राजनीति
2019 चुनावों से पूर्व सरनेम और नेतृत्व क्षमता में भ्रमित न हों

आशुचित्र- भारत को एक ऐसा नेता चाहिए जिसने घाट-घाट का पानी पिया हो, न कि ऐसा जिसका एकमात्र गुण इसका सरनेम हो।

पिछले कुछ दिनों में गतिविधियों में काफी तेजी आई है जैसे कि शहीद दिवस पर महात्मा गांधी को याद करना, जॉर्ज फर्नांडीस की मौत, गणतंत्र दिवस की परेड में भारतीय राष्ट्रीय सेना (आईएनए) के कुछ दिग्गजों का शामिल होना ,कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा कथित तौर पर रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर के साथ साक्षात्कार, प्रियंका वाड्रा को कांग्रेस में एक वरिष्ठ पद और ममता बनर्जी द्वारा बंगाल में ताना-तानी। यह तरह-तरह की भावनाओं का मिश्रण है जिसका कारण चुनाव हैं, इसका उल्लेख करना आवश्यक नहीं है।

मेरे लिए यह पूरा मुद्दा नेतृत्व के बारे में है। मैंने 1998 में ‘चलो दिल्ली’ (सचेत रूप से आईएनए का युद्ध नारा) नाम का निबंध लिखा था जिसमें मैंने कहा था कि हम सभी को दिल्ली पर आक्रमण करना चाहिए क्योंकि ”दिल्ली भारत में सबसे बुरा है और यह परोपजीवी स्तालिनवादी, स्वयं सेवी, स्वयं अविरत राज्य है जो भारत को अंदर से खोखला कर रहा है और यही भारत के साथ गलत हो रहा है”। ये शब्द पहले के हैं और ‘लुटियन’ शब्द ने इस सभी शब्दों को एक साथ समेट लिया।

इसके अलावा मैंने तब कहा था, “एकमात्र घटक गायब है जो कि है नेतृत्व”। वह अक्षम्य, अकथनीय, अयोग्य कारक जो एक राष्ट्र को महान बनाता है जो कि हमने अपने स्वतंत्रता सेनानियों के व्यक्तित्व जैसे कि सुभाष बोस में, गांधी में और हाल ही में जॉर्ज फर्नांडीस में देखा है। क्या इसके महत्त्व को शब्दों में पिरोना संभव है?

संयोग से मैं इकोनॉमिस्ट पत्रिका को पढ़ रहा था और मुझे मैक्स वेबर (‘द व्हील ऑफ हिस्ट्री’, 25 जनवरी 2019) के बारे में एक विस्तृत लेख मिला। सच कहूँ तो मैंने वेबर के बारे में अस्पष्ट सुना था लेकिन मुझे पता नहीं था कि वे कौन थे (लेख का दावा है कि वे ‘आधुनिक समाजशास्त्र का संस्थापक है’)। लेकिन उनके बारे में और उनके 1919 का व्याख्यान, “राजनीति एक पेशे के रूप में” इतना पेंचीदा था कि मुझे इसे विस्तार से उद्धृत करना पड़ा-

“वेबर के लिए एक सच्चा राजनीतिक नेता वह है जिसके लिए राजनीति एक व्यवसाय है और जिसमें तीन गुण हैं, पहला जुनून, दूसरा ज़िम्मेदारी की भावना और तीसरा अनुपात बनाए रखना। नेता के पास एक उद्देश्य होता है, वह शक्तियों के साथ नौबढ़ जैसे डींगमार न हो जिसकी आधारहीन नीतियाँ राज्य को कहीं भी नहीं लेकर जाएँगी। इसके विपरीत राजनीतिक नेतृत्व के लिए जिन लोगों को चिह्नित किया गया है उनमें नैतिक आधार और उद्देश्य की विशाल भावना है। और ये शांत निर्णय और ज़िम्मेदारी की गहरी भावना के साथ संयुक्त भी हैं। ये सभी गुर एक साथ ऐसे राजनेता को पैदा करते हैं जो इतिहास के पहिये को घुमाने में सक्षम हो। यह सही मायने में मानव है और गंभीरतापूर्वक चल रहा है जब (मार्टिन लूथर जैसे) नेता कहते हैं- यहाँ मैं खड़ा हूँ, मैं कुछ और नहीं कर सकता।”

