भारती / राजनीति
योगी सरकार ने माफिया के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसकाई, बाहुबलियों की खैर नहीं

पूर्वांचल के बाहुबली माफिया मुख्तार अंसारी हो या गुजरात की जेल में कैद अतीक अहमद, पश्चिम में अनिल दुजाना और सुंदर भाटी गैंग हो या फिर अमित कसाना, उमेश राय, बब्बू श्रीवास्तव जैसे अपराधी, सभी सन्निपात सी स्थिति में हैं। सभी सकते में हैं। दिनों-दिन इन सभी के पैरों के नीचे की जमीन खिसकती जा रही है।

मात्र साढ़े तीन वर्ष पहले तक जिनकी हैसियत सूबे की सरकार बनाने-बिगाड़ने की हुआ करती थी, आज जेल में बंद अपने साम्राज्य को तिल-तिल होते ढहते हुए देखने को मजबूर हैं। मार्च, 2017 के पहले तक, जो आतंक का पर्याय हुआ करते थे, आज खुद की जान को लेकर फिक्रमंद हैं।

बहुत दिन नहीं बीते जब यही मुख़्तार और अतीक, प्रदेश में आतंक हुआ करते थे। आये दिन इनके गुर्गे कहीं हत्या तो कहीं रंगदारी की वारदातों को अंजाम देते फिरते थे। दूसरे की संपत्ति पर अवैध कब्जा करना मानों इनका पहला कर्तव्य था। और, यह सब कुछ बगैर राजनीतिक संरक्षण के संभव हो, ऐसा मानना भी हास्यास्पद होगा। विधायक कृष्णानंद राय और राजू पाल की हत्या के बाद से इनके अपराधों की सरिता अविरल प्रवाहित होती रही। इनके कुकर्मों की कालिख उत्तर प्रदेश के चेहरे को बदरंग करती रही।

लेकिन, मार्च 2017 में उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद से इन जैसे माफियाओं के साम्राज्य पतन का जो दौर शुरू हुआ, आज वह दिनों-दिन जोर पकड़ता जा रहा है। सुखद यह है कि योगी की इस कार्रवाई को जनता का व्यापक समर्थन मिल रहा है।

फरवरी, 2018 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कैराना के आस-पास दो लोग हाथ में तख्तियाँ लेकर घूमते नज़र आ रहे थे। इनकी तख्ती में लिखा था- ‘मैं भविष्य में किसी भी अपराध में शामिल नहीं रहूँगा। भविष्य में मैं कठिन परिश्रम करके रुपये कमाऊँगा। कृपया हमें माफ कर दें।’ उन्होंने अपराधियों में कानून का डर पैदा किया।

उत्तर प्रदेश, जहाँ के अखबार चंद महीनों पहले तक दुष्कर्म, रंगदारी, डकैती, हत्या, अपहरण, तस्करी जैसी घटनाओं से अखबार के पन्ने रंगे हुए होते थे, ज़मीन पर अवैध कब्जा करना और बलात्कार के बाद हत्या कर पेड़ों पर लटकी लाशें सरकार की नपुंसकता और जनता की लाचारी का मुजाहिरा करती थीं, वहाँ के किसी पुलिस थाने में ऐसा दृश्य होना, राष्ट्रीय फलक पर आश्चर्य पैदा करना स्वाभाविक ही था।

वास्तव में, यह एक प्रतिनिधि दृश्य था, तेज़ी से आकार ले रहे नए उत्तर प्रदेश का। ऐसा प्रदेश, जहाँ का मुखिया साफ-सपाट शब्दों में खुले मंच से घोषणा करता है कि ‘उत्तर प्रदेश में अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं। अगर कोई अपराधी है तो फिर उसे या तो जेल की यात्रा करनी पड़ेगी या फिर ‘किसी और लोक’ की ओर प्रस्थान करना होगा।’

अपराध के विरुद्ध शून्य सहिष्णुता नीति की मुनादी करते हुए योगी आदित्यनाथ ने पिछले साढ़े तीन साल में अपराधियों के खिलाफ जिस सख्ती से कार्रवाई की है, उसने गुंडों, बदमाशों के साथ-साथ सफेदपोश अपराधियों को सन्निपात की स्थिति में ला दिया है। संगठित अपराध की रीढ़ टूट गई है।

कानून-व्यवस्था को चुनौती देने वाला हर अराजक तत्व योगी के निशाने पर रहा है। फिर वह कोई पेशेवर अपराधी हो या फिर राजनीतिक प्रदर्शनकारियों के वेश में हड़ताल और बंदी के नाम पर सरकारी और निजी संपत्तियों में तोड़फोड़ और आगजनी करने वाली अराजक जमात।

बीते 40-41 महीनों में योगी सरकार ने प्रदेश के करीब 40 अपराधियों की 330 करोड़ की संपत्तियाँ गैंगस्टर एक्ट के तहत कुर्क और जब्त की हैं। खासतौर से नौ पुलिसकर्मियों की नृशंस हत्या करने वाले बिकरू कांड के मुख्य आरोपित विकास दुबे के घर पर बुलडोज़र चलवाने के बाद माफिया के खिलाफ कार्रवाई अभियान ने जो तेजी पकड़ी है, वह नजीर बन रही है।

