राजनीति
क्या भोजपुरी ‘अमिताभ बच्चन’ रवि किशन योगी आदित्यनाथ को गोरखपुर जीता पाएँगे?

गोरखपुर और पूर्वी उत्तर प्रदेश के पड़ोसी जिलों में अपने वर्चस्व को फिर से स्थापित करने के लिए राजनीतिक रूप से आश्चर्यजनक कदमों की एक श्रृंखला में, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व को भोजपुरी अभिनेता-राजनेता रवि किशन को गोरखपुर की लोकसभा सीट से मैदान में उतारने के लिए राजी कर लिया है।

भाजपा के सामाजिक गठबंधन को बनाए रखने के उद्देश्य से पार्टी ने गोरखपुर से सांसद, प्रवीण निषाद को पड़ोस कि संत कबीर नगर लोकसभा सीट पर स्थानांतरित कर दिया।

निषाद ने समाजवादी पार्टी (सपा)-बहुजन समाज पार्टी (बसपा)-निषाद पार्टी के संयुक्त प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा था। निषाद पार्टी ने गोरखपुर उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी उपेंद्र शुक्ला को हराकर जीत हासिल की थी। योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी लोकसभा सीट छोड़ने पर उपचुनाव की आवश्यकता पड़ी।

हाल ही में निषाद ने भाजपा में शामिल होकर सबको चौंका दिया।

उपचुनाव में मिली करारी हार से पहले, गोरखपुर को भाजपा का गढ़ माना जाता था या अधिक विशेष रूप से गोरखपुर मठ का गढ़। 1998 में इस सीट से योगी आदित्यनाथ निर्वाचित हुए और अगले चार चुनावों में भी इस सीट को जीतकर अपने नाम रखा। उनसे पहले भाजपा से उनके उपदेशक और गुरु महंत अवैद्यनाथ तीन बार सांसद चुने गए थे।

रवि किशन, जिन्हें अक्सर भोजपुरी अमिताभ बच्चन के रूप में वर्णित किया जाता है, भोजपुरी फिल्म उद्योग के महानायक हैं। इस अभिनेता ने श्याम बेनेगल और मणिरत्नम जैसे शानदार फिल्मकारों के साथ हिंदी फिल्मों में भी काम किया है।

2014 के लोकसभा चुनाव में, रवि किशन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए थे और अपने गृहनगर, जौनपुर, यूपी से चुनाव मैदान में थे। जौनपुर में उनकी भारी लोकप्रियता के बावजूद, उन्हें एक अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा क्योंकि मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा ने पूरे राज्य में शानदार जीत हासिल की। 2017 में, रवि किशन भाजपा में शामिल हो गए।

केवल किशन ही ऐसे भोजपुरी अभिनेता नहीं हैं, जो भाजपा से आम चुनाव लड़ रहे हैं। बीजेपी ने एक और भोजपुरी सुपरस्टार दिनेश लाल यादव को जो कि निरहुआ के नाम से लोकप्रिय हैं, को आजमगढ़ से मैदान में उतारा है।

राजनीतिक पर्यवेक्षक राज्य में एक उम्मीदवार को मैदान में बीजेपी द्वारा उतारे जाने के पीछे यह कारण देखते हैं कि एक ऐसा उम्मीदवार हो जिसकी पकड़ केवल जातिगत आधार पर ना हो, यह सबक बीजेपी ने उपचुनाव में हार के बाद ली है।

कई पर्यवेक्षकों ने महसूस किया कि बीजेपी ने अपनी जाति गणना में गलती की और गोरखपुर उपचुनाव में योगी के एक प्रतिनिधि को मैदान में उतारने के प्रस्ताव को समर्थन नहीं देकर आग से खेला है। उपचुनाव के दौरान कई रिपोर्ट ने संकेत दिया कि आदित्यनाथ चाहते थे कि मठ के सदस्य को ही नामांकित किया जाए क्योंकि उनका मानना था कि एक बाहरी व्यक्ति गोरखनाथ मठ के राजनीतिक प्रभाव को कम कर देगा, और उन्होंने अमित शाह को यह निर्णय लेने को कहा जो की अधिकतर ऐसे फैसले लेते हैं।

मठ नेता के बजाय एक प्रभावशाली ब्राह्मण नेता, उपेंद्र दत्त शुक्ला, को मैदान में उतारने के शाह के फैसले पर राज्य के राजनीतिक घेरे में अटकलें तेज हो गईं। यह भी अटकलें लगाई जाने लगी कि अमित शाह आदित्यनाथ के कद को कम करना चाहते हैं।

यह भी कहा जा रहा था कि शाह राज्य के ब्राह्मणों को तसल्ली देना चाहते थे, जो कि ठाकुर समाज के मुख्यमंत्री होने से नाराज थे। योगी आदित्यनाथ जन्म से एक ठाकुर हैं (गोरखनाथ के आदेश में प्रवेश करने से पहले उनका नाम अजय सिंह बिष्ट था।)

राजनीतिक टिप्पणीकारों के अनुसार, रवि किशन और प्रवीण निषाद को मैदान में उतारने का निर्णय भाजपा नेतृत्व का एक चतुर कदम है। निषाद या नाव वाले समुदाय के साथ-साथ मल्लाह और कहार जैसे अन्य अति पिछड़ी जतियों(एमबीसी) के गोरखपुर और संत कबीर नगर में 20 प्रतिशत मतदाता हैं। लगभग 35 से 40 फीसदी मतदाताओं वाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और अन्य समूहों के साथ, राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि भाजपा के पास अपना गढ़ फिर से हासिल करने का अच्छा मौका है।