राजनीति
क्यों संवैधानिक संशोधनों पर विचार करना आवश्यक है

आशुचित्र- प्रस्तावित संशोधनों के प्रति संदेह होना आवश्यक है और यह सोचना कि ये अनावश्यक है और इन पर वार्ता से संविधान का प्रारूप नष्ट होता है, सबसे बड़ा भ्रम है।

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का दूसरा कार्यकाल समाप्त होने जा रहा है और कई उपलब्धियाँ समक्ष प्रस्तुत हैं। लेकिन मेरे ख्याल में संविधान में 101वाँ संशोधन वस्तु एवं सेवा कर सर्वाधिक चिरस्थायी उपलब्धि रही।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे ज्यादा ठोस कर सुधार है। साथ ही 99वें संवैधानिक संशोधन से राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति समिति (एनजेऐसी) निर्मित की गई जिसे बाद में खत्म कर दिया गया। ये दो संवैधानिक संशोधन भारी संविधान की मरम्मत के लिए मौलिक कदम थे।

संविधान में बदलाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा प्रस्तावित संशोधन कांग्रेस तथा अन्य विपक्षी दलों द्वारा घटिया करार दिए गए। यह बहुत सारे टुकड़ों में विभाजित वार्ता थी जिसमें राजनीति से जुड़े कई लोग सम्मिलित हुए। इस पर भाजपा ने प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस द्वारा किए गए कई सारे संशोधन गिनाए अथवा अंनत कुमार हेगड़े के मामले में उनके द्वारा अपने कथन के लिए क्षमा मंगवाई।

संविधान को देवता सदृश देखना अमरीकी आदत है जिसमें मूलभूत दस्तावेज को पूर्णत: निष्पक्ष माना जाता है जिसकी हर कीमत पर रक्षा करने की आवश्यकता मानी जाती है। संविधान की पवित्रता और महत्ता से जुड़ी भवनाएँ कतई गलत नहीं हैं लेकिन समस्या तब होती है जब इसे अचूक बताया जाता है। यह संविधान में संशोधन से जुड़ी अति आवश्यक वार्ता को यह बता कर दबा देता है कि संशोधन के समर्थक संविधान का नया प्रारूप निर्मित करना चाहते हैं।

संविधान तभी बेहतर हो सकते हैं जब राज्य व्यवस्थाएँ उन्हें बेहतर बनाए। कोई भी संविधान दोषहीन नहीं होता। आदर्श संविधान वही होता है जिसे हम पाने की अभिलाषा रखते हैं लेकिन यह सच्चाई नहीं हो सकती। हमें निरंतर उस लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहिए जो सदैव हमें हमारे बहुत नज़दीक दिखता है लेकिन वास्तव में है बहुत दूर। भारत का संविधान निश्चित ही एक श्रेष्ठ संविधान है जिसका महान व्यक्तियों के सम्मिलित प्रयासों द्वारा निर्माण किया गया है। हालाँकि यह दोषहीन नहीं है जिसमें संशोधन नहीं किया जा सके।

प्रत्येक संविधान में संशोधन के प्रावधान होते हैं जिनसे किसी भाग अथवा पूर्ण संविधान में संशोधन किया जा सकता है। हमारा संविधान अनुच्छेद 368 के अंतर्गत कुछ भागों में संसद में बहुमत के आधार पर बदलाव करने के प्रावधान देता है। कुछ भागों में दो तिहाई बहुमत के आधार पर संशोधन तथा कुछ में आधे से अधिक बहुमत के आधार पर संशोधन संभव है। डॉ. बी आर अंबेडकर ने संशोधन के बहुस्तरीय प्रारूप को पक्षपात हटाने के लिए तर्कसंगत रूप से आवश्यक बताया था।

केंद्र तथा राज्यों के संबंध को प्रभावित करते बिंदुओं तथा स्वयं अनुच्छेद 368 में संशोधन की रक्षा के लिए राज्य अनुममर्थन का अतिरिक्त कवच आवश्यक था। हमारे संविधान में संशोधन प्रक्रिया अमरीका की तुलना में आसान है जहाँ संशोधन का अनुममर्थन कांग्रेस (राज्यों के कन्वेंशन) द्वारा तथा तीन-चौथाई राज्यों द्वारा किया जाता है। परिणाम स्वरूप अमरीका में 220 से अधिक वर्षों के संविधान में केवल 27 संशोधन ही हो सके हैं। वहीं भारतीय संविधान में 68 वर्षों के इतिहास में 102 संशोधन हुए हैं।

