राजनीति
झूठी ख़बरों के साथ-साथ झूठी कहानियों का खंडन क्यों है आवश्यक

प्रसंग

  • झूठी खबरें तेजी से फैलती हैं क्योंकि झूठी कहानियाँ इनका आधार होती हैं।
  • तकनीक झूठी खबरों और इसके प्रसार को चिह्नित कर सकती है, लेकिन झूठी कहानियां हमेशा के लिए जारी रह सकती हैं।

प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल के साथ ख़बरों के प्रसार के उदय, चाहे यह डिजिटल मीडिया के माध्यम से हो या सोशल मीडिया के माध्यम से, ने “झूठी खबरों” के त्वरित प्रसार की समस्या को प्रोत्साहित किया है। यह सार्वजानिक हिंसा का कारण भी बनता है। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है तथ्य-परीक्षकों के एक पूरे समूह, जिसे विश्व के भले मानसों द्वारा वित्त पोषित किया जाता है, का निर्माण किया गया है जिसका लक्ष्य है झूठी खबरों को चिह्नित करना और इन पर लगाम लगाना।

निश्चित रूप से यह एक अच्छा विकास है लेकिन एक समस्या है जो फिलहाल बनी हुई है और यह है पूर्वाग्रह: आप जितना चाहें उतने “तथ्यों” की जांच कर सकते हैं, लेकिन तथ्यों को संकलित करने और उनकी व्याख्या करने में अंतर्निहित पूर्वाग्रह ऐसी कहानियाँ बनाते हैं जो फर्जी हो भी सकती हैं या नहीं भी। सच्चाई यह है कि बिना कोई कहानी गढ़े सरल “तथ्यों” की जाँच करना एक अलग बात है लेकिन ज्ञात “तथ्यों” को एक साथ लाकर एक कहानी गढ़ना जो आपकी राजनीतिक विचारधारा के अनुरूप हो, एक और अधिक खतरनाक वास्तविकता को जन्म देता है: यानी फर्ज़ी कहानियों का प्रसार। झूठी खबरों के त्वरित प्रचार के लिए फर्ज़ी कहानियों की आवश्यकता होती है। ऐसा तब होता है जब हम एक ऐसी कहानी पर विश्वास करना चाहते हैं जिसके प्रचार में हम इरादतन या गैर-इरादतन एक हिस्सा होते हैं।

किसी विशेष घटना को सुशोभित करने के लिए एक परिवर्तित तस्वीर का गलत तरीके से उपयोग होने पर और कहानी गढ़े जाने के साथ “तथ्य” हथियार का रूप ले लेते हैं। मनगढ़ंत कहानियों का प्रसार ही झूठी खबरों को हवा देता है। इसका कारण यह है कि यदि आपमें किसी कहानी पर विश्वास करने की प्रवृत्ति है तो आपके द्वारा इस “तथ्य” को ट्वीट या फिर से ट्वीट किए जाने की अधिक संभावना होती है।

2014-15 की “चर्च हमलों” की कहानियों पर विचार कीजिए। जब कुछ चर्चों में घटनाएं हुईं, तो तथ्यों में मतभेद नहीं था लेकिन उन पर बनाई गई कहानी वास्तव में झूठी थी। किसी ने भी यह जांचने की हिम्मत नहीं की कि ऐसी ही घटनाएं मंदिरों के आसपास भी हो रही थीं और ऐसा बहुत बड़े पैमाने पर हो रहा था। जब रूपा सुब्रमण्य ने ऐसा किया तो सभी झूठी कहानियां स्पष्ट हो गईं।

सवाल यह है कि जब कई घटनाओं के बारे में समर्थक साक्ष्य प्रस्तुत किए गए थे तो हम झूठी कहानी पर विश्वास क्यों करना चाहते थे कि चर्चों पर हमला किया जा रहा था?

