाध्या सनातनी शक्ति, परात्परा परमा प्रकृति पुरातनी, नीलकंठ-प्रिया, निराकारा नारायणी हो।

आप सारात्सारा मूलशक्ति सच्चिदा साकारा, महिषासुरमर्दिनी, महामाया महोदरी, शिव-सीमंतिनी श्यामा, शर्वाणी, शंकरी, विरुपाक्षी, शताक्षी, शारदा शाकंभरी, भ्रामरी, भवानी, भीमा, धूमा, क्षेमंकरी हो। आप लंबोदरा, दिगंबरा, कलुपनासिनी, कृतांत-दलनी, आप काल-उरु-विलासिनी हो।” श्री राम दुखी हृदय से माँ पार्वती से प्रार्थना करते हैं, “हे माँ आपने मुझ दीन-हीन को मात्र दुःख ही भोगने का पात्र बनाया है।

क्लेश से मेरा शरीर अवसादपूर्ण है किंतु आपकी दयादृष्टि मुझ अभाग्य पर नहीं पड़ती। हे तारिणी, हे दयामयी, पतितोद्धारिणी, मुझे अपना दयापात्र बनाओ। अकाल-बोधन दारा मुझ अज्ञानी ने अर्चना द्वारा आपको प्रसन्न करने का प्रयास किया किंतु मेरी आराधना आपने स्वीकार नहीं की। श्यामा चरणों में मेरे अष्टोतर शत नीलोत्पल अर्पण संकल्प में भी आपने विघ्न डाल दिया। मुझसे ऐसा क्या पाप, अपराध हुआ है, हे तारा?”

तारा माँ द्वारा श्रीराम की परीक्षा का अभी अंत नहीं हुआ था। वे श्रीराम को आशीर्वाद देने हेतु प्रकट नहीं हुईं। अकस्मात् ही श्रीराम को यह विचार उत्पन्न हुआ कि परिवारजन श्रीराम को नीलोत्पल अर्थात् नील-कमलाक्ष के नाम से भी संबोधित करते हैं। वह अविलंब यह संकल्प लेते हैं कि अंतिम पुष्प अर्पण तथा वंदना रूप में स्वयं के नेत्र माँ के चरणों में अर्पित करेंगे।

यह प्रण लेते हुए रघुनंदन तूण से बाण निकालते हुए अपने नेत्र अर्पण करने का प्रयास करते हैं तभी माँ कात्यायनी प्रकट होकर श्रीराम को आशीर्वाद और वर प्रदान करती हैं, “हे प्रभु दयामय, संपूर्ण अखिल ब्रह्मांडपति, सनातन-ब्रह्म, आदि-भगवान तथा चराचर की गति आप अच्युत अव्यय हो। आप इस पृथ्वी पर चतुर्व्यूह धारण कर दुराचारी, पापी तथा अधर्मी रावण के वध हेतु प्रकट हुए हैं।

आप स्वयं शिव के आराध्य प्रभु हैं। आप यह विचार कीजिए कि बैकुंठ में यही महापराक्रमी, दुरात्मा रावण आपका द्वारपाल था। ब्रह्मशाप द्वारा पृथ्वी पर शापमुक्ति हेतु उसने आपको शत्रु-रूप में पाया। हे सीतापति अपने असमय बोधन कर दशभुजा की समस्त विधि अनुसार अर्चना कर उनका विन्यास किया। अब मैं रावण का सामीप्य त्यागती हूँ। हे भवभाव्य, आपसे मेरी प्रार्थना है कि अब आप उस दंभी राक्षस का विनाश करो।”

इतना कहकर देवी शक्ति अंतर्ध्यान हो गईं। श्रीराम की सेना में प्रसन्नता छा गई तथा वानर समूह नृत्य-गान में मग्न हो गया। श्री नारायण प्रेमानंद में विभोर हो नवमी की पूजा का समापन करते हैं। दशमी में पूजा-उपरांत महेश्वरी को विसर्ज्जित कर रघुपति रावण के अंत तथा सीता की मुक्ति हेतु युद्ध के लिए तत्पर होकर युद्ध भूमि हेतु प्रस्थान करते हैं और विजयी होते हैं।

यह अप्रतिम कथा आपको मात्र कृतिवास रामायण में ही मिलेगी जो दुर्गा पूजा की एक स्थापित बांग्ला संस्कृति को रामायण तथा श्रीराम की कथा हेतु सेतु का कार्य करती है। लोकप्रिय धारणा यह है कि कृतिवास ने वाल्मीकि रामायण का बांग्ला में अनुवाद किया, लेकिन यह पूर्णतया सत्य नहीं है। कृतिवास ने वाल्मीकि रामायण के प्राथमिक कथानक को अक्षुण्ण रखते हुए, अवधारणाओं, कहानियों तथा उपकथाओं को अपनी महागाथा में प्रस्तुत किया था।

ऐसा कहा जाता है कि प्रत्येक माँ अपनी संतानों के समक्ष जब प्रथम कथा का पाठ करती है तो वह रामायण ही होती है। वह चाहे कृतिवास रामायण हो अथवा वाल्मीकि रामायण, चाहे रामचरित मानस हो अथवा कंब रामायण। वह कथा श्री रघुनंदन कमलनयन पुरषोत्तम श्रीराम की ही है। आप सभी को विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ!

कथा समाप्त। सभी भागों का संकलन यहाँ पढ़ें

मनीष श्रीवास्तव इंडिका टुडे जैसे कई मंचों से जुड़े लेखक हैं। वे @shrimaan के माध्यम से ट्वीट करते हैं।