राजनीति
करतारपुर कॉरिडोर पर सावधानी बरतना भारत के लिए क्यों है आवश्यक?

प्रसंग
  • जैसा कि भारत-पाकिस्तान सीमा पर दोनों तरफ से करतारपुर कॉरिडोर की पहल प्रक्रिया में है, नई दिल्ली बड़ी संख्या में अपने नागरिकों को पाकिस्तान क्षेत्र में संभावित प्रोपगंडा के सामने उजागर करने में शामिल जोखिम को ध्यान में रखते हुए सावधानी से कदम उठा रही है।

कुछ महीनों पहले मेरे सहित ज्यादातर लोग करतारपुर साहिब और सिख धर्म में इसकी अहमियत को लेकर बेपरवाह थे। करीब 100 दिन पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के रूप में इमरान खान के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान नवजोत सिंह सिद्धू द्वारा की गई शानदार घोषणा के लिए धन्यवाद, उन्होंने इसकी अहमियत को समझा और 4 किलोमीटर लंबा कॉरिडोर बनाने का विचार सामने रखा। यह कॉरिडोर भारत के पंजाब राज्य में स्थित डेरा बाबा नानक साहिब गुरूद्वारे से पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में गुरूद्वारा दरबार साहिब करतारपुर को जोड़ने के लिए प्रस्तावित है, यह कॉरिडोर अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर दोनों तरफ से 2-2 किलोमीटर लंबा मार्ग साझा करता है।

प्रस्ताव की पूरी उत्पत्ति अस्पष्ट है। इसके विवरणों से, किसने विचार शुरू किया पर किए जाने वाले दावों और उनके प्रत्युत्तर के दावों में ही मदद मिलेगी। पता चला है कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल कमर बाजवा ने ही जाने माने क्रिकेटर और पंजाब कांग्रेस के मंत्री सिद्धू को पाकिस्तान के इस इरादे के बारे में अवगत कराया था कि वह सीमावर्ती क्षेत्र में अपनी तरफ और इसी तरह से भारत की तरफ एक ऐसा कॉरिडोर बनाना चाहते हैं जिस पर भारतीय तीर्थयात्रियों को संभवतः बिना किसी वीजा या विस्तृत दस्तावेज के इस पवित्र स्थल के दर्शन करने की सुविधा दी जा सके।

हालाँकि, इसे अफवाह ही माना गया। इसलिए जब 26 नवंबर 2018 को भारत में इस पहल के शुभारंभ का समारोह खत्म हुआ तब 28 नवंबर 2018 पाकिस्तान में यह समारोह चल रहा था। मुंबई हमलों (लश्कर-ए-तैयबा के 10 आतंकियों द्वारा किए गए हमले में 165 बेगुनाह लोग मारे गए थे) की दसवीं बरसी वाले दिन ही भारत में इस समारोह को रखने से सभी लोग चौंक गए। क्या यह एकजानबूझकर लिया हुआ फैसला था या महज एक गलती? किसी भी तरह से यह मामला सुर्खियों में आने और सोशल मीडिया टिप्पणियों से दूर रहने में कामयाब रहा।

भारत-पाकिस्तान संबंधों के नजरिए से प्रस्तावित इस करतारपुर कॉरिडोर का विश्लेषण करना काफी अहम है; चाहे यह कुछ भी हो जो इन्हें बेहतर बना देगा। पाकिस्तान को इससे क्या उम्मीदें हैं जबकि यह भारत के खिलाफ प्रॉक्सी वॉर बंद करने की भारतीय मांगों पर हामी नहीं भरता है। ‘टॉक एंड टेरर’ (हिन्दी अनुवाद – वार्ता और आतंक) शब्द अब पाकिस्तान के साथ कोई भी रिश्ता बनाने की दिशा में भारत के रूख का पर्यायवाची बन गया है। तो क्या मौजूदा भारतीय सरकार इससे पीछे हट सकती है जिसका वह जनवरी 2016 में पठानकोट हमले के बाद से दृढ़ता के साथ पालन कर रही है?

