राजनीति
जब कानून आपे से बाहर हो जाए : सबरीमाला भक्त सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को कैसे नकार सकते हैं
सबरीमाला भक्त

प्रसंग
  • सबरीमाला पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से अल्पावधि में भक्तों पर कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन हिंदू प्रथाओं और उनकी निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है।

आइए इसकी शुरुआत करते हैं कि कल्पना करिए कि सबरीमाला प्राधिकारियों ने मंदिर के प्रवेश मार्ग पर इस तरह की सूचना लगाई है:

प्रिय सबरीमाला भक्तों,

जैसा कि आप जानते हैं, हम स्वामी अयप्पा के भक्त दृढ़ता से मानते हैं कि सबरीमाला में वह एक नैष्ठिक ब्रह्मचारी के रूप में प्रकट होते हैं। इसके अलावा हम मानते हैं कि जब एक पुरुष देवता की पूजा नैष्ठिक ब्रह्मचारी के रूप में की जाती है तो मंदिर के विशिष्ट अगम – यज्ञवल्क्य स्मृति में निषेधाज्ञा के आधार पर – इस शर्त को लागू करते हैं कि किसी भी तरह उन्हें 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के सहचर्य के अधीन नहीं किया जाना चाहिए।    

हाल ही में धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने फैसला दिया है कि यह नैष्ठिक ब्रह्मचारी परंपरा “असंवैधानिक” है। स्वामी अयप्पा की सच्ची महिला भक्त बहुत निर्मलता के साथ उतना ही भरोसा करती हैं जितना कि हम सभी के द्वारा किया जाता है और वे कभी इस तरह का कार्य नहीं करेंगी कि जिससे स्वयं का, साथी अनुयाइयों और देवता का विनाश हो। इस बाहरी हस्तक्षेप के विरोध में लाखों महिला भक्त सड़कों पर गयी हैं।

हिंदू धर्म, पथों का बाजार प्रदान करता है, स्वामी अयप्पा या अनगिनत अन्य देवताओं के अन्य रूप भी हैं। इसलिए हम गैर-भक्त महिलाओं से हमारे विश्वास का सम्मान करने का विनम्रता से अनुरोध करते हैं जो इस मंदिर का एक अभिन्न हिस्सा बनता है। धन्यवाद।

यह भक्तों के निकाय द्वारा आयोजित गहन मान्यताओं का एक सच्चा विवरण है- चाहे कुछ न्यायालय इस निकाय को एक वैध संप्रदाय के रूप में मान्यता प्रदान करते हों या नहीं।सूचना पढ़ने के बाद, केवल वास्तविक लड़ाका महिला मंदिर को अपनी अवज्ञा दिखाने या राजनीतिक बयान देने का साहस करेगी।

धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र भारत ऐसी सूचना के कारण उत्पन्न हुई स्थिति से कैसे निपटेगा?मुझे दुःख है कि इसका जवाब बहुत खतरनाक हो सकता है। साझा सूचना विश्वास का हवाला देते हुए ज्यादातर महिलाओं को हतोत्साहित करेगी।राज्य केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कम करके या यहाँ तक ​​कि मजबूर भाषण से भी बड़ी संवैधानिक गलतियां करके इसका जवाब दे सकता है। उदाहरण के तौर पर, एक अदालत इस बात पर फैसला कर सकती है कि विश्वास की इतनी स्पष्ट अभिव्यक्ति स्वयं संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है और इसीलिए अमान्य है।आपको अपने पिछले विश्वास को अस्वीकार करते हुए और महिलाओं के लिए अनुकूल संदेश देते हुए एक अपमानजनक रिवर्स नोटिस देने के लिए भी कहा जा सकता है।या केरल की कम्युनिस्ट सरकार आपके लिए ऐसा करने के लिए कर धन का उपयोग कर सकती है।वे विश्वास प्रणाली को अस्वीकार करने, नए विश्वास की घोषणा करने और महिलाओं को आमंत्रित करने के लिए आमंत्रित करने वाले समाचार पत्रों में एक नोटिस जारी कर सकते हैं।इस तरह के नोटिस की योजना बनाई जा रही है।संयुक्त राज्य अमेरिका के पास एक स्पष्ट “लेमन परीक्षण” है जो धर्म में इस प्रकार के विचित्र और अंतहीन राज्य हस्तक्षेप को रोकता है।इस संबंध में भारत की न्यायिक व्यवस्था कितनी दूर तक जाएगी?

