राजनीति
कैसे उत्तर प्रदेश में महागठबंधन को भाजपा की जगह कांग्रेस से ज़्यादा नुकसान होगा

सपा-बसपा के गठजोड़ पर मोहर लग गई है। मगर बुआ-भतीजे की जोड़ी ने कांग्रेस को इस महागठबंधन में सम्मिलित नहीं किया क्योंकि उन्हें लगता है कि पार्टी के पास वोट ट्रांसफर करने की क्षमता नहीं है। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि कांग्रेस पार्टी भाजपा पर भारी पड़ेगी या इस महागठबंधन पर। मीडिया में हो रहे विवादों को मद्देनज़र रखते हुए लेखक ने इस त्रिकोणी प्रतियोगिता पर अपनी टिप्पणी दी है। टिप्पणी से पहले उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के प्रदर्शन को समझना आवश्यक है।

वोट शेयर और सीटें
साल 1989 से गठबंधन का दौर चलता आ रहा है और मंडल एवं कमंडल के विवाद का गहरा असर उत्तर प्रदेश के राजनीतिक पटल पर विद्यमान रहा है। तथा कांग्रेस के प्रदर्शन का स्तर गिरता हुआ दिख रहा है।

साल 1989 में कांग्रेस ने 31.8 प्रतिशत मत हासिल किए जबकि साल 1998 कांग्रेस को 6 प्रतिशत कम मत मिले और यह खाता खोलने में भी अक्षम रही। कांग्रेस पार्टी ने 2009 के उप्र के चुनाव में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया और 21 सीटें जीतीं। मगर वर्ष 2014 में कांग्रेस ने सिर्फ रायबरेली एवं अमेठी की ही सीटें जीत पाई। कांग्रेस ने 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में 60.6 लाख वोट हासिल किए जिनमें से 9.35 लाख वोट अमेठी एवं रायबरेली में मिले थे।

बाकी 65 सीटों में कांग्रेस ने लगभग हर सीट पर 79000 वोट कमाए। बाराबांकी, ग़ाज़ियाबाद, कानपुर, कुशीनगर, लखनऊ, सहारनपुर में कांग्रेस ने बसपा एवं सपा के प्रत्याशियोंसे ज़्यादा वोट हासिल किए। पाँच जगहों पर यह तृतीय स्थान पर रही- खेरी (>सपा), मिर्ज़ापुर (>सपा), प्रतापगढ़ (>सपा), रामपुर (>बसपा) और वाराणसी (>सपा-बसपा)।

विभिन्न जातियों का समर्थन

कांग्रेस को उप्र में उच्चवर्गीय लोगों का काफी समर्थन मिलता है।इसके अलावा कुर्मी एवं कोयरी जातियों से और मुस्लिम समुदाय से भी समर्थन प्राप्त होता है।

2014 में कांग्रेस को 23 प्रतिशत वोट मुस्लिम समुदाय से मिला, 21 प्रतिशत वोट उच्चवर्गीय लोगों से मिला और 20 फीसदी वोट कुर्मी एवं कोयरी जातियों से मिला। मुस्लिम समुदाय के लोगों ने हमेशा से ही ऐसी पार्टी का समर्थन किया है जो भाजपा को हराने में सक्षम हो, वहीं उच्चवर्गीय लोगों ने भाजपा का पूर्णतया समर्थन किया है।

इन 5 कारणों से समझें कि महागठबंधन को भाजपा से नहीं बल्कि कांग्रेस से अधिक नुकसान होगा-

1. कांग्रेस भाजपा-विरोधी वोट का विभाजन करेगी और पूर्ण जोश के साथ चुनाव में भाग लेगी ताकि वह लोगों को यह बात समझा पाए कि उसे बसपा-सपा की ज़रूरत ही नहीं है, वह भी तब जब कांग्रेस ने छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में चुनावी जीत हासिल की है।हालाँकि 10-15 सीटों पर कांग्रेस का दबदबा बना रहेगा मगर कांग्रेस महागठबंधन से ज़्यादा सीट नहीं जीत पाएगी।

2. कांग्रेस को कुछ वोट दलित, मुस्लिम, और यादव समुदाय के लोगों से मिलेंगे।2014 के चुनाव में कांग्रेस को 39 प्रतिशत वोट मुस्लिम, यादव, एवं दलित समुदाय के लोगों से मिला था। महागठबंधन तब तक भाजपा को नहीं हरा सकता जब तक उनको यादवों के अलावा अन्य पिछड़े वर्गों का वोट प्राप्त नहीं होता जबकि कांग्रेस को अन्य पिछड़े वर्गों से 35 फीसदी वोट प्राप्त होंगे।