स्थिति यह है कि बीते तीन साल से यूपी की विपक्षी पार्टियाँ भी कमोबेश मौन हैं। हालाँकि, जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव का समय समीप आता जा रहा है, कांग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा और सपा प्रमुख अखिलेश यादव की सरकार पर हमले बढ़े हैं। हाल के दिनों में लखीमपुर खीरी में दुष्कर्म के बाद हत्या सहित कुछ घटनाओं को लेकर प्रियंका वाड्रा और अखिलेश यादव खासा हमलावर हैं। लेकिन, उनके कार्यकालों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। इसके साथ ही, आँकड़े भी योगी सरकार की बेहतरी व्यक्त करते हैं।

तुलनात्मक आँकड़े देखें तो, डकैती के मामले में साल 2016 के मुकाबले 2020 में 74.50 फीसदी और 2012 के मुकाबले 74.67 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई है। मौजूदा सरकार के कार्यकाल में अपराध की घटनाओं में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है तो लूट के मामलों में क्रमशः 65.29 प्रतिशत और 54.25 प्रतिशत की गिरावट हुई है, वहीं हत्या के मामलों में क्रमशः 26.43 फीसद और 29.74 फीसदी की कमी आई है।

फिरौती के लिए अपराध के मामलों में साल 2016 के मुकाबले साल 2020 में 54.55 प्रतिशत और 2012 के मुकाबले 64.29 प्रतिशत की कमी आई है। पॉक्सो एक्ट के मामलों में प्रभावी पैरवी करते हुए एक जनवरी 2019 से इस साल 30 जून तक 922 मुकदमों में आरोपियों को सजा हुई है। इनमें से पाँच को मृत्युदंड, 193 को उम्र कैद और 724 को अन्य सजा हुई है।

आधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक अपराधियों के खिलाफ की गई कार्यवाही में उत्तर प्रदेश देश के अन्य राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के मुकाबले काफी आगे है। आईपीसी के अपराधों में 4, 14, 112 गिरफ्तारियों के साथ उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर है। यह सर्वमान्य है कि समाज से अपराध कभी पूर्णतः समाप्त नहीं किया जा सकता, अलबत्ता शासन की नीतियाँ इतनी कठोर और कार्यवाही इतनी त्वरित जरूर होनी चाहिए कि अपराधी, कुछ करने से पहले 10 बार विचार ज़रूर करे।

योगी आदित्यनाथ जिस नए उत्तर प्रदेश को गढ़ रहे हैं, उसमें कानून का इक़बाल हरदम बुलंद रहेगा। कोई कितना भी बड़ा सूरमा क्यों न हो, इस “नए उत्तर प्रदेश” में कानून को चुनौती देना, उसके जीवन की सबसे बड़ी भूल साबित हो सकती है। ‘योगी राज’ क्या है, इससे हर अपराधी भलीभांति परिचित हो चला है। यह अपराधियों की बदहवासी का ही परिचायक है कि, पुलिस की गिरफ्त में आने के बाद वह भागने की कोशिश करते हैं, और अंततः वही होता है, जिसके वह पात्र हैं।

योगी आदित्यनाथ के बारे को करीब से जानने वाले लोग अक्सर उन्हें “कठोर” कहते हैं। पर ऐसे राज्य में, जहाँ माफिया ही शासन करते रहे हों, उसे भेदभाव रहित, सर्वमंगल की कामना के साथ विकासपरक राज्य के रूप में प्रतिष्ठापित करने की इच्छा हो, तो, कई बार कठोर होना कल्याणकारी होता है। बाकी, योगी की संवेदनशीलता का परिचय, कोरोना की विभीषिका के बीच दिल्ली से भगाए गए यूपी-बिहार के साढ़े तीन लाख श्रमिक बेहतर ढंग से दे सकते हैं।

पिछले दिनों योगी आदित्यनाथ के ऑफिस ने ट्वीट कर कहा कि उत्तर प्रदेश के शब्दकोश में ‘अवैध,अनैतिक और अराजक’ जैसे शब्द नहीं हैं। यह कोई सामान्य ट्वीट नहीं है, वरन, यह अंतिम चेतावनी है उन अपराधियों के लिए जो दशकों से राजनीतिक संरक्षण के साये में अपने काले साम्राज्य का सतत विस्तार करते रहे हैं। जिन्हें यह बात भी समझ में न आए, उन्हें योगी आदित्यनाथ का यह संदेश आत्मसात कर लेना चाहिए…

“दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति।
दण्डः सुप्तेषु जागृति दण्डं धर्म विदुर्बुधाः।।”

महेंद्र कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार रहे हैं और वर्तमान में दी द उ गोरखपुर विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग में सहायक आचार्य हैं। क्षितिज पांडेय वरिष्ठ पत्रकार हैं।