राजनीति
कौटिल्य के परिप्रेक्ष्य से- #SayNoToWar को गंभीरता से न लें

आशुचित्र- कौटिल्य के युद्ध एवं शांति परिप्रेक्ष्य से देखा जाए तो भारत आक्रामक रक्षा कर रहा है जिसे विग्रह कहा जाता है और इसके पास संधि या शांति करने का कोई कारण नहीं है।

पिछले कुछ दिनों के तनाव का सार- भारत ने पाकिस्तान के भीतर आतंकी शिविरों पर हवाई हमल किया। पाकिस्तान ने अपने जेट बेजकर कथित रूप से सैन्य स्थापनाओं पर हमले करने का प्रयास किया। उनका प्रतिकार किया गया व विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान ने मिग21 उड़ाते हुए एफ16 को मार गिराया गया। उनका विमान क्रैश हो गया और पाकिस्तानी अधिकृत कश्मीर (पीओके) में गिरा जहाँ स्थानीय लोगों ने उन्हें पीटा और फिर उन्हें पाकिस्तानी हिरासत में ले लिया गया।

यह वह पृष्ठभूमि है जिसके कारण उदार शांतिवादी विचार उफान पर है। भारत में #SayNoToWar का तेज़ शोर है और पाकिस्तान के ‘राजनेता’ इमरान खान से वार्ता पर ज़ोर दिया जा रहा है। कोलाहल यह है कि सबकुछ छोड़कर हम फिर से पीछे चले जाएँ जहाँ पाकिस्तान हम पर लगातार वार करता रहे।

प्रस्तुत हैं कुछ परिचित तर्क-

  • कुर्सी पर बैठे-बैठे लोग युद्ध के नगाड़े बजा रहे हैं लेकिन उनमें खुद हथियार उठाने का साहस नहीं है।
  • युद्ध से हिंसा और दोनों पक्षों को अनावश्यक आघात पहुँचता है। बात और बढ़ेगी और परमाणु सर्वनाश भी हो सकता है।

चलिए कौटिल्य के परिप्रेक्ष्य से युद्ध और शांति की संभावनाओं को देखते हैं क्योंकि नियंत्रणहीन हो रहे लिबरल नैरेटिव (उदारवादी कथात्मक) को थोड़ी बुद्धिमता दिखानी आवश्यक है।

अपने अर्धशास्त्र  में राज्य और समाज, अर्थशास्त्र और रजनीति का संपूर्ण सिद्धांत प्रस्तुत करने वाले कुछ पहले लोगों में से हैं कौटिल्य जिन्होंने राज्य के लिए सप्तांग  का सिद्धांत दिया। इसके अंतर्गत स्वामी (राजा), अमात्य (मंत्री), जनपद (भूमि और लोग), दुर्ग (किला), कोश (खजाना), दंड (सेना) और मित्र (सहयोगी) आते हैं। वर्तमान के परिदृश्य में यह लोकतांत्रिक सरकार, प्रशासन, भूमि और लोग, रक्षा तंत्र, राजकोष, सेना और सहयोगी देश हुए।

एक देश का निरंतर और सफल अस्तित्व बनाए रखने के लिए राज्य की संकल्पना में इन सभी भागों की अपनी-अपनी भूमिका है। इसका उद्देश्य राज्य के लिए राजनीति शक्ति हासिल करना, उसे बनाए रखते हुए उसमें वृद्धि करना है। राजा जो कि हमारे लिए निर्वाचित सरकार है का नैतिक दायित्व भूमि और लोगों की रक्षा करना और उनका कल्याण व समृद्धि सुनिश्चित करना है।

ये सुरक्षा आंतरिक और बाहरी दोनों खतरों से है। सेना का विशेष कार्य बाहरी खतरों से रक्षा का है फिर वह आक्रमण द्वारा हो या बचाव द्वारा।

भारतीय राज्य को शत्रुओं के मूल्य पर अपनी शक्ति में वृद्धि करना है। अन्य राज्यों से व्यवहार करने के छह तरीके हैं- संधि (शांति), विग्रह (शत्रुता), आसन (चुप्पी), यान (सैन्य चढ़ाई), संश्रय (आश्रय लेना) और द्वैधिभाव (संधि और विग्रह का समावेश)।

जानकारियों में न जाते हुए समझें कि संधि तब होती है जब राज्य शत्रु से कमज़ोर हो, विग्रह तब जब मज़बूत हो और यान तब जब बहुत मज़बूत हो। द्वैधिभाव तब सुझाया जाता है जब किसी और स्रोत के माध्यम से शत्रु से लड़ा जा सके, तब एक राज्य के साथ संधि और दूसरे के साथ विग्रह होता है।

भारत विग्रह और यान का प्रयोग करने के लिए सक्षम है और द्वैधिभाव अपनाने के लिए राजनयिक रूप से चतुर भी है। लेकिन पिछले कुछ समय से भारत क्या कर रहा है, संधि और आसन के बीच डोल रहा है और मुश्किल से कभी विग्रह किया। यह प्रदोलन ही हानिकारक है।

