राजनीति
क्यों पाकिस्तान हमें बार-बार परेशान करता है: अब समय है जवाब देने का
भारत और पाकिस्तान

प्रसंग
  • हम पाकिस्तान के साथ बड़ी पहल या वार्ता के साथ शांति पाने वाले नहीं हैं। जब तक वे चिल्लाते नहीं कि बंद करो, तब तक हमें बात करना जारी रखना चाहिए; हमें गुप्त लड़ाई तब तक जारी रखनी चाहिए जब तक कि वे इससे थक नहीं जाते; जब हम उनसे बात नहीं कर रहे हैं तो हमें उनको देखते हुए भी अनदेखा करना चाहिए।
  • उन्हें इस एहसास से ज्यादा कुछ भी परेशान नहीं करता है कि भारत पाकिस्तान को लेकर कोई परवाह नहीं करता है।

पाकिस्तान के लिए भारत का उतार-चढ़ाव वाला दृष्टिकोण काम नहीं कर रहा है। हर बार जब भी हम उनके साथ बातचीत करने के बारे में सोचते हैं, तो कोई न कोई ऐसी घटना हो जाती है जो हमें बातचीत रद्द करने के लिए मजबूर कर देती है।

हमने हाल ही में यह देखा है जब इमरान खान द्वारा वार्ता के बुलावे के जवाब में भारत इसके लिए सहमत हो गया था जहाँ दो विदेश मंत्री, हमारे पक्ष से सुषमा स्वराज और उनके पक्ष से शाह महमूद कुरेशी पिछले महीने संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान मिलने वाले थे। लेकिन पाकिस्तान आधारित इकाइयों द्वारा सुरक्षा कर्मियों की निर्मम हत्या और मारे गए आतंकवादी बुरहान वानी के नाम पर डाक टिकट जारी करने सहित “दो बहुत परेशान कर देने वाली घटनाओं” के बाद हमने वार्ता रद्द कर दी थी।

इसने इमरान खान को हमारे प्रधानमंत्री के बारे में अनर्गल टिप्पणी करने के लिए बढ़ावा दिया। उन्होंने ट्वीट किया: “शांति वार्ता के पुनरुत्थान के लिए मेरे बुलावे के जवाब में भारत द्वारा अहंकारी और नकारात्मक प्रतिक्रिया से निराश हूँ। हालांकि, सारी ज़िंदगी मेरी मुलाकात उच्च पदों पर आसीन छोटे लोगों से हुई है जिनके पास बड़ी तस्वीर देखने का दृष्टिकोण नहीं है।”

संयुक्त राष्ट्र महासभा में पाकिस्तान ने एक बार फिर से कीचड़ उछाला, जब उसने पेशावर आतंकवादी हमलों के पीछे भारत का हाथ होने का आरोप लगाया, जिसमें मारे गए 149 में से 132 बच्चे सैनिकों के थे। यह अच्छी तरह से ज्ञात है कि हमलावर पाकिस्तान के आतंकवादी गुट तहरीक-ए-तालिबान से जुड़े थे, लेकिन इसने विदेश मंत्री को यह संकेत देने से नहीं रोका कि इसके पीछे भारत था।

हमने इस आरोप पर नाराजगी भरी प्रतिक्रिया दी और पाकिस्तान यही चाहता है। यदि आप एक सुअर के साथ मौखिक रूप से कुश्ती करना चुनते हैं, तो न केवल आप गंदे हो जाएंगे, बल्कि सुअर को यह पसंद भी होगा। हमें क्रोधित करना पाकिस्तान को खुश करता है।

निरंतर वार्ता के इतिहास, उनके द्वारा वार्ता को रोका जाना और फिर से शुरू करना, यह सब देखते हुए यह स्पष्ट होना चाहिए कि पाकिस्तान एक योजना के अंतर्गत कार्य कर रहा है, जबकि हम प्रतिक्रियाशील हैं और अक्सर रणनीति के बजाय भावना से प्रेरित हो जाते हैं।

बुनियादी सच, जो हम सभी जानते हैं, लेकिन अभी भी स्वीकार करने में असफल हैं, निम्नलिखित हैं:

पाकिस्तान, विशेष रूप से इसकी सेना, भारत के साथ पूर्ण युद्ध या वास्तविक शांति नहीं चाहती है। सेना तनाव बनाए रखना चाहती है और उम्मीद करती है कि कभी न कभी हम कश्मीर का हिस्सा छोड़कर उसे सौंप देंगे। लेकिन इससे कुछ भी खत्म नहीं होगा; यह युद्ध को सिर्फ किसी अन्य मोर्चे पर ले जाएगा।

