राजनीति
हरियाणा चुनाव के लिए टिकट वितरण में पार्टियों ने दी किन समीकरणों को प्राथमिकता

हरियाणा विधानसभा चुनाव प्रचार का शोरगुल शुरू हो चुका है। टिकट वितरण के साथ शुरू हुआ विवाद अब धीरे-धीरे थमता जा रहा है। सभी दलों ने टिकट वितरण में राजनीति, आर्थिक और सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखा है। उम्मीदवारों के चयन में सभी पार्टियों का मुख्य आधार जातीय गणित ही है।

भाजपा ने सत्ता विरोधी लहर से बचने के लिए अपने दो मंत्रियों सहित 12 विधायकों का टिकट काट दिया है। जाट बहुल हरियाणा में पार्टी ने 20 जाट उम्मीदवारों को टिकट दिए हैं।

वहीं कांग्रेस ने 27 सीटों पर जाट प्रत्याशी खड़ा किए हैं। जननायक जनता पार्टी (जजपा) और इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) ने भी सबसे ज्यादा जाट उम्मीदवार ही मैदान में उतारे हैं।

गैर-जाट मुख्यमंत्री के साथ चुनावी समर में उतरी भाजपा को उम्मीद है कि 2014 का इतिहास फिर से दोहराएगा, इसलिए पार्टी ने अन्य दलों की तुलना में सबसे कम जाट उम्मीदवार उतारे हैं। वहीं जजपा ने 34 जाटों को मैदान में उतारा है।

2014 में भाजपा ने जाट बहुल क्षेत्र में भी गैर-जाट प्रत्याशी को चुनाव लड़ाकर अच्छा प्रदर्शन किया था। पार्टी ने जीटी बेल्ट क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले 19 जाट बहुल विधानसभा सीटों में से 18 सीटों पर जीत हासिल की थी, इतना ही नहीं 2019 के लोकसभा चुनाव में भी इन क्षेत्रों के चार लोकसभा सीट पर पार्टी ने जीत दर्ज करते हुए जाट राजनीति पर तगड़ा प्रहार किया था।

जींद विधानसभा उप-चुनाव में भी भाजपा ने सभी जातीय समीकरणों को ध्वस्त कर दिया था। कांग्रेस ने इस उप-चुनाव में पार्टी के राष्ट्रीय चेहरे रणदीप सिंह सुरजेवाला को मैदान में उतारा था, सुरजेवाला ब्राह्मण जाति से आते हैं। वहीं जजपा की तरफ से दुष्यंत चौटाला मैदान में थे, लेकिन भाजपा ने जाट-ब्राह्मण के समीकरण को ध्वस्त कर दिया। पार्टी की इस जीत के पीछे का कारण गैर-जाट जनता के बीच लोकप्रियता मानी गई।

2019 के लोकसभा चुनाव में भी पार्टी ने हरियाणा की 10 में से सिर्फ दो सीटों पर जाट उम्मीदवार खड़े किए थे, इसके बावजूद पार्टी के अपेक्षित सफलता मिली थी। भाजपा को उम्मीद है कि इस बार भी पुराने रिकॉर्ड ही दोहराए जाएँगे।

जाट के बाद भाजपा ने सबसे ज्यादा नौ टिकट पंजाबियों को दिए हैं, जबकि कांग्रेस ने दो पंजाबियों पर दाँव लगाया है। वहीं, कांग्रेस छह मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में उतारकर अपनी सेक्युलर राजनीति को जीवित रखने की कोशिश किया है। भाजपा ने भी इस बार तीन मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट दिया है।

जातिगत समीकरण में उलझे सभी दलों ने महिलाओं को टिकट देने में उदासीनता दिखाई है। कांग्रेस अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी संसद में कई बार महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कह चुकी हैं, लेकिन कांग्रेस ने हरियाणा में 10 प्रतिशत महिलाओं को ही उम्मीदवार बनाया है।

भाजपा भी महिलाओं को टिकट देने में फिसड्डी साबित हुई है। पार्टी ने 90 सीटों वाली हरियाणा विधानसभा में 12 महिलाओं को टिकट दिया है। वहीं इनेलो ने सबसे अधिक 15 महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है।

हरियाणा की राजनीति में खेल और खिलाड़ी एक महत्वपूर्ण घटक माने जाते हैं। भाजपा ने खिलाड़ियों को टिकट देने में बाज़ी मार ली है। पार्टी ने इस बार तीन चर्चित खिलाड़ियों को पार्टी शामिल कराकर चुनावी समर में उतारा है।

पार्टी ने पहलवान योगेश्वर दत्त को बरोदा से, कुश्ती में अंतर्राष्ट्रीय पदक जीत चुकी बबीता फोगाट को दादरी से जबकि अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी संदीप सिंह को पिहोवा से प्रत्याशी बनाया है।

विधानसभा के इस चुनावी समर में उतरी सभी पार्टियों के पास अपना गणित है, लेकिन हरियाणा की सत्ता पर कौन सा गणित सटीक बैठेगा यह तो 24 अक्टूबर को परिणामों के साथ ही पता चलेगा।