इस तरह की न्यायिक विपदाएं ईसाईयों और मुस्लिमों की तुलना में मूर्तिपूजक बहुदेववादियों को अलग तरह से नुकसान पहुँचाती हैं। यह तीन चीजों के कारण होता है:

  • नाटकीय रूप से हिंदू प्रथाओं का एक बड़ा भू-क्षेत्र बनाम संकुचित और गंभीर ईसाई एवं मुस्लिम संस्कार बना हुआ है।
  • अदालतों ने एक आवश्यक प्रथा परीक्षण तैयार किया है, जो कुछ धर्मों की प्रथा के लिए साक्ष्य मांगता है।यह अब्राहमिक धर्मों के साथ आसानी से फिट बैठता है, जहाँ श्रुति ज्ञान की केंद्रीय श्रेणी है।भगवान ने खुद को प्रकट किया है और अपने उद्देश्य और स्पष्ट निर्देश व्यक्त किये हैं।उन्हें एक पुस्तक में दर्ज किया गया है।आप इसके साथ बहस कैसे कर सकते हैं?
  • एक राजनीतिक मूल्य – ईसाई या मुसलमानों पर हमला करना अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से प्रतिशोध को आमंत्रित करेगा। इसलिए राजनीतिक मूल्य पर इसको देखना जरूरी है। हालांकि, इसका बचाव रखा जाना चाहिए। हिंदू प्रथाओं को नीचा दिखाना राजनीतिक मूल्य भी ले सकता है क्योंकि सिद्धांत में बुतपरस्त भी समेकित हो सकते हैं, सरकारों को वोट दिया जा सकता है और संवैधानिक कानूनों में संशोधन किया जा सकता है। कोई भी आश्चर्यचकित हो सकता है अगर हम ऐसा करने की उम्मीद करते हैं?

रणनीतिक खिलाड़ियों द्वारा इस दोष को तुच्छ रूप से हथियार बनाया जा सकता है।क्या संविधान के “परिवर्तनीय दस्तावेज” का प्रयोग बुतपरस्त और उनकी जीवंत हिंदू प्रथाओं को कानूनी रूप से बचाव करने के लिए आसान एक वर्ण में “विखण्डित”, “दोषमुक्त” या “रूपांतरित”करने के लिए किया जा सकता है? ये कल्पना की उड़ानें नहीं हैं।हम पहले से ही जानते हैं कि स्थायी आवश्यकताओं की अनुपस्थिति के कारण रणनीतिक जनहित याचिका (पीआईएल) वास्तविक है।क्या यह वास्तव में विश्वास करने योग्य है कि इस अभियोग को आगे लाने के लिए उन्हें सबरीमाला की एक भी महिला भक्त नहीं मिली? खासकर तब, जब हिंदुओं के लिए धर्मनिरपेक्षता और विद्रोह का महत्व शून्य है।

जज इंदु मल्होत्रा ने अपनी असहमति में सही ढंग से निष्कर्ष निकाला कि इस पीआईएल को कभी स्वीकृत नहीं किया जाना चाहिए था।यहाँ तक कि धार्मिक प्रथाओं की जाँच के मामले में, स्वयं आस्तिकों के बीच मतभेद को अनैच्छिक रूप से अदालत में खींचने के बजाय एक बाहरी विखण्डन है।बाद का एक उदाहरण वदाकलाई और थेनकलाई तमिल इयंगर गुटों का प्रसिद्ध हास्यपूर्ण मामला होगा, जिनका कंचिपुरम मंदिर के हाथी को अभिषेक करने पर हुआ विवाद प्रिवी काउंसिल (गुप्त जानकारी के संबंधित मंत्री परिषद) पहुँच गया!भले ही मामले में अदालतों में चर्चा किए जाने वाला कोई कार्य नहीं था, फिर भी आस्तिकों के बीच विवाद तो हो गया था।इसलिए इसको लगभग संपत्ति अधिकारों को निर्धारित करने के समान नागरिक विवाद के रूप में निपटाया जा सकता है।

आइए अब निर्णय के कुछ तर्कों को भी सामने रखते हैं।

धार्मिक बनाम धर्मनिरपेक्ष पहलू

सबसे पहले, नए क्षेत्र में मौजूद भूमिगत सुरंगों पर ध्यान आकर्षित करने जजों (मैं केवलजस्टिस इंदु मल्होत्रा को छोड़ रहा हूँ क्योंकि उन्होंने बुद्धिमानी से अलहमति व्यक्त की है) के बारे में एक छोटी सीटिप्पणीजिसमें अन्य चार प्रथम अन्वेषकने मंजूरी दे दी। चार पुरुष न्यायाधीश उस आकर्षण क्षेत्र से नहीं हैं, जहाँ सबरीमाला के भक्त निवास करते हैं और न ही इससे या इस तरह के किसी अन्य धार्मिक स्थल से कोई व्यक्तिगत संबंध है। न्यायाधीशों की स्कूली शिक्षा की पृष्ठभूमि भी प्रासंगिक है क्योंकि यहाँ वे एक मामले के धर्मनिरपेक्ष पहलू को नहीं देख रहे हैं बल्कि एक धार्मिक परंपरा उघाड़रहे हैं। तो, क्या अंतर है?