मैं इस परिभाषा को आपके समक्ष रखना चाहता हूँ ताकि यह विचार किया जा सके कि भारत में कौन इन तीन लक्षणों का अनुकरण कौन करता है। इस चुनावी मौसम में प्रस्तावित कथित नेताओं में से कौन है ऐसा नेता? अरविंद केजरीवाल? ममता बनर्जी? मुलायम यादव? चंद्रबाबू नायडू? कांग्रेस अध्यक्ष? प्रियंका वाड्रा? पी चिदंबरम? शशि थरूर? नरेंद्र मोदी? अमित शाह? निर्मला सीतारमण? पीयूष गोयल? किसके पास कारण है? कौन ज़िम्मेदारी का अनुभव करता है? किसे अनुपात का बोध है? नौबढ़ डींगमार कौन है?

बस इतना ही कहना चाहता हूँ।

इसके अलावा वेबर दो प्रकार के नेताओं के बीच अंतर करते हैं, पहला ‘संत’ और दूसरा ‘व्यावहारिक’। उदाहरण के तौर पर के एक जर्मन नेता आइजनर थे, वे ऐसे नेता थे जो केवल अपने सिद्धांतों पर खरा रहने के लिए दृढ़ संकल्प द्वारा निर्देशित थे चाहे जो भी परिणाम हो। वेबर ने तर्क दिया कि ‘विश्वास की नैतिकता’ संतों द्वारा शांतिवादियों और शुद्धतावादी क्रांतिकारियों की पहचान थी जो दुनिया को दोष दे सकते थे, दूसरों या भगवान की मूर्खता उनके कर्मों के प्रभाव के लिए होती है जब तक कि उन्होंने सही काम नहीं किया था। उन्होंने कहा कि ‘ज़िम्मेदारी की नैतिकता’ के विपरीत जिसकी मांग थी कि राजनेता अपने कार्यों के परिणामों के मालिक हों और यदि आवश्यक हो तो उन परिणामों को प्राप्त करने के लिए नैतिक समझौता भी कर सकें।

बेन्थैम के दृष्टिकोण द्वारा उपयोगिता पर थोड़ा-बहुत चोट किए जाने के बावजूद यह कहना उचित है कि वे नेता जो वास्तविकता से समझौता करते हैं, उनके सफल होने की संभावना अधिक है। गांधी जैसे संत नेता को आवश्यकता से कम हासिल हुआ जो कि अंततः अप्रासंगिक हो सकता है । हालाँकि यह भी सच है कि नेल्सन मंडेला को वह सब कुछ हासिल हुआ जो गांधी जी नहीं कर पाए। वहीं शुद्धतावादी क्रांतिकारियों के कुछ दुखद उदाहरण भी हैं जैसे पोल पॉट, चे ग्वेरा और हमारे अपने नक्सली।

इसके अलावा, “वेबर ने तर्क दिया कि लोकतांत्रिक रास्ते पर चलने वाले आधुनिक राष्ट के पास दो विकल्प हैं, पहला नौकरशाहों और संसदीय गुटों द्वारा चालित देश जिसमें वे स्व-हित के लिए काम करते हैं और राजनीति पर जीते हैं या दूसरा ‘नेतृत्व लोकतंत्र’ जिसमें एक करिश्माई नेता राजनीति के लिए जीये, जो पार्टी तंत्र को आदेश दे सके ताकि मतदाताओं को जुटा सके। मतदाताओं के पास गैरज़िम्मेदार और ज़िम्मेदार के बीच एक विकल्प रहता है।”

