राजनीति
सौरव गांगुली भाजपा में क्यों हो सकते हैं शामिल
सौरव गांगुली भाजपा में क्यों हो सकते हैं शामिल

प्रसंग
  • क्या ‘दादा’ बनाम ‘दीदी’ होगा ‘बंगाल 2021’ का चुनाव?

16 अगस्त की शाम को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निधन के कुछ घंटे बाद भारतीय क्रिकेट के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली के ट्वीट ने उनके भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने की बातों के दौर को हवा दे दी। गांगुली ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा, “भारत ने अपने चमकदार रत्न को खो दिया है” (वाजपेयी ‘भारत रत्न’ से सम्मानित थे)| इसे क्रिकेट लीजेण्ड द्वारा पार्टी में शामिल होने के भाजपा के निमंत्रण को अंततः स्वीकार करने को एक मजबूत संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि भाजपा के कई शीर्ष नेताओं ने गांगुली से पार्टी में शामिल होने का अनुरोध किया था। यहाँ तक कि यह भी कहा जाता है कि नरेंद्र मोदी ने भी ‘दादा’ (गांगुली को प्यार से ‘दादा’ बुलाया जाता है) को 2014 के चुनाव से पहले पार्टी में शामिल होने प्रस्ताव दिया था। कहा जाता है कि गांगुली ने प्रस्ताव को यह कहते हुए  विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया था कि वह राजनीति में शामिल होने के लिए अभी तैयार नहीं हैं। उन्होंने राजनीति में शामिल होने की संभावना को सार्वजनिक या निजी तौर पर ख़ारिज नहीं किया है, इसी तथ्य ने अटकलों को जिंदा रखा है। उन्होंने भाजपा में शामिल होने की अफवाहों को कभी भी तवज्जो नहीं दी।

लेकिन गांगुली को निमंत्रण देने वाली सिर्फ भाजपा ही अकेली ऐसी पार्टी नहीं है। माना जाता है कि 2006 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) या सीपीआई (एम) पार्टी की डूबती नैय्या को पार लगाने के लिए इस तरह की पेशकश करने वाली वह पहली पार्टी थी। उस समय गांगुली अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट खेल रहे थे और निसंदेह रूप से वो समय उनके लिए यह निर्णय लेने के लिए बहुत जल्दी था। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की प्रमुख ममता बनर्जी , ने भी गांगुली से पार्टी में शामिल होने के लिए कई बार अनुरोध किया था। ममता बनर्जी  ‘स्टार पावर’ के महत्व को बहुत अच्छी तरह से जानती हैं । उन्होंने फिल्मी सितारों, सफल खिलाड़ियों और कला एवं संस्कृति से जुड़े अग्रणी व्यक्तियों को विधानसभा और लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी के उम्मीदवारों के रूप में सफलतापूर्वक मैदान में उतारा है। उनमें से कुछ उनकी मंत्रिपरिषद के सदस्य भी हैं।

लेकिन गांगुली के करीबी लोगों ने बताया कि, उन्होंने तृणमूल में शामिल होने के ऐसे सभी निमंत्रणों और प्रस्तावों को विनम्रतापूर्वक वापस कर दिया था। उनके एक करीबी सहयोगी ने नाम न लेने की शर्त पर बताया कि इसका प्रमुख कारण यह था कि वह बनर्जी के अधीन कार्य नहीं करना चाहते थे। उनके सहयोगी ने कहा, “वह (सौरव) तृणमूल में दूसरे या तीसरे स्तर के राजनेता होने के बजाये अकेले ही काफी हैं। उनकी कप्तानी (भारतीय टीम का) इस बात को साबित करती है कि वह आगे रहके बढ़ना पसंद करते हैं। तृणमूल में यह संभव नहीं था।”