पाकिस्तानी इन तीन कारणों से शांति वार्ता करते हैं- एक, जब पाकिस्तानी सेना स्वयं संघर्ष से विराम लेना चाहती हो ; दो, जब वे अमेरिका से कुछ चाहते हों, और शांति वार्ता उन्हें पाकिस्तान समर्थकों से भरे हुए अमरीकी सरकार के संघीय विभाग से कुछ प्रशंसा प्राप्त करने में मदद करती है; और तीन, यह जाँचने के लिए कि क्या भारत उसकी उम्मीद से अधिक स्वीकार करने के मूड में है या नहीं। हमने यह वर्ष 1962 में ताशकंद में, वर्ष 1972 में शिमला में, वर्ष 1999 में लाहौर में किया था और हमने सियाचिन पर भी लगभग रियायत दे ही दी थी जब राजीव गांधी सत्ता में थे। हमने बिना किसी प्रतिफल के पाकिस्तान को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा दिया। प्रायः वार्ता का कोई परिणाम नहीं निकलता क्योंकि पाकिस्तानी सेना नहीं चाहती कि हम पाकिस्तानी राजनेताओं के साथ बहुत मित्रवत् हो जाएं। इसलिए वे कुछ ऐसी उद्दंडता करेंगे जो हमें वार्ता रद्द करने के लिए मजबूर करती है।

आगे हमें स्पष्ट रूप से जानना चाहिए कि पाकिस्तान केवल भारत के टुकड़े करना चाहता है। लेकिन जंग के मद्देनज़र पाकिस्तान के लिए भारत काफी शक्तिशाली है, इसलिए निम्न स्तर की तथा स्थायी दुश्मनी ही अगला सबसे अच्छा विकल्प है। पाकिस्तान की यह मनःस्थिति दो मनोवैज्ञानिक वास्तविकताओं से उत्पन्न होती हैः एक तो यह है कि पाकिस्तान के पास इसके वजूद के लिए “हिन्दू” भारत से दुश्मनी के अलावा कोई दूसरी असल वजह नहीं है, उसको इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि भारत में पाकिस्तान से ज्यादा मुस्लिम हैं। दूसरा है बांग्लादेश को अलग करने का बदला, तथ्य यह है कि पाकिस्तान भारत के साथ कोई भी लड़ाई नहीं जीत पाया है। पाकिस्तानी सेना, जो देश को चलाती है, को यह बात चुभती रहती है।

पाकिस्तान इस उम्मीद के साथ आतंकवाद और नियंत्रण रेखा पर संघर्ष विराम का उल्लंघन जारी रखता है कि इससे भारत अपना धैर्य खो देगा और कुछ बेवकूफी भरा काम कर बैठेगा, जिसमें एक युद्ध की शुरूआत करना शामिल है जिसका कोई नतीजा नहीं निकल सकता है। इससे भी बदतर बात यह कि इससे हम आक्रामकों की तरह दिखने लगेंगे।

साधारण बातचीत के जरिए उसकी इस रणनीति का हल नहीं निकाला जा सकता है और पाकिस्तान की तरफ से इस बातचीत का उद्देश्य किसी भी समाधान से संबंधित नहीं है। अगर आप कश्मीर पाकिस्तान को सौंप दें फिर भी यह लड़ाई खत्म नहीं होगी। फिर यह लड़ाई कहीं और शुरू हो जाएगी। बांग्लादेश के निर्माण के बाद भी पाकिस्तान की तरफ से फायरिंग नहीं रुकी है और यह पंजाब में खालिस्तानी आन्दोलन को बढ़ावा दे रहा है।

हमारे पास निम्नलिखित विकल्प हैं –

पहला, पाकिस्तान के प्रस्तावों और उकसाव को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया जाए। इसके बजाय, बिना किसी औपचारिक बयान के इसको उसी के तरीके से, गुप्त हिंसा और प्रतिरोध के जरिए जवाब दिया जाए। 2016 के सर्जिकल स्ट्राइक की तरह, जवाबी कार्यवाही पर कभी-कभार हमारे बयान हमारे लोगों को यह बताने के लिए काफी हैं कि हम भी सो नहीं रहे हैं।

दूसरा, बात करने के लिए सहमत हो जाएं, लेकिन यह पहले ही तय कर लें कि यह हमारा एजेंडा है जिसकी पहल हमने की है। क्या कश्मीर पर बात करना चाहते हैं? कीजिये। हमें यह बता देना चाहिए कि हम पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को फिर से हासिल करने के लिए बात करना चाहते हैं। एक बार जब हम अपना एजेंडा जाहिर कर देगें तो बातचीत के लिए उनकी उत्सुकता अपने आप गायब हो जाएगी।