फिर से आपके पास एक पारदर्शिता है जिससे आप विभेदन कर सकते हैं। पहला विकल्प कांग्रेस का पिछला शासन है जहाँ स्व-इच्छुक और भ्रष्ट बाबुओं, न्यायाधीशों और मीडिया के गुट ने लुटियन्स पर शासन किया। दूसरा विकल्प वह है जो मोदी ने हमें पिछले पाँच वर्षों में दिया है। कौनसा अच्छा है? आप खुद न्यायाधीश हैं खासकर अब जब अगस्ता वेस्टलैंड के भगोड़े दिखाई दे रहे हैं। अनायास ही। और माल्या भी इस रास्ते पर है।

चोमस्की के शब्दों में कहें तो सच्चाई यह है कि “सहमति के निर्माण” के लिए बड़े पैमाने पर प्रोपागैंडा चलाया जा रहा है जहाँ कांग्रेस या लुटियन पारिस्थितिकी तंत्र (ईको-सिस्टम) नेहरू वंशवाद के कथानक नेतृत्व को सबसे गंभीर दावेदारों के रूप में हर बार सामने रख देते हैं। जैसा कि हाल ही में हार्वर्ड बिज़नेस रिव्यू के ‘थेरानोस एन्ड द डार्क साइड ऑफ़ स्टोरीटेलिंग’ में सुझाया गया कि ऐसी कथाएँ भी काम करती हैं। वे एक ऐसी परिस्थिति बनाते हैं जहाँ झूठ को सच और सच को झूठ बड़े आराम से दिखाया जा सके जैसे कि यह कोई वास्तविक जीवन नहीं बल्कि एक फिल्म हो।

लेकिन वास्तव में यह एक फिल्म हो सकती है- द मंचूरियन कैंडिडेट। यह अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए एक उम्मीदवार के बारे में है जिसे एक विदेशी शक्ति द्वारा गंभीरता से उसका मत परिवर्तित कर दिया गया है (आप अनुमान लगाइये कि कौन है वह!)। वह एक पैदल चलने वाला, ऑटोमेटन की तरह बात करने वाला, जिसे अपने आकाओं के इशारे पर सूक्ष्म संकेतों का जवाब देने के लिए प्रोग्राम किया गया है। राष्ट्रपति के रूप में वह अमेरिका के लिए गंभीर खतरा होगा।

संभावना है कि इसी तरह कांग्रेस अध्यक्ष भी ‘मंचूरियन उम्मीदवार’ हो सकते हैं। वह शायद एक सभ्य आदमी हैं (‘बीइंग देयर’ में चांस माली भी एक सभ्य आदमी था) लेकिन वह संभवत अपने चारों ओर स्वेग्नलिस जैसे लोगों घिरे हुए हैं जो उनका चालाकी से मत परिवर्तन करते रहते हैं और चाबी वाले खिलौने की तरह वे व्यवहार कर रहे हैं और उन्हें खुश करने के लिए खेल दिखा रहे हैं ।

इन कई घटनाओं पर विचार करें। हाल ही में हुआ मनोहर पर्रिकर प्रकरण है जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष टर्मिनल कैंसर से लड़ रहे मौत की कगार पर खड़े व्यक्ति को प्रभावित करते हुए दिखाई दिए और फिर उनके बीच हुई बातचीत के बारे में झूठ बोला। इससे पहले भी संसद में कुख्यात गले लगना और आँख मारने वाला प्रकरण हो चुका है। इससे पहले भी अमेरिकी राजदूत की गोपनीय रिपोर्ट थी (जो कि शायद विकिलीक्स ट्रोव के हिस्से के रूप में लीक हुई थी, ऐसा मुझे लगता है) जिसमे सुझाव दिया कि वह चिंताजनक रूप से गहरी मनोवैज्ञानिक समस्याओं से ग्रस्त है। फिर हाल ही में वह वीडियो जहाँ वे पोडियम पर हैं और इससे पहले कि वह वास्तव में कुछ भी कह बोले उनके आसपास के कई लोगों द्वारा उन्हें संकेत दिया जाने लगा।

मुझे डर है कि कांग्रेस अध्यक्ष यह सब मजबूरन अपने आकाओं को खुश करने की कोशिश में कर रहे हैं और विद्रोह का कारण भी बन रहे हैं। मुझे @gopimaliwal का एक ट्वीट याद आ रहा है। उन्होंने उल्लेख किया कि कम्युनिस्ट-शिकारी अमेरिकी सीनेटर जोसेफ मैक्कार्थी ने प्रतिद्वंद्वी से कैसे पूछा था उनके निक्कमेपन पर भड़कते हुए कहा- “इतने लंबे समय से क्या आपके पास शालीनता की कोई भावना नहीं है, सर?”