हमारी धारणा में शायद इन घटनाओं का कारण यह है कि हम मानते हैं कि भाजपा अल्पसंख्यक-विरोधी है, और इसलिए यदि उनमें से किसी के साथ कुछ होता है, तो यह सब भाजपा के वजह से ही होना चाहिए। हम मानते ही नहीं है कि ऐसी चीजें कांग्रेस या क्षेत्रीय पार्टी के शासन के दौरान भी हो सकती हैं।

यही समस्या तब भी खड़ी होती है जब आप मुसलमानों को गाय-संबंधी हिंसाओं का सबसे बड़ा शिकार मानते हैं जिसे शायद हिंदुओं द्वारा काल्पनिक रूप से रचा जाता है, ऐसा तब होता है जब आपके लिए अंग्रेजी अखबार तैयार करने में इस विधि का प्रयोग किया जाता है और आपको अपनी परिकल्पना के अनुरूप प्रासंगिक डेटा मिल जाता है। इस तरह के डेटा विश्लेषण की रचना के बारे में किसी ने भी कोई आसान सा सवाल भी नहीं पूछा। (स्वराज्य ने यहाँ एक रिपोर्ट में इसका प्रयास किया)

पूछे जाने वाले आवश्यक प्रश्नों में निम्नलिखित प्रश्न शामिल हैं:

पहला, ऐसे देश में जहां 80 प्रतिशत आबादी हिंदू और लगभग 15 प्रतिशत मुस्लिम मानी जाती है, क्या इस मूल अनुपात के लिए डेटा मानकीकृत किया गया था?

दूसरा, क्या इसकी जांच करने के लिए कोई प्रयास किया गया कि क्या मुस्लिम लिंचिंग में बताई गई वृद्धि बेहतर रिपोर्टिंग का नतीजा थी या यह ऐसी घटनाओं में वास्तविक वृद्धि थी? निर्भया कांड के बाद बलात्कार की संख्या में भारी वृद्धि की सूचनाएँ मिलीं। दिसम्बर 2012 में दिल्ली में एक बस में ज्योति सिंह के गैंगरेप के बाद, भारी सार्वजनिक हाहाकार के कारण बलात्कार की रिपोर्टिंग अधिक होने की संभावना बढ़ जाती है। तो, क्या यह संभव नहीं है कि मुसलमानों के खिलाफ अपराधों की रिपोर्टिंग को और हवा मिली, क्योंकि भाजपा की सरकार है और यह विश्वास करना आसान है कि यह सच हो सकता है?

तीसरा, ऐसे देश में जहां अधिकांश राज्यों में कानून प्रवर्तन की खराब गुणवत्ता के चलते कानून हाथ में लेकर न्याय करना सामान्य है, वहाँ क्या यह संभव नहीं है कि यह कार्य भी भीड़ द्वारा न्याय के माध्यम से किया जाता है? क्या यह भी संभव नहीं है कि हिंदुओं की अपेक्षा अधिक मुसलमान प्रायः अवैध रूप से कत्ल करने के लिए गायों की तस्करी करते हैं, और इन पर निशाना साधे जाने की अधिक संभावना होती है? इसके अलावा, कई मामलों में यह मुद्दा गौहत्या रोकने के सन्दर्भ में कम बल्कि इस अवैध धंधे को संरक्षण देने वाले माफियाओं को हफ्तावसूली के गैर-भुगतान के सन्दर्भ में ज्यादा हो सकता है, क्योंकि कई राज्यों में गाय की हत्या प्रतिबंधित है। भारत में सभी प्रतिबंधों को धूर्त लोगों द्वारा ठेंगा दिखाया जाता है।

चौथा, अगर कोई बकरी, मुर्गी या बच्चे की चोरी से संबंधित लिंचिंग को गूगल पर ढूंढ़ना चाहता है, तो आप पा सकते हैं कि गौरक्षा लिंचिंग समस्याओं में से एक है। इसलिए, यह धारणा है कि भाजपा शासन के तहत विशेष रूप से नए प्रकार की लिंचिंग शुरू हो गई है, यह केवल आंशिक रूप से सच हो सकता है।

यह सुझाव देना सही नहीं है कि स्वतः न्याय ठीक है, या मुसलमानों पर हमले सिर्फ इसलिए होते हैं क्योंकि लिंचिंग उन क्षेत्रों में अनोखी बात नहीं है जहाँ कानून की पहुँच बहुत कम है, लेकिन कोई भी अकादमिक अध्ययन जो राजनीतिक बिंदु को साबित करने के लिए डेटा का उपयोग करना चाहता है, उसे और अधिक सूक्ष्म-भेद-विवेचक होना चाहिए। अगर शोध डेटा का अध्ययन सही सन्दर्भ में नहीं करता है तो आपको एक पक्षपातपूर्ण कहानी मिलेगी।