मैंने ट्विटर पर इसे एक उदाहरण के साथ चित्रित किया है: कल्पना कीजिए कि क्या हिंदुओं के पास #core1 (अल्पसंख्यकों के लिए शिक्षा का अधिकार) था और सबरीमाला प्राधिकरण धर्मनिरपेक्ष सीबीएसई स्कूलों की एक श्रृंखला चलाता था। हमें कहना होगा कि स्कूलों की उस श्रृंखला मेंउन्होंने महिला छात्रों की अनुमति नहीं दी है। फिर यदि उसी प्रकार का मामला न्यायाधीशों के सामने आया, तो न्यायाधीशों की पृष्ठभूमि के बारे में चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि उन्हें धर्मनिरपेक्ष मामले- शिक्षा पर फैसला करने के लिए बुलाया गया है।

धर्म का पालन करने का अधिकार अस्वीकार

भारत के पूर्व न्यायाधीश दीपक मिश्रा और न्यायाधीश ए एम खालविनकर ने सबरीमाला निर्णय पर जो अपनी राय दी है उसका आधार असंवैधानिक है क्योंकि यह अनुभाग 25(1) के तहत धर्म का अभ्यास करने के लिए महिला के अधिकार को अपमानित करता हैः

1965 के नियम 3(बी) के आधार पर सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध का अभ्यास स्वतंत्र रूप से अपने धर्म का अभ्यास करने और भगवान अयप्पा की भक्ति करने के लिए हिन्दू महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन है। यह निषेध उनको पूजा के अधिकार से वंचित करता है। अनुच्छेद 25(1) के तहत किसी भी आयु के किसी भी पेशे के महिला और पुरूष दोनों को धर्म का अभ्यास करने का समान अधिकार है।

ऐसी भी परिस्थितियाँ हैं जहाँ बहिष्कार मान्य है – उदाहरण के तौर पर, मैं जबरन आपके घर में नहीं घुस सकता और आपके पूजा कक्ष में शिव की पूजा करने की मांग नहीं कर सकता। तो जाहिर है कि पूजा के अनजान अधिकार के लिए कुछ अधिभावी निजी अपवाद हैं। इसका सबसे अच्छा परीक्षण करने का एक तरीका यह है कि यह देख लिया जाए कि इसपर जो निषेध लगा है उसने धर्म का अभ्यास करने के अधिकार को वास्तव में कितना नुकसान पहुँचाया है। निर्णय में इस बात को तो बिलकुल नजरअंदाज कर दिया जाता है क्योंकि इस जगह पर याचिकाकर्ता बुरी तरह से फंस जाएंगे।

धर्म का पालन करने के लिए हिंदू महिला का अधिकार निम्नलिखित कारणों से प्रभावित हैः

सबरीमाला तो हिन्दू/मूर्तिपूजक के कपड़े में केवल एक धागा है। जो महिलाएं इसमें पूरी श्रद्धा नहीं रखती हैं वे कोई दूसरा मंदिर चुन सकती हैं और पनप सकती हैं। जनहित याचिकाकर्ता खुद इसका जीता जागता उदाहरण है जो इससे काफी संतुष्ट और उत्साहित नजर आ रहा है।

सबरीमाला धागा इतना प्रभावशाली है कि निषेध के कारण महिलाओं को अतिरिक्त क्षति होगी। लेकिन न तो उनको सबरीमाला ट्रस्ट द्वारा संचालित मेडिकल कॉलेज की सीटों से वंचित किया जा रहा है न ही उनको किसी तरह की वास्तविक अक्षमता या आर्थिक या सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है।

सबरीमाला में अयप्पा की पूजा करने का तर्क अपने आप में ही पूरी तरह से फर्जी है मिश्रा और खानविलकर को इसमें ज्यादा ध्यान ही नहीं देना चाहिए था। इस बात का तो कोई सबूत ही नहीं है कि मासिक धर्म की आयु वाली महिलाएं श्रद्धा और भक्ति को चोट पहुंचाकर सबरीमाला में पूजा करना चाहती हैं। जैसा कि पहले ही बता दिया गया था कि इस तरह के परिदृश्य का एक अलग मामला होगा। तब भले ही महिलाओं ने सबरीमाला में एक आंतरिक समूह का गठन कर लिया होगा, लेकिन अब वैसा कुछ नहीं है।