इन दोनों की तुलना में यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि हमारा संविधान अमरीकी संविधान से 20 गुना बड़ा है। अभी तक हुए संशोधन हमें अधिक संशोधन न करने के लिए प्रेरित नहीं करते लेकिन सच्चाई यह है कि इतने संशोधनों से अनावश्यक चीज़ें बढ़ गई हैं तथा कई तरह के न्यायिक संदर्भों से संविधान अधिक जटिल हो गया है।

इस बात को समझने के लिए अनुच्छेद 368 का उदाहरण लेते हैं। उसकी धारा 3 में आलेख 13 की परिधि में संशोधन का प्रावधान नहीं है जो कि तीसरे भाग में कानून की व्याख्या करता है तथा मौलिक अधिकारों से संबंधित है। यह मौलिक अधिकारों के हनन के आधार पर संवैधानिक संशोधन को चुनौती देता है। यह संविधान के मूल नियमों के साथ असमर्थनीय है।

उसी तरह अनुच्छेद 368 की धारा 4 वर्ष 1976 के पहले किए गए किसी भी संशोधन को अदालत में चुनौती देने पर रोक लगाती है। यह पुन: संविधान के मूल उपदेशों के विपरीत है। यह केशवानंद भारती के मुद्दे में दिए गए सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में शासन की प्रतिक्रिया जैसा था जिससे मूल स्वरूप के सिद्धांत की शुरुआत हुई जो खुद एक समस्या है। शासन तथा न्यायतंत्र के बीच सालों से रही असहमतियों से संविधान का इतना जटिल स्वरूप बना है।

संविधान का यह प्रारूप न केवल प्रशासन और सरकार के लिए मामलों को जटिल करता है अपितु जो आम आदमी संविधान के बिंदुओं को समझना चाहता है उसके लिए भी यह जटिल हो जाता है। सरल और समझने योग्य होने के विपरीत संविधान अधिकांश नागरिकों के लिए एक पहेली जैसा है तथा यह भारतीय गणराज्य के लिए उचित नहीं है। संविधान इतना सरल तथा सुलभ होना चाहिए जिससे अधिकांश नागरिक इसे समझ सकने में सक्षम हों न कि यह अपाठ्य और सीमाहीन हो।

संविधान को नागरिकों की समस्या तथा वक़्त के साथ गतिशील होना चाहिए। यह कार्य अनिर्वाचित न्यायतंत्र की “रचनात्मक व्याख्या” के अनुसार नहीं होना चाहिए तथा इसके लिए उन्हें यह ज़िम्मेदारी दी भी नहीं जाती। यह निर्वाचित सांसदों की ज़िम्मेदारी है तथा संविधान स्वयं उन्हें यह ज़िम्मेदारी देता है।

संविधानवाद के आवश्यक बिंदुओं को बहाल करने की तथा ताकत के बँटवारे और शासनतंत्र में निपुणता सुनिश्चित करने के लिए संशोधन करने की आवश्यकता है। एनडीए सरकार ने इस दिशा में आवश्यक कदम उठाए हैं लेकिन ये कदम यहीं नहीं थमने चाहिए।

प्रस्तावित संशोधनों में अविश्वास होना चाहिए लेकिन केवल भ्रम ही यह सोचने पर विवश करता है कि ये आवश्यक नहीं है और इन पर वार्ता संविधान के प्रारूप को नष्ट करना है। संविधान में संशोधन के लिए दिए गए कथन तथा वार्ता और संविधान के प्रारूप को बिगड़ने की बात को एक नज़र से देखना उदासीनता की बात है जिससे महत्वपूर्ण चीज़ खतरे में रहती है अथवा दब जाती है। हमें इस पर सोचना होगा।

गुरप्रीत चोपड़ा को उनके सहयोग के लिए धन्यवाद।
अनंत कृष्णा कोची, केरल में एलएलबी (ऑनर्स) के लिए अध्ययनरत हैं।