ऐसा लगता है कि पाकिस्तान भारत के लिए अपनी पहल में उत्साही ढंग से आगे बढ़ने के बजाय एक वृद्धिशील नजरिया अपनाना चाहता है। प्रॉक्सी वॉर ने पाकिस्तान के भीतर आतंकवादियों को पैदा करके अपने आपको उतना ही नुकसान पहुँचाया है जितना इसने भारत को नुकसान पहुँचाया है, विशेष रूप से विविधिता पूर्ण तथाकथित दोस्ती को जो किसी भी समय खत्म हो सकती है। पाकिस्तान की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा और इसकी अर्थव्यवस्था बदतर है। अर्थव्यवस्था को सऊदी और चीन की मदद से किसी न किसी तरह चलाया जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प पाकिस्तान के प्रति अपनी निजी घृणा को खुलकर व्यक्त नहीं करते हैं, हालाँकि वह अपने सलाहकारों की बात मानते हैं जो शायद उन्हें बताते हैं कि पाकिस्तान को मनाए बिना अफगानिस्तान में एक सक्रिय नीति संभव नहीं है। इमरान खान की आईएमएफ से 9 बिलियन अमेरिकी डॉलर की आर्थिक सहायता (बेलआउट पैकेज) की माँग अमेरिकी प्रमाणीकरण पर उतनी ही निर्भर है जितनी कि एफएटीएफ पर, जो अंतर्राष्ट्रीय आतंक की मदद करने वाले वित्तीय और अन्य नेटवर्कों को उखाड़ फेंकने के पाकिस्तान के प्रयासों से प्रभावित नहीं हुआ है।

इस तरह से प्रॉक्सी वार पर अपना असल रूख छोड़े बिना और जम्मू-कश्मीर से पेट भरने की अपनी नीति जारी रखते हुए, इमरान खान के पीछे की असल सत्ता (सेना) ने शायद दोस्ताना पहल के जरिए कुछ खोए हुए स्थान को फिर से हासिल करने की रणनीति का फैसला किया है। शांतिपूर्वक आया एक प्रस्ताव और एक धार्मिक-सांस्कृतिक मुद्दे का हवाला देना, भले ही इसका खंडन हो जाए, इसके अहंकार या इसकी स्थिति को नुकसान नहीं पहुंचाएगा। शायद यह अंदाजा लगाया गया होगा कि यह एक ऐसा मुद्दा होगा जिसमें सिख धर्म की प्रासंगिकता और शामिल भावनाओं को देखते हुए भारत भी इस प्रस्ताव को स्वीकार कर सकता है। शायद यही करतारपुर कॉरिडोर की पृष्ठभूमि है। हो सकता है कि पहले भी कई बार यह बातचीत करने का एक मुद्दा बनकर उभरा हो लेकिन इसके निष्पादन के विचार को सकल रूप देने का फैसला काफी चतुर साबित हुआ। हालाँकि यह ऐसी गलतफ़हमी भी हो सकती है जो भारत-पाकिस्तान रिश्तों को लगातार कमजोर करती आई है।

भारत के लोगों की नज़रों में पाकिस्तान की छवि अच्छी नहीं है। जम्मू-कश्मीर (जम्मू-कश्मीर) और नियंत्रण रेखा (एलओसी) के अलावा भी, यह तथ्य छिपा नहीं है कि पाकिस्तान अपने अभियान के प्रसार के लिए बाहरी कट्टरपंथी सिख अलगाववादियों का समर्थन कर रहा है। सिख जत्था, जिसने 22 नवंबर को गुरुनानक देव गुरुपर्व के दौरान ननकाना साहिब और सच्चा साहिब गुरुद्वारा का दौरा किया था, सिख कट्टरपंथियों द्वारा प्रचार के अंतर्गत था, और जत्थे के साथ जो भारतीय अधिकारी गए थे उन्हें प्रवेश की अनुमति नहीं थी। ये सकारात्मक संकेत नहीं हैं जो आगामी एक वर्ष में तीर्थयात्रा शुरू होने के सपने के सफल परिणाम की ओर इशारा करते हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह भारत के राज्य पंजाब में पाकिस्तान के हस्तक्षेप से शंकित हैं।

खालिस्तान अलगाववादी आंदोलन 10 वर्षों से अधिक की अशांति और जनहानि के बाद शांत हुआ था। यह सफलता किसी अन्य कारण से नहीं बल्कि पंजाब के लोगों द्वारा उनके क्षेत्र में इस तरह की बुराई का समर्थन न करने से मिली थी। जम्मू-कश्मीर में प्रॉक्सी अभियान केवल घाटी तक ही सीमित होने के साथ, पाकिस्तान की सेना का लक्ष्य पंजाब में अलगाववाद को दोबारा शुरू करके भारतीय क्षेत्र में एक प्रॉक्सी वॉर के विकल्प का दायरा बढ़ाना है। इसने पंजाब की आर्थिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव डालने के लिए पंजाब के युवाओं के बीच मादक पदार्थों के प्रसार का एक सामाजिक असैन्य खेल खेला है। यही कारण है कि पंजाब के मुख्यमंत्री पाकिस्तान के साथ किसी भी मैत्री के लिए तैयार नहीं हैं चाहे वह सांस्कृतिक हो या राजनीतिक। लाहौर के समारोह में शामिल होने से किया गया उनका इनकार इस खेल को ध्यानपूर्वक खेलने की उनकी सावधानी का एक संकेत है।