जैविक निषेध और अशुद्धता

न्यायाधीश आर.एफ. नरीमन कहते हैं –

साथ ही, तर्क यह है कि ऐसी महिलाएं अन्य अयप्पा मंदिरों में पूजा कर सकती हैं उन्हें धर्म का अभ्यास करने के अपने मौलिक अधिकार से इंकार करने का कोई जवाब नहीं है क्योंकि वे इसे ऐसे ही देखती हैं, जिसमें उनके पसंद के किसी भी मंदिर में पूजा करने का अधिकार शामिल है। इस आधार पर भी,धर्म का अभ्यास करने का अधिकार,जैसा कि थान्थ्री और पूजा करने वालों ने दावा किया था, 10 से 50 वर्ष की आयु के बीच की महिलाओं के मौलिक अधिकार हर हाल में संतुलित होना चाहिए, जो मासिक धर्म के जैविक आधार पर सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने में पूरी तरह से प्रतिबंधित हैं।

फिर से, यहाँ पर “पूजा” की अवधारणा का उपयोग अब्राहिमिक अर्थ में किया जा रहा है। यह “पूजा” ईसाई धर्म या इस्लाम में सामूहिक या बपतिस्म या अन्य संस्कारों के समान नहीं है। मूर्तिपूजक हिन्दू व्यवस्था में, पत्थरों की पूजा करने वाले हम लोग बेवकूफ नहीं हैं। हम “विश्वास, एकत्रित इतिहास, विरासत, अतीत, दिव्यता और हमारे पहले की प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों” की पूजा करते हैं जो स्वयं को पत्थर के माध्यम से ही प्रकट करते हैं। सबरीमाला में हम लोग नैष्ठिक ब्रह्मचारी की पूजा करते हैं। यहाँ पर नरीमन अपनी छोटी समझ दिखाते हैं – यह मासिक धर्म की वजह से नहीं बल्कि देवताओं की अनूठी प्रकृति की वजह से है। इसके विपरीत देखा जाए तो – क्या हिन्दू देवता अपनी प्रकृति को बदल सकते हैं?

तमिलनाडु में, हम ऐसे भी देवताओं को जानते हैं जिनको प्रसन्न करने के लिए उनके भक्त जलते हुए कोयलों पर चलते हैं और शराब तथा मुर्गे आदि का चढ़ावा चढ़ाते हैं। अन्य प्रथाओं में कुंभ और पुष्कर जैसे कुछ पवित्र स्थानों पर नदी में डुबकी लगाई जाती है। क्या डुबकी लगाने के बजाय लोगों को शॉवर में नहा लेना चाहिए? क्या हम चाहते हैं कि अदालत इस मामले में भी अपना हस्तक्षेप करे और हमारा फैसला करे।

विशेष रूप से अधिकांश सार्वजनिक मंदिरों में उच्च शाकाहर की स्थिति में अशुद्धता के इस कोण को लेकर अंधाधुंध तरीके से मूर्तिपूजक प्रथाओं में हस्तक्षेप किया जा सकता है। सबरीमाला में जो यह नियम है कि केवल शाकाहारी व्यक्ति ही वहाँ पूजा कर सकता है क्या वह अयप्पा की पूजा करने के लिए माँस खाने वालों के अधिकारों का हनन है?

अस्पृश्यता का एक रूप – अनुच्छेद 17 का कोण

(भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 “अस्पृश्यता का अंत” करता है)

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की राय इस समीक्षा के प्रति प्रतिरक्षित होनी चाहिए। उनके मुख्य मापदंड को “संवैधानिक नैतिकता और परिवर्तनीय परियोजना” के तहत सीमित किया जा सकता है। मुझे लगता है कि उनको इस चीज की ज्यादा समझ नहीं है कि अभ्यास को किसी भी पहलू के साथ न्यायिक प्रणाली से संरक्षित होना असंभव है। हालांकि, उनके एक तर्क के दावे पर टिप्पणी की जरूरत है – सबरीमाला अस्पृश्यता का एक रूप है – जिसे आमतौर पर एक बहुत ही विशिष्ट जातीय अभ्यास के संदर्भ में समझा जाता है।

डॉ. तरूण खेतान ने जुलाई में एक लेख में भविष्यवाणी की थी –

अंतिम विश्लेषण में, हिन्दू धर्म में शामिल होने के अधिकार की आस में दावेदारों के पक्ष में जो बिंदु संतुलित करते हैं, विशेषकर अनुच्छेद 25 (2) (बी) के मंदिर में प्रवेश के सम्बन्ध में, और जो अनुच्छेद 17 के अस्पृश्यता पर प्रतिबन्ध को अतिरिक्त वजन देते हैंI