सौरव के एक घनिष्ट मित्र ने कहा, “सौरव आक्रामक हैं और बकवास किस्म के व्यक्ति बिलकुल नहीं हैं। वह नेतृत्वकर्ता हैं और चापलूस नहीं हो सकते। इस प्रकार वह तृणमूल के  चापलूसी वाले माहौल में केवल नाम के लिए नहीं जाना कहते थे। गांगुली को पिछले 25 वर्षों से जानने वाले इस दोस्त ने यह भी बताया कि “सौरव को पर्याप्त राजनीतिक समझ है और वे जानते हैं कि तृणमूल में, उन्हें केवल वोट-बटोरने के रूप में उपयोग किया जाएगा और उन्हें नेतृत्व की कोई भूमिका नहीं दी जाएगी। वह निश्चित रूप से पार्टी का नेतृत्व करने की इच्छा नहीं कर सकते लेकिन सबसे बुरी बात तो यह है कि ममता के भतीजे (और चुने हुए उत्तराधिकारी) अभिषेक बनर्जी की वजह से उन्हें कतार में लगे रहना पड़ता जैसा कि दूसरे वरिष्ठ तृणमूल के नेताओ को करना पड रहा है।”

लेकिन यही मित्र यह भी कहता है, कि जहां तक बीजेपी का सवाल है, यह एक पूरी तरह से अलग प्रस्ताव है। बंगाल में गांगुली पार्टी के नेता और चेहरा हो सकते हैं। उन्हें बीजेपी के वरिष्ठ नेताओ द्वाराआश्वस्त किया गया है कि उन्हें मौजूदा राज्य पार्टी के नेताओं के अधीन काम करना नहीं पड़ेगा। उन्हें बताया गया है कि वह अगले लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी में शामिल हो सकते हैं और उन्हें बंगाल के उम्मीदवार के रूप में शामिल किया जाएगा। एक बार अगर वह जीतते हैं (जो निश्चित है), तो वह एक सांसद के रूप में बहुत महत्त्व मिलेगा। उन्हें केंद्र में जिम्मेदारियां भी दी जाएंगी और चरणबद्ध तथा सावधानी पूर्वक तरीके से, बंगाल में भी जिम्मेदारियां दी जाएंगी। आखिरकार, बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनावों से पहले, उन्हें राज्य में एक महत्वपूर्ण भूमिका दी जाएगी और यहां तक कि बीजेपी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में प्रलम्बित किया जाएगा।

हो सकता है कि गांगुली को 2021 के चुनाव अभियान में प्रमुख भूमिका दी जाए और उनके पास अपनी टीम हो। यह गांगुली के लिए अच्छा मौका होगा क्योंकि उन्होंने भारतीय क्रिकेट को बदलने के लिए आक्रामक युवा प्रतिभाओं की पीढ़ी को बढ़ावा दिया और प्रेरित किया।

लेकिन, गांगुली के करीबी सहयोगियों का कहना है कि वह भाजपा में शामिल होने के निर्णय को नही ले रहे क्योंकि वह बंगाल में पार्टी की संभावनाओं के बारे में भी निश्चित नहीं थे। गांगुली के साथ व्यापारिक संबंध रखने वाले एक दोस्त ने कहा, “एक स्टार होने के कारण, वह स्पष्ट रूप से छोटी चुनावी संभावनाओं के साथ पार्टी में शामिल होकर अपनी प्रतिष्ठा खोना नहीं चाहते थे।” उन्होंने आगे कहा कि अब स्थिति बदल गई है। बंगाल में बीजेपी की वोट सहभागिता बढ़ गई है और हाल ही में आयोजित पंचायत चुनावों में पार्टी ने इतना सब होने के बावजूद 6,000 सीटें जीतीं (बंगाल में बीजेपी ने 2013 के पंचायती चुनावों  में एक भी सीट नहीं जीती थी ) अब बीजेपी ने बंगाल में स्वयं को मुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में स्थापित किया है ।

