राजनीति / विचार
जब 1950 में रचा गया था सबरीमाला के ‘विध्वंस’ का ‘ईसाई षड्यंत्र’

आशुचित्र-

  • 1950 में सबरीमाला मंदिर में आग लगाने की कोशिश की गई थी और अयप्पा की मूर्ति को भी नुकसान पहुँचाया गया था।
  • जान-बूझकर आग लगाई गई थी इसलिए पुलिस अधिकारी ने कहा कि यह संभव नहीं है कि किसी हिंदू समूह द्वारा ये किया गया हो।
  • पारिस्थितिक संकेत ईसाई समुदाय की ओर इशारा कर रहे थे।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद प्रजनन आयुवर्ग की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर केरला सरकार और भक्तों में संघर्ष जारी है। हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय ने सभी आयुवर्गों की महिलाओं के प्रवेश को अनुमति दे दी है, परंतु इस निर्णय पर समीक्षा की बड़े पैमाने पर माँग हो रही है।

कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में बनी केरला सरकार के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन न्यायालय के निर्णय को लागू करने के इच्छुक नज़र आ रहे हैं और समीक्षा के प्रस्ताव को नकार दिया है। आलोचक कहते हैं कि न्यायालय के दूसरे निर्णयों को लागू करने में मुख्यमंत्री ने ऐसी तत्परता नहीं दिखाई है। सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार (23 अक्टूबर) को कहा कि निर्णय के समीक्षा की सुनवाई 13 नवंबर को होगी।

दूसरी तरफ, बहुसंख्या में भक्तों ने प्रजनन आयुवर्ग की महिलाओं के प्रवेश का विरोध किया है क्योंकि इससे अयप्पा का ब्रहम्चर्य भंग होगा और उनका कहना है कि यह तीर्थस्थल की महत्ता को कम करने की एक साज़िश है। उनका तर्क 1950 के सबरीमाला मंदिर आगजनी केस पर अपराध जाँच विभाग के उप-महानिरीक्षक के.केशव मेनन द्वारा दर्ज की गई जाँच रिपोर्ट है।

यह मामला एक मंदिर कर्मचारी द्वार श्रीकोविल (मुख्य मंदिर), मंडपम और भंडार कक्ष में 14 जून 1950 को आग लगाने का है। इस आग के पीछे के रहस्य के खोलना चुनौतीपूर्ण था क्योंकि मंदिर 20 मई से 16 जून 1950 तक बंद किया गया था और कर्मचारी मंदिर खोलने की तैयारियों के लिए भीतर गया था। परेशान करने वाली बात यह है कि इस आग से अयप्पा की मूर्ति को भी नुकसान पहुँचा था।

जो पुलिस दल जाँच करने गया था, उसने पाया कि मंदिर के द्वार पर 15 प्रचंड प्रहार थे। मेनन ने कहा कि ये मंदिर में ज़बरदस्ती घुसने की कोशिश से हुए होंगे। मूर्ति का सिर तोड़ा गया था, मूर्ति की हथेली से उंगलियाँ अलग कर दी गई थी और मुख व ललाट पर प्रहार के निशान थे। मेनन ने कहा कि दल का निष्कर्ष था कि मूर्ति तोड़ने का प्रयास एक कुल्हाड़ी से किया गया था, जो घटना स्थल से प्राप्त हुई थी।

पुलिस अधिकारियों ने सीधे यह कहा था कि मंदिर की आग एक दुर्घटना नहीं थी। उन्होंने किसी प्रकार की लूट की बात को नकार दिया क्योंकि कोई भी आभूषण व कीमती सामान चोरी नहीं हुआ था। आगजनी जान-बूझकर की गई थी इसलिए यह संभव नहीं है कि यह किसी हिंदू समूह द्वारा किया गया हो।

इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि ईसाई उस क्षेत्र से परिचित थे और पहाड़ी की तल में ही रहते थे, कोई हिंदू समूह ईसाइयों की जानकारी में आए वहाँ नहीं जा सकता था। दूसरी करफ, ईसाई हिंदू मंदिरों व मूर्तियों का सम्मान नहीं करते हैं तो सांकेतिक साक्ष्य उनकी तरफ ही इशारा कर रहे हैं।

आगजनी षड्यंत्र के पीछे ईसाइयों की भूमिका मानने के लिए मेनन का कारण था कि सबरीमाला जिस क्षेत्र से घिरा हुआ था, उसे हिंदू अयप्पा का उद्यान मानते थे और ईसाइयों द्वारा उस क्षेत्र में जंगली जानवरों के शिकार का विरोध करते थे। महात्मा गांधी द्वारा सभी जातियों के मंदिर में प्रवेश के आह्वान से कई सालों पहले से सबरीमाला मंदिर में ब्राह्मण और निचली जाति के लोग कंधे से कंधा मिलाकर जाते हैं, पुलिस अधिकारी ने कहा। इसके कारण ईसाइयों की दरिद्र हिंदुओं को प्रभावित कर धर्म परिवर्तन करवाने की कामना पूर्ण नहीं हो पा रही थी।