सबसे पहले, किसी एक जाति के पुरुष, महिला और बच्चे को प्रभावित करने वाली सामाजिक विवेक के प्रति स्थायी विरासत की तुलना अस्थायी, अलग, और पूरी तरह मंदिर से महिलाओं को बाहर करना बेअसर और भौंडा होगाI यह पोस्ट कोई -आधुनिक “अंतरानुभागीय” मामला नहीं है – जहाँ पर कई उत्पीडन धुरी आकर मिलते हों। सबरीमाला में सभी महिलाओं के प्रवेश निषेध है फिर चाहे वह ब्राह्मण हो, नायर हो, नादर हो या अनुसूचित जाति की हो।

मुझे लगता है कि न्यायाधीस चंद्रचूड़ ने अनुच्छेद 17 से जो तर्क दिए हैं उनकी और उनके उदारवादी प्रसंशकों की बुराइयों को इंगित करना काफी महत्वपूर्ण होगा। उन्होंने कहाः

अनुच्छेद 17 संविधान के परिवर्तनीय आदर्श का प्रतिबिंब है, जो सामाजिक रूप से वंचित व्यक्तियों और समुदायों की आकाक्षांओं को अभिव्यक्ति देता है और कट्टरपंथी सामाजिक परिवर्तन के लिए एक नैतिक ढांचा प्रदान करता है।

सबसे पहले, “परिवर्तन” का संवैधानिक शासनादेश कुछ डरावने संकेत दे रहा है – हमें इसकी बारीकियों पर जोर देना होगा। क्या इसका मतलब मूर्तिपूजकों को आस्तिक बनाना है? या आस्तिकों को नास्तिक? बिन्दु ए और बिन्दु बी क्या है? यदि ऐसा रहस्यमय और अधूरा अनुबंध कानून के साथ हमारे रिश्ते का आधार बनने जा रहा है तो यह देश कैसे काम चल सकता है?

बुरे विश्वासों वाले तर्क जाति-तटस्थता को पहचान नहीं रहे हैं जो किसी भी तीर्थयात्रा का एक केन्द्रीय पहलू है।

अनुच्छेद 17 में तो मुख्य रूप से अस्पृश्यता पर चिंता व्यक्त की गई है तो सबरीमाला के रीति रिवाज को ज्यादा से ज्यादा आजादी दी जानी चाहिए। न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने इसका उल्लेख तक पारित नही किया Iकिसी अन्य संप्रदाय से हटकर तीर्थयात्रा में सभी जातियों के लोग आपस में मिलते हैं। शहर की बसों में मुझे बचपन की याद आती है जहाँ पर सभी तीर्थयात्रियों को स्वामी कहा जाता था चाहे वे किसी भी धर्म या जाति के हों। सबरीमाला आन्दोलन ने भी एक बड़े गुरूस्वामी को उत्तेजित किया, जो जाति तटस्थ में एक विशेष बड़े पुजारी का कैडर है। गुरूस्वामी वे लोग होते हैं जो अन्य लोगों का सूत्रपात करते हैं। यहाँ पर ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ ऊंची जातियों के कई लोग तथाकथित पिछड़ी जाति के लोगों से अपनी 41 दिन की तपस्या की शुरूआत करवा रहे हैं। यह बहुत आश्चर्य और गर्व का विषय होना चाहिए कि इस तरह का एक मूल्य विकसित हुआ है। हमारी चरमपंथी दृष्टि में, इस तरह के समूह को सामाजिक परिवर्तन का मार्गदर्शक होना चाहिए और कुछ न्यायाधीशों को उन चीजों पर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए जिन्हें वे समझ नहीं सकते हैं।

अब इसका जवाब होगा किः “महिलाओं को अनुमति देने से इसमें कुछ नहीं बदलता है।” लेकिन इससे बदलाव होता है। पहला, पुरूषों को जाति के बंधन में बांधना आसान होता लेकिन अगर आप इसमें महिलाओं को मिला देते हैं तो यह हालत बद से बदतर हो जाती है। दूसरा, यह कानून को भक्तों के हाथ में दे देते हैं जो किसी सरकारी उद्देश्य के लिए नहीं, खुद को बांधने के लिए बनाये गए हैंI

इसलिए अनुच्छेद 17 के तर्क अज्ञानता से भरे हुए हैं और इन्हें खारिज कर दिया जाना चाहिए।

