राजनीति
मोदी द्वारा रवांडा को दिया गया गायों का उपहार क्यों है बहुत अर्थपूर्ण

प्रसंग
  • सबसे अच्छा और सबसे पोषक उपहार जो रवांडा के लोगों ने कभी भी किसी भी आगंतुक गणमान्य अतिथि द्वारा प्राप्त किया है वह था 200 गायों का उपहार जिसे मोदी द्वारा रेवरू गाँव में गरीब परिवारों को सौंपा गया।
  • यह निश्चित रूप से रवांडा-भारत संबंधों को प्रोत्साहित करेगा।

200 मिलियन डॉलर की ऋण सहायता को किनारे रखिए जो भारत ने नरेंद्र मोदी की अभी समाप्त हुई यात्रा के दौरान भूमिबद्ध पूर्वी अफ्रीकी देश रवांडा को दी। या 400 मिलियन डॉलर के उस ऋण को भी एक तरफ रखिए जो इस देश को कुछ वर्ष पहले भारत द्वारा स्थापित की गईं विभिन्न इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं और टेली-मेडिसिन एवं टेली-एजुकेशन केन्द्रों के लिए पहले ही दिया जा चुका था। सबसे अच्छा और सबसे पोषक उपहार जो रवांडा के लोगों ने कभी भी किसी भी आगंतुक गणमान्य अतिथि द्वारा प्राप्त किया है वह था 200 गायों का उपहार जिसे मोदी द्वारा रेवरू गाँव में गरीब परिवारों को सौंपा गया।

गायें किसलिए? क्योंकि ज़्यादातर बाहरी लोगों द्वारा अज्ञात, छोटी-छोटी पहाड़ियों और शांत झीलों के इस खूबसूरत देश रवांडा में गायों को उच्च सम्मान दिया जाता है। सभी रवांडा परिवारों के लिए गायें न सिर्फ बहुमूल्य सम्पदा हैं बल्कि परिवारों की एक महत्वपूर्ण सदस्य भी हैं। यहाँ तक कि रवांडा के लोग अपनी गायों के नाम भी रखते हैं और कई रवांडाओं का नाम इस बात से तय होता है कि वे कितनी अच्छी तरह अपनी गायों के साथ बर्ताव करते हैं और देखभाल करते हैं! काफी हद तक भारत की तरह ही शुरुआत के दिनों में गाय ने देश की अर्थव्यवस्था में एक आधारभूत भूमिका निभाई थी और जब तक यूरोपीय उपनिवेशवादियों ने उन्हें ईसाई धर्म में परिवर्तित नहीं किया था तब तक रवांडा वासियों ने कभी गौमांस नहीं खाया था। गाय को इतना ज्यादा श्रद्धेय माना जाता था कि देश में लोगों द्वारा दूध में चीनी मिलकर पीना अब भी वर्जित है। दूध को पवित्र माना जाता है और यह वहाँ सभी भोजनों का एक अनिवार्य हिस्सा है।

दो साल पहले रवांडा की एक यात्रा पर मैं गायों द्वारा निभाई गयी उस अहम भूमिका का साक्षी बना जो जीवन यापन के लिए कृषि पर अत्यधिक रूप से निर्भर देश की अर्थव्यवस्था, जो रवांडा के गृहयुद्ध के दौरान तितर-बितर हो गयी थी, के पुनःउद्धार ही नहीं बल्कि 1994 में रवांडाओं के नरसंहार के जख्मों को भरने और देश में सामान्य स्थिति कायम करने के लिए गायों द्वारा निभाई गयी थी। रवांडा के राष्ट्रपति पॉल कागमे ने 2006 में अपनी प्रिय गिरिंका (जिसका अर्थ है एक गाय प्रति परिवार) योजना शुरू की थी और मैंने देश के उत्तरी प्रांत में ब्यूरेरा जिले के साइरू क्षेत्र में एक गांव का दौरा किया था। यह एक पर्यटन यात्रा थी और ग्रामीण रवांडा में जीवन की झलक देखने के लिए एक थोड़ी देर का बसेरा था।

उस यात्रा पर हमारे गाइड जॉन मुकंतगारा ने हमें बताया कि गाँव में भयानक रूप से दरिद्रता फैल गयी थी और गाँव ने गृह युद्ध में अपने अधिकांश पुरुष सदस्यों को खो दिया था। और बचे हुए लोगों ने अपनी सभी संपत्तियों को खो दिया था, जिसमें उनकी मूल्यवान और आलीशान अंकोल गायें भी शामिल थीं। लगभग 350 परिवारों वाले गाँव के सबसे गरीब परिवारों को 2008 में लगभग 50 गायें प्राप्त हुई थीं। एक मात्र शर्त यह है कि गाय की पहली बछिया को पड़ोसी को दान करना होगा। जॉन ने हमें समझाया कि इस प्रकार लाभार्थियों ने गायों से सिर्फ आय ही अर्जित नहीं की बल्कि गाय की बछिया को उपहार स्वरूप देने से लोगों के संबंध भी मजबूत हुए।