ऐसा नहीं है कि केंद्र किसी भी फैसले में गुमराह हो गया है। अच्छी तरह से विचार करने के बाद निर्णय लिए गए हैं और विचार-विमर्श के बाद कार्यवाही की गयी है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज द्वारा पाकिस्तान के समारोह में भाग लेने के निमंत्रण को अस्वीकार करने और इसके बजाय शहरी मामलों के राज्य मंत्री हरदीप पुरी को भेजने का निर्णय व्यावहारिक है। यह पूरे मुद्दे को सांस्कृतिक-धार्मिक स्थान तक सीमित करता है और इसे कोई राजनीतिक रंग नहीं देता है। यह भारत को एक तरफ प्रॉक्सी वॉर-एक तरफ बातचीत में कोई दिलचस्पी न लेने की इसकी नीति पर कायम रहने की अनुमति देता है।

करतारपुर कॉरिडोर के निर्माण में बहुत लंबा समय तो नहीं लगेगा लेकिन इससे संबंधित प्रक्रियाएँ शायद बहुत आसानी से पूरी नहीं की जा सकती हैं। भारत बड़ी संख्या में अपने नागरिकों को पाकिस्तान क्षेत्र में संभावित प्रोपगंडा के सामने उजागर करने में शामिल जोखिम को ध्यान में रख रहा है और इसे अनिवार्य रूप से गैर राजनीतिक बनाए रखने की आशा करेगा। जम्मू-कश्मीर से लेकर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर तक की यात्रा के मार्गों को खोलने के साथ एक हालिया अनुभव ने मादक पदार्थो, सिम कार्डों और सैन्य सामान की तस्करी के प्रयासों को देखा है, हालाँकि ये मार्ग एलओसी पर भारी गोलीबारी और पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित लगातार आतंकवादी गतिविधियों में भी खुले रहे हैं। शायद यह पाकिस्तान की भूल है अगर यह सोचता है कि यह करतारपुर कॉरिडोर के मामले में भी उसी नीति का पालन कर सकता है।

भारत एक सांस्कृतिक-धार्मिक पहल को राजनीतिक अनुबंध में बदलने के बारे में धैर्यवान और चौकन्ना है जैसा कि सुषमा स्वराज की घोषणा में स्पष्ट है कि स्थिति को देखते हुए भारत इस्लामाबाद में होने वाले सार्क अधिवेशन में शामिल नहीं होगा।

अंत में यह बताना दिलचस्प होगा कि अगर पाकिस्तान गंभीरतापूर्वक अनुबंध के माध्यम से मैत्री चाहता है और एक सांस्कृतिक-धार्मिक पहल को राजनीतिक क्षेत्र में ले जाना चाहता है तो यह एक अन्य क्षेत्र में भी संवेदनशीलता प्रदर्शित कर सकता है। इसके प्रॉक्सी वॉर के बुनियादी ढांचे के ठप्प होने के अलावा वह क्षेत्र भारत (जम्मू-कश्मीर) में प्रस्तावित शारदा पीठ यात्रा से नीलम घाटी तक बढ़ाया जा सकता है, जहाँ माता शारदा का प्रतिष्ठित मंदिर एलओसी के पास मौजूद है। यह एक ऐतिहासिक निर्णय होगा जो भारत की हिंदू भावनाओं को भी आकर्षित करेगा।

हालाँकि, पहले यह महत्त्वपूर्ण है कि करतारपुर कॉरिडोर पूर्ण संतुष्टि तक काम करे, जिसकी वास्तविकता 2019 में गुरू नानक देव जी के जन्म की 550वीं वर्षगांठ तक सामने आ जाएगी। हालाँकि, अगर माहौल सही रहता है तो किसे पता है कि करतारपुर कॉरिडोर के माध्यम से पहली तीर्थयात्रा बहुत पहले ही शुरू हो जाए।

लेखक भारत के श्रीनगर आधारित 15 कोर के पूर्व जीओसी हैं, जो अब विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन और इंस्टीट्यूट ऑफ पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट स्टडीज से संबद्ध हैं।