संप्रदाय और आवश्यक अभ्यास परीक्षण

इसलिए भगवान अयप्पा के भक्त केवल हिन्दू होते वे कोई अलग धार्मिक संप्रदाय नहीं बनाते हैं। एक धार्मिक संप्रदाय के लिए, धर्म की नई पद्धति प्रदान की जानी चाहिए। किसी प्रथा का अभ्यास करने से, चाहे भले ही लंबे समय तक किया गया हो, एक नया धर्म नहीं बन जाता। (मिश्रा ने अरबिंदो समाज में सर्वोच्च न्यायालय का हवाला देते हुए – अपने आप को हिन्दू होने से इंकार कर दिया)

वर्जीनिया उपनिवेश के क्वेकरों ने कहा कि वे नव-स्वतंत्र उपनिवेशिक के प्रति निष्ठा की शपथ नहीं लेगें और इसके अलावा वे अपने पुरूषों को मिलिशिया के लिए मासिक हथियार प्रशिक्षण के लिए नहीं भेजेंगे। उन्होंने कहा कि वे एक अलग ईसाई संप्रदाय हैं और उनका विश्वास शपथ लेने और हथियार उठाने की अनुमति नहीं देता है। उन्हें अनुमति थी। विस्कॉन्सिन के अमिश एक अलग ईसाई संप्रदाय था, जिसका उद्भव स्विस अनाबैप्टिस्ट हुआ था, इनका दावा था कि वे अपने बच्चों को अनिवार्य स्कूली शिक्षा नहीं देगें। उन्हें विस्कॉन्सिन वी योडर में अनुमति दी गई थी।

इन सभी मामलों में, यह पता करना बहुत ही मुश्किल है कि वे एक अलग संप्रदाय हैं क्योंकि वे एक संस्थापक के लिए अपनी उत्पत्ति का सुराग लगाते हैं – क्वेकर्स के लिए जॉर्ज और अमिश के लिए जैकब। इन संस्थापकों ने सिद्धान्तों और आचरण के नियमों का एक विशेष सेट बनाया है जिससे मुख्य धारा के कैथोलिक से विवाद उत्पन्न हुआ है। अब पृथ्वी पर सबरीमाला भक्त इस दस्तावेजीकरण के स्तर से मेल खाते हैं? या दही हांडी? या शनि सिंगारपुर? या चिदंबरम? शायद, लिंगायत जैसे नए संप्रदाय, शायद कुछ इयंगर, साबित कर सकते हैं कि वे एक संप्रदाय हैं लेकिन केवल एक सीमित सीमा तक।

तथाकथित संप्रदाय परीक्षण

(1) यह उन व्यक्तियों का संग्रह होना चाहिए जिनके पास एक व्यवस्था के अनुसार विश्वास या सिद्धांतों की एक प्रणाली होनी चाहिए जिसे वे अपने आध्यात्मिक कल्याण के लिए अनुकूल मानते हैं, यानी, एक आम विश्वास है;

(2) आम संगठन, और

(3) एक विशिष्ट नाम से पद

जैसा कि पहले चर्चा की गई थी, मूर्तिपूजक संप्रदाय को अब्राहमिकों के जैसे पूरी तरह से विवाद के रूप में नहीं ढाला जा सकता है। उन मामलों में एक अलग संप्रदाय में विभाजन एक मुख्य विभाजित रेखा का परिणाम है। हिंदुओं में, एक बार किसी अनूठी प्रथा को अपनाया जा सकता है लेकिन दूसरी बार, दूसरों के साथ विलय होता है । सबरीमाला तीर्थयात्रा के उद्देश्य से ब्राह्मण भक्त और वान्नियार भक्त समान हैं – वे एक ही तपस्या का पालन करते हैं, वही पथ लेते हैं, एक जैसे दिखते हैं, एक जैसी इरुमुडी लेते हैं, एक ही देवता पर विश्वास करते हैं, एक जैसा ही भक्ति गीत गाते हैं, एक ही मंत्र पढ़ते हैं, इत्यादि। लेकिन दूसरी बार, वे अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार अलग तरह से पूजा करते हुए वापस जाते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि सबरीमाला एक संप्रदाय नहीं हो सकता है क्योंकि हर बार भक्त एक जैसी प्रथाओं के माध्यम से पूजा नहीं करते हैं।

परीक्षण उलटी तरफ से किया जा सकता है; एक अलग न्यायाधीश द्वारा पारित किया जाना चाहिए। व्यक्तियों का संग्रह? भक्तों के एक आम संगठन के लिए? सबरीमाला कोष्ठी पूरे शहर में हैं। वे विशिष्ट और चिन्हित करने के लिए आसान हैं।गुरुसमिस सबसे बड़े पुजारी हैं, जो दूसरों को सूत्रपात करते हैं। क्या यह पर्याप्त नहीं है? नाम बताएं ? नाम ये रहे: स्वामी शरणम, सबरीमलाई, या सिर्फ ‘मलाई’, या सामी। यह महत्वपूर्ण क्यों है। क्या नाम पंजीकृत होना चाहिए?