तुत्सी और हुतु लोग (यह बेल्जियन उपनिवेशवादियों द्वारा किया गया एक कृत्रिम विभाजन है और वास्तव में दोनों एक ही जातीय समूह से ताल्लुक रखते हैं) गृहयुद्ध के दौरान दो फाड़ हो गए थे। जॉन ने हमें बताया कि पूरे रवांडा में तुत्सी और हुतु लोग आपस में अपनी नवजात बछियों को एक दूसरे को दान करते हुए, घावों को भरने के लिए और दोनों समुदायों के बीच मेल-जोल वापस लाने के लिए एक लंबा सफर तय कर चुके हैं। मुझे याद है कि गाँव में मुझे तुत्सी और हुतु दोनों के बुज़ुर्गों द्वारा बताया गया था (जॉन जिसमें अनुवादक की भूमिका निभा रहे थे) कि गायों ने उन्हें दोबारा जोड़ने और सामाजिक सद्भाव वापस लाने में एक अद्भुत भूमिका निभाई है।

गिरिंका कार्यक्रम के तहत अब तक 2.6 लाख से अधिक गायों को वितरित किया गया है। दूध के सेवन और अतिरिक्त दूध बेचने, जिसने परिवार की आय में वृद्धि की है, के अलावा उर्वरकों के रूप में गाय के गोबर के उपयोग ने मिट्टी के स्वास्थ्य को बहाल किया है और देश के हरित क्षेत्र में तेजी से वृद्धि की है। दूध के सेवन ने गरीबों के बीच कुपोषण को काफी कम कर दिया है। बायो-कंपोस्ट ग्रामीण परिवारों को बिजली और खाना पकाने की गैस प्रदान कर रहा है और युगांडा सरकार के आंकड़ों के अनुसार, गायें देश की अर्थव्यवस्था में केंद्रीय भूमिका निभाती हैं और देश के सकल घरेलू उत्पाद का 15 प्रतिशत उत्पादन करने के लिए जिम्मेदार हैं!

परंपरागत रूप से गायें रवांडा के लोगों की सबसे मूल्यवान संपत्ति रही हैं। रवांडा में गाय की तुलना में जमीन, धन, घर और अन्य संपत्तियां फीकी पड़ जाती हैं। रवांडा में गाय को अभी भी सबसे अच्छा उपहार माना जाता है और यहाँ तक कि शहरी क्षेत्रों में रहने वाले समृद्ध लोग भी प्रमुख अवसरों पर नियमित रूप से अपने मित्रों को गाय का उपहार देते हैं। क्रिसमस के दौरान, हजारों व्यक्तियों और परिवारों द्वारा गायों और बछियों का दान दिया जाता है। गायें विवाह, सगाई, जन्मदिन और स्नातक उपाधि समारोहों में पसंदीदा उपहार हैं, और किगाली (रवांडा की राजधानी) में जिन घरों में मैं गया था, मैंने देखा उनके लिविंग रूम की दीवारों पर परिवार के सदस्यों द्वारा गायों के साथ गर्व से खिंचाए गए चित्र थे! गाय के दूध से बने मक्खन को पवित्र माना जाता है और देवताओं (अब, यीशु के लिए) को अर्पित किया जाता है।

रवांडा में एक गिलास दूध के बिना भोजन पूरा नहीं माना जाता है। वास्तव में, अधिकांश रवांडा वासी उपनिवेशवाद से पहले शाकाहारी ही थे; ये यूरोपीय लोगों ते जिन्होंने मांस खाने की प्रथा शुरू की थी। कई रीति-रिवाज गाय से जुड़े हैं। चरने के बाद चरागाहों से लौटने वाली गायों का पानी से स्वागत करना अनिवार्य है और इसके बाद घर की महिलाएं शाम का भोजन बनाना शुरू करती हैं। केवल पुरुष ही गाय का दूध दुह सकते हैं और उसे अपनी गाय को दुहने से पहले स्नान करना होता है और प्रार्थना करनी होती है। गाय को दुहने के दौरान धूम्रपान करना सख्ती से प्रतिबंधित है। दूध के साथ किसी भी अन्य पदार्थ को मिश्रित नहीं किया जाता है, यहाँ तक कि चीनी या पानी भी नहीं। एक रवांडा परिवार के प्रत्येक सदस्य द्वारा सुबह के सबसे पहले कार्य के रूप में गाय को दुलारना एक रिवाज है।