हाल ही में, बीबीसी ने कुछ मुट्ठी भर साक्षात्कारों के आधार पर एक सोशल मीडिया अध्ययन किया, जिसमें निष्कर्ष निकाला गया कि “दक्षिणपंथी नेटवर्क वामपंथी नेटवर्क की तुलना में अधिक संगठित है, जो राष्ट्रवादी झूठी कहानियों का प्रसार करता है। ट्विटर पर झूठे समाचार स्रोत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन नेटवर्क परस्पर व्याप्त थे।”

किसी को इसपर बात करनी चाहिए यह सुविधाजनक निष्कर्ष मोदी के भारत पर वर्तमान पश्चिमी कहानी के अनुरूप है, लेकिन किसी को इस निष्कर्ष तक पहुँचने के तरीकों के बारे में सवाल पूछना चाहिए, जैसे Opindia इस लेख में करता है।

सबसे अहम बात यह है कि अध्ययन इस तथ्य को समायोजित करने का कोई प्रयास नहीं करता है कि मोदी समर्थक सोशल मीडिया में केन्द्रित हो सकते हैं, जिसके लिए मुख्यधारा की मीडिया से उनके दीर्घकालिक निर्वासन के लिए धन्यवाद, और इस प्रकार उनका प्रभाव केवल सोशल मीडिया पर ही अनुपातहीन हो सकता है। अगर कुल मिलाकर उनके पास गलत खबर फैलाने पर मतों का अनुपातहीन भाग है, तो यह एकाग्रता है जो दोषपूर्ण हो सकती है, न कि झूठी खबरों को साझा करने की अधिक प्रवृत्ति। पुरानी मीडिया झूठी खबरों को फैलाने में उतनी ही अच्छी है जितनी कि सोशल मीडिया – यह केवल धीमी है क्योंकि उनकी तकनीक पुरानी है।

इसके विपरीत, इस बात पर विचार करें कि अंग्रेजी और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में भाजपा विरोधी कहानियों को कितनी तेजी से साझा किया जाता है, जहाँ मोदी सरकार को केवल नकारात्मक रूप में दिखाया जाता है और जो अक्सर चर्च पर हमलों जैसी झूठी कहानियों सहित घरेलू अंग्रेजी मीडिया द्वारा उत्पन्न नकली खबरों से प्रेरित होती हैं। अगर आप मानते हैं कि दक्षिण-पंथ (चाहे आप इसे किसी भी तरह परिभाषित करते हों) का सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से प्रतिनिधित्व किया जाता है और वामपंथियों के मुकाबले यह अधिक झूठी खबरें फैला रहा है, तो क्या घरेलू या अंतर्राष्ट्रीय अंग्रेजी मीडिया की झूठी ख़बरों के प्रसार की जाँच करना उतना ही महत्वपूर्ण नहीं है?

कन्हैया कुमार के भाषण के एक वीडियो पर एक हालिया बूम फैक्टचेक एक उदहारण है कि कैसे झूठी कहानियों को सच के रूप में बल मिलता है जब हम “झूठे तथ्यों” को उजागर करने पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। बूम फैक्टचेकर ने फिल्म निर्माता विवेक अग्निहोत्री पर कन्हैया कुमार के भाषण वाले एक वीडियो को ट्वीट करने के लिए निशाना साधा जिसमें कुमार इस्लाम के बारे में बात करते हुए दिखाई दे रहे थे मानो यह उनका धर्म था, जबकि कुमार जो कर रहे वह यह था कि वह मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को अशुद्ध तरीके से उद्धृत कर रहे थे।

वीडियो में कन्हैया कुमार मुस्लिमों के बारे में यह कह रहे थे – “हमारा इतिहास इस जगह से जुड़ा हुआ है। हम पूरी तरह से अरब से चल कर इस देश में नहीं आए हैं। हम यहाँ बड़े हुए हैं और उस धर्म की विशेषता है…और छुआछूत मानने वाले पुराने धर्म ही इसकी वजह थे कि लोगों ने इस धर्म को अपनाया। क्योंकि यह धर्म समानता और शांति की बात करता है। मस्जिद में, सामाजिक पदानुक्रम की प्रथा नहीं होती है। इस आधार पर हमने इस धर्म को अपनाया है और हम इसे नहीं छोड़ेंगे।”

कन्हैया कुमार के अपने धार्मिक संबंध के संदर्भ में अग्निहोत्री ने “हम” के संदर्भ की गलत तरीके से व्याख्या कर डाली, और इस गलती को उजागर करने के लिए बूम की सराहना की जानी चाहिए, लेकिन कन्हैया कुमार की कहानी पर कोई चर्चा नहीं हुई।