बेहतर कानूनी मुद्दे हैं जिन पर संप्रदाय परीक्षण विफल रहता है। हम उन्हें आने वाले दिनों में सामने लेकर आएंगे।

आवश्यक व्यवहार

जैसा कि मैंने एक और #कोर 5 केस का विश्लेषण किया है – जलिकट्टू के फैसले में आक्रामक रूप से अधिक महत्वाकांक्षी होने के कारण असफल होना। एक हिंदू की आवश्यक प्रथाओं को कभी निर्धारित नहीं किया जा सकता, तो क्या किसी विशेष प्रथा के आवश्यक तत्व की जांच की जा सकती है। इसका लक्ष्य केवल एक विशेष सुरक्षा के पीछे छुपी बुराई का पता लगाना होगा और कुछ नहीं। हालांकि, सबरीमाला मामले के सभी चार न्यायाधीश हिंदू “महिलाओं का बहिष्कार हिंदू धर्म की एक अनिवार्य प्रथा है” के सार को निकालने की कोशिश कर रहे हैं।

मिश्रा / कनवालिकर द्वारा इसे देखें:

यह निर्धारित किया जाना चाहिए कि 10 से 50 साल के आयु वर्ग की महिलाओं के बहिष्कार की प्रथा क्या हिंदू धर्म या एक प्रथा के सिद्धांत के बराबर है जिसे हिंदू धर्म का एक अनिवार्य हिस्सा माना जा सकता है और क्या हिंदू धर्म की प्रकृति को बहिष्कृत प्रथा के बिना बदला जा सकेगा। इन विचारों का उत्तर, हमारी विचारधारा में, फर्म नकारात्मक है। किसी भी परिदृश्य में, यह कहा जा सकता है:

यहां क्या हो रहा है वह निम्नलिखित है। न्यायाधीशों को यह पता हो सकता है कि वे सांप्रदायिक पहलू पर खतरे में हैं, और सबरीमाला शायद एक संप्रदाय है। इसलिए वे कहते हैं, “सुनिए, भले ही आप एक संप्रदाय हैं – आपकी प्रथा आवश्यक नहीं है।” यह शिरूर मठ और देवारू मामलों में उदाहरणों के अनुरूप है।

यहां समस्या यह है कि वे एक अपरिहार्य छलांग लगाने की कोशिश कर रहे हैं – यह जांचने से कि क्या सबरीमाला परंपरा के लिए प्रथा आवश्यक है, उन्होंने यह जांचने पर ज्यादा जोर दिया है कि क्या एक हिंदू के लिए प्रथा आवश्यक है। उन्होंने एक काल्पनिक, सामान्यीकृत “हिंदू महिलाओं के बहिष्कार की प्रथा” के रूप में एक कमजोर तर्क तैयार किया। सबसे बड़ा सवाल क्या यह बहिष्कार एक हिंदू के लिए आवश्यक है, वह तो इस मामले का हिस्सा भी नहीं है। यह वह जगह है जहां न्यायिक अनुशासन पापियों को चोट पहुंचाएगा क्योंकि हमारा भाग्य इस तरह के अच्छे भेद और स्विच पर पड़ता है। यह वह जगह है जहां न्यायिक अनुशासन मूर्तिपूजकों को दुख पहुंचाएगा क्योंकि हमारा भाग्य इस तरह के बड़े अंतर और बदलाव पर धोखा दे जाता है। क्या सबरीमाला खुद हिंदू धर्म का एक अनिवार्य हिस्सा है? कोई न्यायाधीश, कल, पूछ सकता है, 80 प्रतिशत इसके बारे में जानते तक नहीं – वे पवित्र हिंदू हैं। यह अब्राहमिक के विपरीत है, अगर आपने यीशु या मैथ्यू या मुहम्मद के बारे में नहीं जानते – तो आप उनके सदस्य नहीं बन सकते हैं।

निष्कर्ष निकालने के लिए, यह निर्णय विश्वास में आधारित एक संपन्न धार्मिक प्रथा से अलग करने का प्रतिनिधित्व करता है। किसी भी महिला भक्त ने शिकायत नहीं की।

एक सक्रीय अदालत को सावधानी बरतनी चाहिए कि उसे एक विरोधी अदालत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, खासकर जब वह जाति से परे तीर्थयात्रा पर फैसला सुना रही हो और सभी हिंदुओं को एकजुट करती हो। इसकी तुरंत समीक्षा की जानी चाहिए, एक अध्यादेश पारित किया जाना चाहिए, या एक संवैधानिक संशोधन विधेयक पेश किया जाना चाहिए।

