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पदोन्नति में आरक्षण रद्द करने से अशांति फैल सकती है- केंद्र ने न्यायालय को बताया

केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से कहा कि सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति के कर्मचारियों को पदोन्नति में मिलने वाला आरक्षण रद्द करने से उनमें अशांति फैल सकती है और कई याचिकाएँ दायर हो सकती हैं।

न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति बीआर गवई की पीठ के समक्ष दायर एक हलफनामे में केंद्र ने बताया कि आरक्षण की नीति संविधान और इस न्यायालय द्वारा निर्धारित कानून के अनुरूप है।

सरकार ने कहा, “यदि मामले की अनुमति नहीं दी जाती है तो अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति के कर्मचारियों को मिलने वाली पदोन्नति में आरक्षण के लाभों को वापस लेने की आवश्यकता होगी। इससे एससी-एसटी के कर्मचारी पदावनत हो सकते हैं। उनके वेतन का पुनर्निर्धारण हो सकता है। उन कई कर्मचारियों की पेंशन का पुनर्निर्धारण सम्मिलित है, जो इस बीच सेवानिवृत्त हो सकते हैं। उन्हें भुगतान किए गए अतिरिक्त वेतन-पेंशन की वसूली की जा सकती है। इससे कर्मचारियों के मध्य असंतोष उत्पन्न हो सकता है।”

केंद्र ने अपनी नीति का बचाव करते हुए कहा, “सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति का प्रतिनिधित्व अपर्याप्त है। आरक्षण का लाभ देने से प्रशासनिक व्यवस्था बाधित नहीं होती है। वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट प्रणाली के माध्यम से प्रशासनिक दक्षता सुनिश्चित की जाती है। इसके तहत हर अधिकारी के कार्य, व्यक्तिगत विशेषताओं और कार्यात्मक क्षमता का आकलन किया जाता है।”

केंद्र ने आगे अपने अधिकार क्षेत्र के तहत 75 मंत्रालयों और विभागों का डाटा प्रस्तुत किया और कहा कि कुल 27,55,430 कर्मचारियों में से 4,79,301 एससी, 2,14,738 एसटी हैं और ओबीसी कर्मचारियों की संख्या 4,57,148 है।

इससे पूर्व, सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति को पदोन्नति में आरक्षण प्रदान करने से संबंधित समसामयिक आँकड़े बताते हुए हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया था।