कोई यह तर्क कर सकता है कि मुस्लमि कांग्रेस को क्यों वोट देंगे जब वे जानते हैं कि महागठबंधन भाजपा को हराने के लिए बेहतर स्थिति में है। ऐसा इसलिए क्योंकि-

  • कांग्रेस कुछ सीटों पर अपने मुस्लिम प्रत्याशियों को खड़ा करेगी जिसकी वजह से वोटों में विभाजन होगा
  • राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस भाजपा को हराने में ज़्यादा सक्षम है क्योंकि उत्तर प्रदेश के बाहर बसपा और सपा की उपस्थिति सीमित है।

3. यदि कांग्रेस गठबंधन का भाग होती तो वह इन मत रिसावों को रोक सकती थी- कोई भी समुदाय किसी भी पार्टी को 100 प्रतिशत वोट नहीं देता और किसी भी समुदाय से अधिकांश 70-75 प्रतिशत मत नृमिल सकते हैं। इसलिए कांग्रेस के पास दलित, मुस्लिम और यादव समुदाय के वोट होंगे जो कड़े मुकाबले में महागठबंधन को नुकसान पहुँचाएगा। यह सोचना गलत होगा कि अगर बसपा-सपा के महागठबंधन में अगर कांग्रेस को सम्मिलित किया जाता तो दलित, मुस्लिम और यादव समुदाय के लोग उनके प्रत्याशियों को वोट ही नहीं करते। अगर कांग्रेस इस गठजोड़ का हिस्सा होता तो करीब 3-4 प्रतिशत वोट गठबंधन को ट्रांसफर हो जाते।

4. कांग्रेस ने शहरी इलाकों और अवध क्षेत्र में बसपा और सपा से बेहतर प्रदर्शन किया है-
उप्र में 68 ग्रामीण और 12 शहरी सीटें मौजूद हैं। शहरी क्षेत्रों में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर था और और इसका वोट शेयर सपा और बसपा के बराबर ही रहा था। अवध जहाँ 13 लोक सभा सीटें हैं, वहाँ 2014 में इसे 17.8 प्रतिशत मत मिले थे। यह बात भी है कि अमेठी और राय बरेली इसी क्षेत्र में आते हैं। इस क्षेत्र में इसका वोट शेयर सपा से अधिक है।

5. राष्ट्रीय बनाम क्षेत्रीय चुनाव- उत्तर प्रदेश ने देश को सबसे ज़्यादा प्रधानमंत्री दिए हैं। साल 1989 में लोगों ने वीपी सिंह को मत दिए और 1996,1998 और 1999 में लोगों ने अटल बिहारी वाजपेयी को वोट देकर जिताया। 2004 में भी लोगों ने वाजपेयी को ही वोट दिया। साल 2009 में आडवाणी ने गुजरात से चुनाव लड़ा और राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ा जिस कारण कांग्रेस को 2009 में 21 सीटें हासिल हुई थीं। 2014 में प्रधानमंत्री मोदी वाराणसी से चुनाव लड़े और लोगों ने भाजपा को ज़्यादा से ज़्यादा वोट दिया। 2019 में भी राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी उप्र से ही चुनाव लड़ेंगे। इसलिए कांग्रेस को महागठबंधन से ज़्यादा सीटें मिलने की संभावना है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि कांग्रेस का महागठबंधन में न होना गठबंधन को ही नुकसान पहुँचाएगा। मुख्यतः कांग्रेस को इस महागठबंधन का हिस्सा इसलिए नहीं बनाया गया क्योंकि कांग्रेस एक राष्ट्रीय स्तर की पार्टी है और यह 12-15 सीटों से कम में नहीं मानती और इस कारण बसपा और सपा को लोकसभा में ज़्यादा सीटें नहीं मिल पातीं। अब यह त्रिकोणीय प्रतियोगिता देखने योग्य होगी।

अमिताभ तिवारी एक पूर्व कॉर्पोरेट और निवेश बैंकर हैं जो अब राजनीति और चुनावों में विशेष रुचि ले रहे हैं। उपरोक्त विचार इनके व्यक्तिगत हैं। इनका ट्विटर हैंडल @politicalbaaba है।