तीसरा, पाकिस्तानी हिन्दुओं के साथ हो रहे व्यवहार को लेकर बखेड़ा खड़ा करो। यह अजीब बात है कि हमारी नकली धर्मनिरपेक्षता हमें बुनियादी अधिकारों के मुद्दों को उठाने से रोकती है, जबकि पाकिस्तान भारतीय मुस्लिमों से जुड़े मुद्दों को उठा सकता है। हमें पाकिस्तानी हिन्दुओं की स्थिति जानने के लिए उन तक पहुँच की मांग करनी चाहिए और साथ ही हमारे मुस्लिम लोगों के लिए उन्हें ऐसा करने की सहमति नहीं देनी चाहिए।

चौथा है, चीन से नजदीकियां बढाई जानी चाहिए। आज पाकिस्तान में फायदा उठाने वाला एकमात्र देश है चीन, और इस पर हमें राजनायिक प्रयासों के माध्यम से ध्यान देना चाहिए। हमें उइगर आंदोलन को नियंत्रित करने के लिए चुपचाप चीन के प्रयासों का समर्थन करना चाहिए और पाकिस्तानियों के बारे में तथा चीन में हिंसा फैलाने वाले अन्य जिहादियों के बारे में हमारे पास जो भी खुफिया जानकारी है वह चीन के साथ साझा करने का प्रस्ताव देना चाहिए। हालांकि शायद इस नीति से तत्काल लाभ न मिले, फिर भी यह संबंधों में सुधार लाएगी। केवल चीनी ही ऐसे हैं जो पाकिस्तान को यानी उसकी सेना को नियंत्रित कर सकते हैं। पाकिस्तान तथा चीन के बीच अविश्वास पैदा होने से हमारा लाभ है।

पांचवां, चूंकि पाकिस्तान ने कश्मीर में विद्रोह के लिए अस्वीकरणीय समर्थन के माध्यम से भारत को लक्ष्य बनाना चुना है, और उम्मीद है कि उसका अगला निशाना पंजाब है। हम धीरे-धीरे पाकिस्तान को विखंडित करने की नीति अपना सकते हैं। प्रधानमंत्री ने 2016 में बलूचिस्तान के बारे में कुछ आवाज उठाई थी लेकिन उसके बाद हमें ऐसी कोई कार्यवाही नजर नहीं आई। हमें, जैसे भी बन पड़े, बलूचिस्तान, ख़ैबर पख़्तूनख़्वा और सिंध में स्वतंत्रता आंदोलनों का समर्थन करने की जरूरत है। यह उतार चढ़ाव वाला मसला तब तक हल नहीं हो सकता जब तक कि हम बिल्कुल स्पष्ट नहीं हो जाते कि कश्मीरी और खालिस्तानी अलगाववाद के लिए पाकिस्तान का समर्थन पूरी तरह से समाप्त हो गया है।

छठा, हमें कश्मीर में पाकिस्तानी और स्थानीय जिहादियों से लड़ने के लिए एक गुरिल्ला बल का गठन करना होगा। मुख्य सेना इस काम को करने की कोशिश कर रही है, लेकिन केवल एक गुप्त बल ही विद्रोह से निपट सकता है, जैसा कि माओवादी विद्रोह के मामले में हुआ है। आप लंबे समय तक गुरिल्ला दल से लड़ने के लिए सेना का उपयोग नहीं करते हैं। जैसे आप चोर को पकड़ने के लिए एक चोर भेजते हैं, उसी प्रकार गुरिल्ला दल से लड़ने के लिए गुरिल्ला दल को भेजा जाना चाहिए।

हम पाकिस्तान के साथ बड़ी पहल या वार्ता के साथ शांति पाने वाले नहीं हैं। जब तक वे चिल्लाते नहीं कि बंद करो, तब तक हमें बात करना जारी रखना चाहिए; हमें गुप्त लड़ाई तब तक जारी रखनी चाहिए, जब तक कि वे इससे थक नहीं जाते; जब हम उनसे बात नहीं कर रहे हैं तो हमें उनको देखते हुए भी अनदेखा करना चाहिए।

उन्हें इस एहसास से ज्यादा कुछ भी परेशान नहीं करता है कि भारत पाकिस्तान को लेकर कोई परवाह नहीं करता है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वह @TheJaggi पर ट्वीट करते हैं।