इसी तरह प्रियंका वाड्रा पर विचार करें। लुटियन्स का पारिस्थितिकी तंत्र में सकारात्मक रूप से अशोभनीय लहर दौड़ पड़ी जब उन्हें कांग्रेस का उत्तर प्रदेश महासचिव घोषित किया गया। यह इसके बावजूद की उन्होंने पिछेल 47 सालों में एक बार भी उपयोगी काम करने के लिए अपनी एक उंगली भी नहीं उठाई है।

मैं मैक्स वेबर की परिभाषाओं के अनुसार से यह देखने में विफल रहा हूँ कि इस भाई-बहन की जोड़ी में किस तरह का नेतृत्व मॉडल है। ईमानदारी से वे नेता नहीं हैं बस उनकी एकमात्र संपत्ति उनका नेहरू वंश का जीन है। जिसके बिना वे कोई भी चुनाव न जीत पाएँ। उन्होंने अपने लगभग 50 वर्षों के समय में किसी भी नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन नहीं किया है और यह विश्वास करना कठिन है कि वे भविष्य में भी अचानक ऐसे हो जाएँगे।

चूँकि चुनाव सब कुछ है और कांग्रेस को 2019 जीतना है। और जैसा कि मैंने कर्नाटक के मामले में चेतावनी दी थी, वे 2019 जीतने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। कुछ भी से मेरा मतलब कुछ भी।

कांग्रेस के लिए असल दिक्कत की बात है कि यह है कि वे भाई-बहन की इस जोड़ी पर निर्भर हैं और मूल निवासी एक ही कहानी को बार-बार सुनाए जाने से तंग आ चुके हैं। लोग बेचैन हो रहे हैं और भाला और मशालें तैयार हो रही हैं। नसीम तालेब के अनुसार एक ऐसा पैटर्न है जहाँ अभिजात वर्ग की चिकनी चुपड़ी बातों का औसत वर्ग सक्रिय रूप से विरोध कर रहा है जैसे कि मोदी 2014 में, ब्रेक्सिट 2015 में और ट्रम्प 2016 में। यह पैटर्न जारी रह सकता है।

अंत में यह वास्तव में वंशवादी अधिकार की भावना को धक्का लगना है। मैं बुरा नहीं मानूँगा यदि कोई ऐसा वास्तविक नेता हो जो थोड़ा भ्रष्ट हो जैसे कि पी वी नरसिम्हा राव जो किसी भी मायनों में एक अच्छे नेता थे लेकिन बिल्कुल पाक साफ भी नहीं थे। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष और प्रियंका वाड्रा जैसे व्यक्ति जिनके पास बोलने के लिए कोई भी उपलब्धि नहीं है और जिन्हें उनके संचालकों द्वारा मोर्चे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। वे न तो देश नेतृत्व करने के हकदार हैं और न ही उनको लोगों को मीठी बातों में फ़साने का हक़ है।

भारत के पास नेतृत्व के अलावा सब कुछ है जैसे कि एक उपजाऊ भूमि, एक चतुर आबादी और महान शक्ति बनने का एक स्वर्णिम अवसर। जैसा कि अमेरिका और चीन आपस में भिड़े हुए हैं संभवत दोनो इसी संघर्ष में समाप्त हो जाएंगे और यहाँ तक ​​कि दोनों के बीच दुनिया के कई हिस्सों में परोक्ष युद्ध चल रहा है। भारत को एक ऐसे चतुर नेता की आवश्यकता है जो इन तूफान भरी लहरों से देश की नैया पार लागा सके न कि कोई ऐसा जिसके पास उपनाम की संपत्ति के अलावा कुछ भी न हो।