हमारे #कोर विजन नंवर 5 में, हमने लंबे समय से एक संवैधानिक संशोधन की सिफारिश की है जो जनहित याचिका की प्रक्रिया से इन विभिन्न प्रथाओं को अलग करता है। अब हम आए इस नए फैसले का विरोध करने वाले हमलों की एक अंतहीन धारा की भविष्यवाणी कर सकते हैं। इन हमलों का नेतृत्व बेवकूफ और रणनीतिक ताकतों दोनों के द्वारा किया जा सकता है – इसके परिणामस्वरूप हमारे शानदार और समावेशी धर्म की मृत्यु हो सकती है।

क्या किया जा सकता है?

आदर्श स्थिति केंद्र में एक उत्तरदायी विधायिका का होना है – जो देखती है कि यह आन्दोलन कहां जाता है और हाथ से निकलने  से पहले इन चीजों पर प्रतिक्रिया देती है। लेकिन यहां तक कि विधायी समर्थन के बिना, हम लोगों के बीच संदेश को गंभीरता से फैला सकते हैं और एक अगुवाई बना सकते हैं जो भविष्य में लड़ाइयों को लड़ सकता है। अल्प अवधि में, इस फैसले पर असुविधा के अलावा विश्वास के विश्वासियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

अल्प अवधि में, इस फैसले से आस्था और विश्वास रखने वालों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा बल्कि उनको बस असुविधा होगी। पहले से ही भीड़-भाड़ वाले मंदिर में नारीवादियों की निन्दा के कारण महिलाओं के लिए अलग-अलग कतारों की व्यवस्था करनी होगी। और क्या नहीं। इसका उपयोग शत्रुतापूर्ण पुरुषों और महिलाओं दोनों द्वारा किया जाएगा, जो आस्तिक नहीं हैं लेकिन अब वह सिर्फ अपना विरोध और चुनौती दर्शाने के लिए वहां जाएंगे।

अपने विश्वासियों के हितों की रक्षा के लिए बोर्ड द्वारा क्या किया जा सकता है: एक विशेष दिन घोषित करें जब महिलाओं को आने की अनुमति दी गई हो, उसके बाद देवता की रक्षा के लिए जो भी अनुष्ठान की आवश्यकता हो वह करें। यह प्रशासनिक सुविधा के लिए समझ में आता है। अगर पश्यताप किया जाता है तो क्या न्यायालय हस्तक्षेप करेगा?

एक दूसरा विकल्प यह है कि अन्य धर्मों में निषेध के खिलाफ अदालत में मुकदमें दर्ज करने चाहिए। दुर्भाग्यवश यह आवश्यक है क्योंकि भारत में न्यायशास्त्र का विचार समान अनुप्रयोग और सिद्धांतों पर केंद्रित नहीं है।

वे ईसाई पादरी और मुस्लिम मौलवी से महिलाओं के बहिष्कार को चुनौती देकर कुछ हद तक चीजों को कुछ समय के लिए अलग कर देते हैं I याद रखें कि भारतीय राज्य वास्तव में बहिष्कार के क्षेत्रों को निधि देता है और अंतर्राष्ट्रीय धर्मनिरपेक्ष प्रभाव डालता है। दुर्भाग्यवश, इस तरह के विद्रोह ही शायद एकमात्र तरीका हैं जिससे हम एक नियम को हटा पाने की उम्मीद कर सकते हैं। यूएस जैसे कोर सोसाइटी के साथ इसकी तुलना करें, जहां यूनिफार्म आवेदन इन कानूनों का आधार है। अमेरिका में स्मिथ स्टैंडर्ड में, परीक्षण यह है कि धर्म के बिना किसी रोक टोक के अभ्यास को प्रभावित करने वाले किसी भी नियम को समान होना चाहिए। हम मूल बातों के साथ उलझन में हैं।

हालांकि अंतिम और आधार संरक्षण है – जिसे हम #कोर 1 कहते हैं। कानूनी तौर पर हिन्दुओं को जो असल में हानि पहुँच रही है वह है शिक्षा के क्षेत्र मेंI एक चालू टाइम बम। #कोर 1 के बिना, सबरीमाला में जो भी लाभ हम प्राप्त करते हैं वह क्षणिक होगा। आपके जाने का दिन पहले से ही निर्धारित है I

यह लेख पहली बार रियलिटी चेक इंडिया पर प्रकाशित हुआ था और इसे अनुमति लेकर यहां फिर से प्रकाशित किया गया है।

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