कई लोग कहते हैं कि वे दिन दूर नहीं हैं जब गांगुली भाजपा में शामिल होंगे, लेकिन जब भी यह होगा तो वह पार्टी के लिए बहुत फायदेमंद साबित होंगे। वह बंगाल में एक बहुत सम्मानित और बेहद लोकप्रिय व्यक्तित्व हैं और उनकी अपील सभी आयु वर्गों, सभी वर्ग और समुदायों पर प्रभाव डालेगी। वह ममता बनर्जी को कड़ी टक्कर देंगे।

गांगुली सिर्फ जन अपील को प्रभावित करने के लिए काफी नही हैं उनका नेतृत्व कौशल अच्छी तरह से विख्यात हैं और उन्होंने स्वयं को बंगाल क्रिकेट संघ (सीएबी) के प्रमुख के रूप में सक्षम प्रशासक साबित कर दिया है। बनर्जी, जिन्हें अस्थिर और बडबोलेपन के लिए जाना जाता है, की तुलना में बंगाली भद्रलोक को गांगुली ज्यादा स्वीकार्य हैं। गांगुली की सामाजिक पृष्ठभूमि, वह एक धनी तथा नामचीन परिवार से संबंधित हैं, जिसके कारण वे बनर्जी पर भारी पड़ रहे हैं।

बंगाल के मतदाताओं को यह चुनाव उत्साहित करेगा, क्योंकि लोग राज्य की तुच्छ, झगड़ालू और हिंसा से भरी राजनीति से तंग आ चुके हैं। उन्हें उम्मीद है कि गांगुली राज्य की राजनीति में स्वाभाविक रूप से गम्भीरता स्थापित कर सकते हैं। गांगुली को व्यापक रूप से एक बेहतरीन इंसान माना जाता है, जो बनर्जी के व्यक्तित्व के ठीक विपरीत है।

बंगाल में भाजपा के पास उदार व्यक्तित्व वाला कोई नेता नहीं है। जो हैं उनको जनता पसंद नहीं करती है और कई नेताओं की तो छवि भी दागदार है। पार्टी की राज्य कार्यकारिणी में गुटवाद फैला हुआ है और पार्टी में राज्य के वर्तमान नेताओं में कोई भी राज्य का मुख्यमंत्री बनने के योग्य नहीं माना जा रहा है। गांगुली के संभावित रूप से भाजपा में प्रवेश से पार्टी को एक बहुत ही आवश्यक मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार मिलेगा।

हालांकि, पार्टी में शायद उनका प्रवेश आसान नहीं होगा।उनके पार्टी में आने से पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के उत्साहित होने के बावजूद भी, हो सकता है की पार्टी की राज्य इकाई के नेता उनको खुली बाँहों से स्वीकार नहीं करें। गांगुली बंगाल में पार्टी को फिर से बदलने के लिए उसमें स्वतंत्रापूर्ण तरीके से बदलाव करना चाहेंगे और अपनी निजी टीम बनाना चाहेंगे, जैसा कि उन्होंने सीएबी अध्यक्ष बनने के बाद किया था। उनका आगमन निश्चित रूप से पार्टी में कई नेताओं को परेशान करेगा और उनके निहित हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा। इस प्रकार, उनको पार्टी के भीतर से विरोध का सामना करना पड़ सकता है।

लेकिन, निस्संदेह, सौरव गांगुली बंगाल में भाजपा के लिए एक बड़ी पारी खेलेंगे।उनकी उपस्थिति लोगों में उत्साह उत्पन्न करेगी और पार्टी की चुनावी संभावनाओं को बढ़ावा देगी। गांगुली, अभी तो इस सब पर चुप्पी साधे हुए हैं, और शांति से इसके नफे और नुकसान का मूल्यांकन कर रहे हैं।

इस साल की शुरुआत में, गांगुली ने ‘ए-सेंचुरी इज़ नॉट एनफ’ नामक अपनी आत्मकथा का विमोचन किया। इस किताब के शीर्षक का चयन करते हुए निश्चित ही उनके दिमाग में क्रिकेट से जायदा बहुत कुछ चल रहा होगा ।

जयदीप मजूमदार स्वराज के एक सहयोगी संपादक हैं।