मौलाना अबुल कलाम आजाद इस्लामवादी थे और एक ऐसे वैश्विक जिहाद में विश्वास करते थे जिससे अलकायदा असहज नहीं होगा। और जबकि यह सच है कि मौजूदा समय में भारत में जो मुस्लिम हैं वे वह नहीं हैं जो अरब से आए थे – उनका बड़े पैमाने पर स्थानीय रूप से धर्मान्तरण किया गया था – तब इस दावे का समर्थन करने वाले कोई सबूत नहीं हैं कि ये धर्मान्तरण इसलिए हुए थे क्योंकि हम लोग छुआछूत में विश्वास करते थे या कड़े जातीय पदानुक्रम का पालन करते थे जबकि इस्लाम में ऐसा कुछ नहीं था। आज भी, मुसलमान जाति व्यवस्था द्वारा वैसे ही पीड़ित हैं जिस तरह से गैर-मुस्लिम या हिन्दू पीड़ित हैं।

बी.आर.अंबेडकर ने पाकिस्तान पर अपने प्रबंध में दास्यमुक्ति के लिए तथाकथित इस्लामी दावों को खारिज किया था। उनका यह कहना था कि–

“जाति व्यवस्था को ले लो। इस्लाम भाईचारे की बात करता है। हर कोई यह तर्क करता है कि इस्लाम दासता और जाति से मुक्त होना चाहिए। दासता के बारे में कुछ भी कहने की जरूरत नहीं है। कानून द्वारा यह अब समाप्त हो गया है। लेकिन जब यह अस्तित्व में था तो इस्लाम या इस्लामिक मुल्कों द्वारा ही इसको अधिकांश समर्थन दिया गया था…।”

“भले ही दासता का खात्मा हो गया है, लेकिन मुस्लिमों के बीच जाति बनी हुई है। एक उदाहरण के रूप में कोई भी बंगाली मुस्लिमों के बीच प्रचलित स्थितियों को ले सकता है। बंगाल प्रान्त में 1901 में होने वाली जनगणना के अधीक्षक ने बंगाली मुस्लिमों के बारे में निम्नलिखित दिलचस्प तथ्यों को पाया था – मुस्लिम खुद दो प्रमुख सामाजिक प्रभागों को मान्यता देते हैं (1) अशरफ या शरफ और (2) अजलाफ। अशरफ का अर्थ होता है ‘महान’ और इसमें विदेशियों के सभी स्पष्ट वंशज और उच्च जाति के धर्मान्तरित हिन्दू शामिल होते हैं। अन्य सभी मुस्लिमों, जिनमें व्यावसायिक समूह और निचले वर्गों के सभी धर्मान्तरित लोग शामिल होते हैं, को तिरस्कारपूर्ण शब्दों, ‘अजलाफֹ’ (नीच या मतलबी), द्वारा जाना जाता है: इन लोगों को कमीना भी कहा जाता है। कुछ स्थानों पर एक तीसरा वर्ग भी है जिसे अरज़ल ‘सबसे निम्न’ कहा जाता है। उनके साथ कोई अन्य मुस्लिम रिश्ता नहीं रखता और उन्हें सार्वजनिक कब्रिस्तान की जमीन का उपयोग करने के लिए मस्जिद में प्रवेश करना मना होता है।” (अंबेडकर का मोनोग्राफ देखें, भाग IV, अध्याय 10)

यह उदाहरण देखकर पहली बात यह समझ में आती है कि – तथ्यों की जाँच महत्वपूर्ण होती है लेकिन झूठी खबरों पर कभी सवाल नहीं उठाया जाता। कन्हैया कुमार अबुल कलाम आजाद की झूठी कहानी को उद्धृत करके झूठी कहानियों फैला रहे थे, लेकिन हम केवल अग्निहोत्री के इस निष्कर्ष को पकड़ पाए कि शायद कुमार इस पक्षपातपूर्ण एडिटेड वीडियो में अपना धर्म प्रकट कर रहे हैं।

झूठी खबरें तेजी से फैलती हैं क्योंकि झूठी कहानियाँ इनका आधार होती हैं। तकनीक झूठी खबरों और इसके प्रसार को चिह्नित कर सकती है, लेकिन झूठी कहानियां हमेशा के लिए जारी रह सकती हैं। कितने अफसोस की बात है! हमारी झूठी खबरों के पीछे का असली विलेन सही सलामत है। हम असली जड़ तक नहीं पहुँच पा रहे हैं।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडिल @TheJaggi है।