भारत के पास संधि अपनाने का कोई कारण नहीं है। दुष्ट आतंकी राष्ट्र पाकिस्तान का दीर्घावधि के लिए शांति से रहने का कोई इरादा नहीं है। इसका उद्देश्य भारत का विनाश करना है फिर वह चाहे जिस भी माध्यम से हो। अपने इस्लामी प्रतिनिधियों के माध्यम से यह कम लागत के अघोषित युद्ध को जारी रखे हुए है और कश्मीरी कट्टरवाद दशकों से इसका सहायक बना हुआ है। जब भारत की बात आती है तो इसकी एक ही नीति है- हज़ारों ज़ख्म देकर हत्या करना।

डोभाल के मत से अब भारत आक्रामक रक्षा पर उतर आया है जिसे विग्रह कहा जा सकता है। बहस इसपर है कि यान यानि कि युद्ध पर जाया जाए या नहीं।

इस क्षण पर उदारवादी षड्यंत्र के तहत जनमानस में संधि का विचार स्थापित करना चाहते हैं और जान का नुकसान, कुर्सी पर बैठे योद्धा हथियार नहीं उठाएँगे, सैन्य परिवारों के लिए संवेदना, भारत का शांतिप्रिय देश होना, आदि तर्क दे रहे हैं।

यह ध्यान देने योग्य है कि सेना पर जनपद यानि कि भूमि और लोगों की रक्षा करने का भार है। राज्य का काम है कि यह सेना की शक्ति और प्रशासन की सलाह का जनता की समृद्धि और कल्याण के लिए प्रयोग करे। इसलिए कुर्सी पर बैठे योद्धा वाली बात तर्कहीन है। लोग शस्त्र उठाकर खुद की और देश की रक्षा नहीं करेंगे। यह सेना का कार्य है।

एक कमज़ोर शत्रु, जो छिपकर युद्ध छेड़े हुए है और किसी भी परिस्थिति में हिंसा फैलाने से बाज़ नहीं आएगा, से संधि करने का कोई प्रश्न नहीं है। यह राज्य का नैतिक दायित्व है कि ये विग्रह या यान के माध्यम से लोगों की रक्षा करे। जान की हानि तब भी होगी जब भारत संधि वार्ता करेगा, जैसा कि दशकों से देखा गया है।

अब पाँचवे स्तंभ के दूसरे सिद्धांत की ओर चलते हैं। इसका उद्गम 1930 के दशक में स्पैनिश युद्ध में हुआ परंतु द्वितीय विश्व युद्ध से यह लोकप्रिय हो गया। पाँचवा स्तंभ वह है जो एक बड़े समूह जैसे कि देश को अपरोक्ष या गुप्त तरीके से नीचा दिखाता है। अर्थशास्त्र में भेद का भी उल्लेख है जिसका अर्थ है शत्रु के खेमे में संदेह, कलह और मिथ्या समाचार फैलाना जिससे युद्ध का उत्साह नष्ट हो जाए और शत्रु भ्रांत रह जाए।

भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग के कुछ लोग हमारे विरुद्ध पाकिस्तानी कौटिल्य हैं, इसी प्रकार के पाँचवे स्तंभ का उद्भव आईसी184 के हाईजैक के समय भी देखा गया था। और हम अभी तक इसे भुगत रहे हैं। इन लोगों और उनके अनुयायी के प्रति कड़ी सतर्कता बरतने की आवश्यकता है। यह विडंबना है कि हम कौटिल्य के सिद्धांतों का प्रयोग नहीं कर पा रहे हैं और हमारा शत्रु हमारे विरुद्ध इसका उपयोग कर रहा है।

क्योंकि यथास्थिति पाकिस्तान के साथ है, यह पाँचवा स्तंभ या तो स्वार्थसिद्धि के लिए, या भोलापन अथवा भावुकतावश या वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था के प्रति नफरत के कारण भारतीयों को भ्रमित और विभाजित कर रहे हैं। विंग कमांडर अभिनंदन जो जेनेवा कन्वेन्शन के अनुसार युद्ध के बंदी थे, का मानवीय संवेदना के आधार पर पाकिस्तान द्वारा छोड़े जाने की बात भारतीय राज्य द्वारा अपनाए जा रहे विग्रह पर भावनात्मक प्रहार है। रक्तपात रोकने का आह्वान शत्रु के हित में है और भारत के उद्देश्यों की पूर्ति नहीं करता है। किसी भी केस रिपोर्ट को पढ़ेंगे तो पाएँगे कि भारत की सख्त मुद्रा के कारण अभिनंदन को छोड़ा गया है।

यह गांधी नहीं बल्कि कौटिल्य की बात करने का समय है। यह सरकार और सेना पर विश्वास करने का समय है।

भारतीय राजस्व सेवा को दो दशक देने के बाद लेखिका अपनी रुचि को पूरा कर रही हैं। वर्तमान में वे प्रचीन भारत की आधुनिक नारी पर पुस्तक लिख रही हैं।