श्रद्धांजलि
टैगोर की दृष्टि में चीन एक सभ्यता था लेकिन आज वह मार्क्सवाद के साथ पतन की ओर है

“जिस सभ्यता का आधार समाज तथा मानव का आध्यात्मिक आदर्श रहा है, वह आज भी चीन में तथा भारत में जीवित है। आधुनिक युग की मशीनी शक्ति के आगे यह भले ही कमज़ोर तथा लघु लगती हो, लेकिन छोटे बीजों की तरह इसमें वह जीवन है, जो अंकुरित एवं विकसित होता है तथा समय आने पर उसकी कल्याणकारी शाखाओं पर फूल व फल लगते हैं और ईश्वर इसपर अपनी कृपा-वर्षा करता रहता है।”
– रबींद्रनाथ टैगोर

टैगौर को जिन पौर्वात्य सभ्यताओं में मानवता के लिए बीज दिखे उनमें जापान, चीन और भारत प्रमुख हैं। टैगोर के स्वर्गवास को आज (7 अगस्त को) 80 वर्ष पूरे हो गए हैं और आज का चीन, मार्क्सवादी पदार्थवाद के प्रभाव तले मानव स्वभाव की प्रत्येक पवित्र वस्तु के प्रति कटु अविश्वास के साथ वर्चस्ववादी हो आगे बढ़ रहा है। वह एक निर्मित राजनीतिक संस्कृति, जिसके पास कोई कसौटी नहीं है, से यूरोपीय वर्चस्ववाद से लोहा लेना चाहता है।

यह एक प्रकार की सरोगेसी है जो एशियाई पुनर्जागरण को लगभग असंभव बना देगी। और, टैगोर कहते हैं, “सत्ता की बहुमंजिली इमारतों के खंडहरों तथा लालच की ध्वस्त मशीनरी को तो भगवान् की वर्षा भी पुनर्जीवित नहीं कर सकती।” धरती के पेट से संभावित से अधिक दोहन, प्रकृति को मानव का चाकर बनाना, लालच आधारित लाभ के लिए विवश सभ्यता अंततः मानव जीवट की सभी सीमाओं को चुनौती दे देगा और सभ्यताएँ कालकल्वित हो जाएँगी।

अकाल, अतिवृष्टि, नए-नए प्रकार की व्याधियाँ और महामारियाँ प्रकृति से संभावित और आवश्यकता से अधिक दोहन का परिणाम है। ऐसा नहीं है कि हमारी सनातन सभ्यता प्रकृति से परे रहकर जीवित है। माँ प्रकृति के स्तनपान से ही शक्तिशाली सनातन सभ्यता की भुजाएँ बलिष्ठ हुई हैं/होती रहेंगी। लेकिन जैसा कि टैगौर कहते हैं, “प्रकृति पर बाहर से अधिकार अपेक्षाकृत सरल है, जबकि उसे प्रेमपूर्वक अपनाने में सच्ची प्रतिभा की आवश्यकता पड़ती है।”

पश्चात्य सभ्यता ने प्रकृति पर अधिकार का सरल रास्ता अपनाया और लूटपाट कर आगे बढ़ते गए। भौतिक प्रस्थान का एक अंत बिंदु भी होता है और फिर उस अंत का डर पीछे लौटने के लिए मुड़ने पर विवश कर देता है, लेकिन पीछे तो सबकुछ उजड़ चुका होता है। यहाँ दुःख का अंतहीन सिलसिला शुरू होता है। इसके उलट, सनातन सभ्यता सृजन की सभ्यता है।

यह ज़रूरत भर प्रकृति से लेता है और सृजन के माध्यम से उसे लौटा देता है। प्रकृति मानव की ज़रूत पूरी करती है और मानव सृजन के माध्यम से उसका सौंदर्य संभलता है। यह एक चक्रीय क्रम में चलता रहता है, कोई प्रस्थान- बिंदु नहीं, कोई अंतबिंदु नहीं। यही सृजन की शक्ति टैगोर ने पूर्व के देशों जापान, चीन और भारत में देखी थी। दुर्भाग्यवश आधुनिक चीन इस सृजन शक्ति से विशृंखल हो गया है। मानव सभ्यता में अच्छे-बुरे की लड़ाई में यह बुरी ताकतों की पहली बड़ी जीत है।