हिंदू महामंडल के गठन और इसके नेताओं की विवादास्पद टिप्पणियों के कारण हो सकता है कि अयप्पा मंदिर में आगजनी को प्रोत्साहन मिला हो। मेनन ने कहा कि उन्होंने इस मामले की जाँच एक सामान्य मामले की तरह की थी और जाँच-पड़ताल से उद्देश्य साफ हो गया। जाँच दल को घटना की तारीख का पता लगाने में मुश्किल हुई लेकिन जाँच के बाद 26-27 मई 1950 की तारीख का अंदाज़ा लगाया गया (मलयालम माह ‘एदवम’ का सातवाँ-आठवाँ दिवस)।

चार समूह जो आगजनी की अवधि में मंदिर के आसपास की सूची बनाकर मेनन ने कहा कि कुछ ईसाई शिकारी मंदिर के आसपास थे और आगजनी वे आगजनी के दोषी हो सकते हैं। जिनसे पूछताछ की गई थी उन्होंने मजिस्ट्रेट के सामने कहा कि वे मंदिर के भीतर नहीं गए थे लेकिन उस क्षेत्र में उनकी स्थिति संदेह उत्पन्न करती है। लेकिन दोष-स्वीकृति न होने की स्थिति में पुलिस कोई कार्रवाई नहीं कर पाई। मेनन ने कहा कि दो लोग- कुन्हुपप्पन और पैली- जो इस कांड के द्रष्टा थे, अचानक 29 और 30 मई 1950 को बीमार पड़ गए और यह बात षड्यंत्र की ओर इशारा करती है। विशेषकर कि पैली जिसने कहा कि वह एक सप्ताह से बीमार था पर 29 मई को अस्पताल गया जो उसे शक के घेरे में लाती है। पैली का घर अस्पताल से समीप था और उसने डॉक्टर से कहा कि वह रन्नीकोविल नामक दूसरी जगह पर बीमार पड़ा था।

दूसरी जगह पर पैली ने कहा कि वह माथंबा में था। उसके अधिकारी ने कहा कि पैली बीमार नहीं पड़ा था और बिना अनुमति के कार्यस्थल से अनुपस्थित था। माथंबा संपदा के कर्मचारी वर्गीज़ नेअधिकारी से कहा कि वह पैली की अनुपस्थिति को क्षमा कर दें। मेनन ने कहा कि संदिग्ध मे अपनी अन्यत्र उपस्थिति को सिद्ध करने का प्रयास किया अस्पताल में अपनी बीमारी का रिकॉर्ड डलवा लिया।

मेनन ने कहा कि पैली ने शिकारियों के साथ होने की बात इसलिए कबूल नहीं की क्योंकि उसे किसी बड़े अपराध की ग्लानि थी। पुलिस को शक था कि पैली अयप्पा श्रीकोविल, मंडपम और भंडारगृह की आगजनी कांड में सम्मिलित था। एक द्रष्टा के रूप में पैली आगजनी को रोक सकता था, या कम-से-कम उसे अपराधियों की थोड़ी जानकारी तो होती ही।

पैली को साथ ही कुन्हुपप्पन का बीमार होना भी अजीब और संदेहास्पद था, हालाँकि पुलिस ने बताया कि पूछताछ के दौरान उसके जवाब संतोषजनक थे। मेनन ईसाई शिकारियों की इस बात से असंतुष्ट थे कि उन्होंने कहा था कि वे जंगल में अपने मालिक के परिवार की शादी के लिए इलायची लेने आए थे।

दूसरे व्यक्ति, ऑसेफ़ ने बताया कि अपने मालिक के पास लौटकर उन्होंने कहा कि उन्हें जंगल में इलायची के पौधे नहीं मिले, पूर्णतः अयप्पा मंदिर से संबंधित उनके कृत्यों या जानकारी को छिपाने के लिए बनाई गई कहानी थी।

प्रश्न यह था कि जब वहाँ इलायची के पौधे थे ही नहीं तो इतने बड़े दल को भेजने की क्या आलश्यकता थी। जिस मालिक की बात की जा रही है, वह आसानी से अपने भाई के बगीचे से इलायची ले सकता था।