गायों को अपने मालिकों द्वारा बहुत प्यार से नाम भी दिए जाते हैं। जिनमें से कुछ नाम इन्यामिबवा (सुंदर), इंतवारी (नायक) और गताबाज़ी (रक्षक) हैं। और बच्चों का नामकरण भी उनकी विशेषताओं या वे अपनी गायों की देखभाल कितनी अच्छी तरह करते हैं, के आधार पर किया जाता है। इसी प्रकार रवांडा वासियों के कुछ लोकप्रिय नाम बिकेरिंका (अपनी गाय को अच्छी तरह से खिलाने वाला), मुनगनिंका (एक गाय के समान मूल्यवान), ज़निंका (गाय के साथ खेलने वाला) और यहाँ तक कि ज़मुकोशा (जिसका गाय के बदले में आदान-प्रदान किया जा सकता है) इत्यादि हैं!

आज भी किसी व्यक्ति के काम पर जाने से पहले गाय को देखना एक अच्छा सगुन माना जाता है। उद्घाटन समारोहों में गायों का होना शुभ माना जाता है और रवांडा के लोग मानते हैं कि अगर कोई भी नवजात शिशु गाय को छूता है तो उसका जीवन धन्य होगा। और यदि एक लड़के के जन्म के तुरंत बाद गाय राँभती है, तो वह लड़का बड़ा होकर एक सरदार या मुखिया बनेगा। बच्चों को बहुत छोटी उम्र से ही गायों की देखभाल करना और उनका सम्मान करना सिखाया जाता है। रवांडा में सड़कों और राजमार्गों पर चालक जब एक गाय को देखते हैं तो उसके धन्यवाद में प्रार्थना के शब्द बुदबुदाते हैं और अगर वे यात्रा की शुरुआत में गायों का एक बड़ा झुंड देखते हैं, तो वे इसे बहुत ही शुभ सगुन मानते हैं।

रवांडा की मूल अंकोल गायें बड़ी और ज्यादातर गहरे भूरे रंग की होती हैं, उनके कंधों, छाती और पेट पर विशेष कूबड़ और सिर पर बहुत लंबे और शाही सींग होते हैं। लेकिन यूरोपीय नस्लों में अधिक पैदावार होती है और धीरे-धीरे कई रवांडा वासी फ्रिसियन गायों का चयन कर रहे हैं। हालांकि, यहां तक ​​कि जिन लोगों के पास गायों की यूरोपीय नस्ले हैं, वे भी यह सुनिश्चित करते हैं कि उनके पास कम से कम एक अंकोल गाय हो क्योंकि वे केवल गाय की इसी नस्ल को अच्छा सगुन मानते हैं। रवांडा के निवासी मानते हैं कि जो त्रासदी देश में हुई थी तबसे बड़ी संख्या में मवेशियों (एक मिलियन मजबूत राष्ट्रीय पशु-समूह के 90 प्रतिशत मवेशियों की) की हत्या की गई थी, नरसंहार के दौरान मुख्यरूप से भोजन के लिए। जबकि आज ईसाई बाहुल्य देशों में भोजन के लिए गायों का कत्ल कर दिया जाता है, वहीं यहाँ ऐसी गौ हत्याओं के लिए सख्त कानून हैं। केवल वृद्ध और दूध ना देने वाली और कामर्शियल कैटल फॉर्मों की ही गायों को कत्लखानों में भेजा जाता है। लगभग कोई भी व्यक्तिगत मालिक अपने वृद्ध मवेशियों को नहीं त्यागता है।

अब यह अच्छी तरह से ज्ञात है कि सबसे शुरुआती भारतीय जहां से प्रवास के लिए निकले थे वह अब पूर्वी अफ्रीका है। क्या गाय के लिए भारतीयों की श्रद्धा अफ्रीका से जुड़ी है? शायद, और हो सकता है कि रवांडा के लोगों के साथ भारतीयों के संबंध शोधकर्ताओं की सोच से कहीं ज्यादा गहरे हों। लेकिन एक बात तो निश्चित है: भारतीयों और रवांडा के निवासियों के बीच संबंधों को मोदी द्वारा रवांडा में गायों के गहन विचारयुक्त उपहार से प्रोत्साहन मिला है।

जयदीप मजूमदार स्वराज में एक सह-संपादक हैं।