इसका मतलब यह है कि ऑसेफ़ और उसे साथी जंगल में इलायची के लिए नहीं बल्कि किसी और उद्देश्य से गए थे। मेनन ने कहा कि इस बात का यही निष्कर्ष है कि वे अपने अपराध को सहभागिता के लिबास में लपेटकर प्रस्तुत कर रहे थे। अन्यथा उन्हें मंदिर के पास उनकी उपस्थिति की सफाई देनी होती और अपनी गतिविधियाँ समझानी होती। ऑसेफ़ और उसके साथियों की कहानी मनगढ़ंत लगती है जो किसीके बचाने के लिए बनाई गई थी।

इन शिकारियों की एक और बात पुलिस को अजीब लगी। कुन्हुपप्पन ने कहा कि शिकार पर आने से पहले उन्होंने 50 रुपए का सामान उधार पर लिया था लेकिन ऑसेफ़ ने कहा कि उनके पास नकद था। मेनन ने कहा कि जिस दुकान से उन्होंने सामान लिया था उसमें पूरे सामान की राशि मात्र 20 रुपए थी और दुकानदार ने समूह को सामान देने की बात नकार दी थी।

मेनन उसी वर्ष जनवरी की एक अजीब बात बताते हैं जो सबरीमाला मंदिर के विध्वंस की योजना की ओर इशारा करता है। ऑसेफ़ ने कहा कि वह छः ईसाई बगीचा मालिकों के साथ इरुमेली से कालाकेट्टी जीप से गया था, जहाँ से उसका दल कोल्लामूज़ी तक पैदल गए थे और वहाँ विश्राम किया था। अपने कर्मचारियों को जंगल में शिकार के लिए भेजकर ऑसेफ़ अपने छः साथियों के साथ एक चर्च की तलाश में निलक्कल गए थे।

पुलिस ने कहा ऐसी खोज आश्चर्यजनक है क्योंकि या तो वे स्वयं चर्च स्थापित करना चाह रहे थे या उस स्थान पर चर्च का अस्तित्व सिद्ध करना चाह रहे थे। सबरीमाला के आसपास चर्च देखने की इच्छा इन मालिकों में बहुत गहरी थी और निलक्कल जाने का कोई उद्देश्य नहीं था।

दरिद्र और निचली जाति के हिंदुओं के सबरीमाला जाने से ईसाई परेशान थे और इसे रोकना चाहते थे, अन्यथा निम्न जातियों के हिंदुओं को ईसाई बनाने की क्रिया रुक जाती। पुलिस ने कहा कि इस माध्यम से लंबे समय में ईसाई इस क्षेत्र में अपना उपनिवेश स्थापित कर इस संपन्न क्षेत्र का लाभ उठा सकते थे।

मेनन ने कहा कि खेल संघ के एक रेंजर ने इन बगीचा मालिकों के परिवार के एक सदस्य के.टी. अब्राह्म की सबरीमाला क्षेत्र में मार्च, अप्रिल और मई माह में गतिविधियाँ रिपोर्ट की थी। पुलिस ने कहा कि जब एक समान पृष्ठभूमि से देखा जाए तो आगजनी कांड और निलक्कल भ्रमण इशारा करते हैं कि इन गतिविधियों का संबंध सबरीमाला को नुकसान पहँचाने से था।

मेनन ने संदिग्ध लोगों के बयानों से यह निष्कर्ष निकाला कि निस्संदेह यह अपराध कट्टर विचारों से प्रभावित था और कट्टरता फैलाने के उद्देश्य से ही किया गया था। पुलिस संदिग्धों को गिरफ्तार कर सकती थी लेकिन इसके आगे की कार्रवाई में कई परेशानियाँ थी इसलिए इसने अपनी कार्यवाही को ताक पर रख दिया। अपराध के कुछ दिनों में ही बरसात के कारण जाँच दल की परेशानियाँ बढ़ गईं और वे बस कुन्हुपप्पन और ऑसेफ़ जैसे लोगों पर शक करके रह गए।

रोचक बात है कि खंडित मूर्ति को अयप्पा की जिस मूर्ति से प्रतिस्थापित किया गया वह, नास्तिक डी.एम.के. मंत्री पी.टी.आर. पलानीवेल राजन के पिता और पार्टी के मदुरई सेंट्रल के सांसद पी. तियागराजन के दादा, पी.टी.राजन द्वारा बनाई गई थी। दुर्भाग्यवश इस विषय में राजजन द्वारा के कई पत्रक प्रकाशित किए जाने के बावजूद त्रवणकोर देवास्वोम बोर्ड (टी.बी.डी.) अपनी वेबसाइट पर इसका उल्लेख नहीं करता। इस विषय में तियागराजन  द्वारा केरला मुख्यमंत्री विजयन और टी.बी.डी. को भेजे गए पत्र पर कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है।