राजनीति
विश्व हिन्दू कांग्रेस – ऑड्रे ट्रुश्के और उनके विचारात्मक भाई-बहन का हिन्दूओं से भय अब सबके सामने है
विश्व हिन्दू कांग्रेस

प्रसंग
  • ऑड्रे ट्रुश्के के विचारात्मक भाई-बहनों को पता है कि अपने हिन्दू के प्रति डर के साथ किस तरह से छल करना है। विश्व हिन्दू कांग्रेस ने संदेह से परे इसे साबित कर दिया है

पिछले पखवाड़े में हिन्दुओं से भय ग्रस्त लोग और हिन्दू-आलोचक प्रभाव में थे, क्योंकि शिकागों में विश्व हिन्दू कांग्रेस (डब्ल्यूएचसी) का 7-9 सितंबर को आयोजन किया गया था। समारोह में संबोधन करने के लिए आमंत्रण स्वीकार करने वाले लोग (उदाहरण के लिए तुलसी गबार्ड,  हवाई से अमेरिकी कांग्रेस महिला) इन सुझावों से डर रहे थे कि वे हिंसक हिन्दुत्व का समर्थन कर रहे थे और उन्होंने स्वीकार किया था कि (इलिनॉइस से कांग्रेसी नेता राजा कृष्णमर्ति) विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद के प्रसिद्ध भाषण की 125वीं वर्षगांठ पर समारोह में भाग लेने के लिए वे स्वयं को दोषी महसूस कर रहे थे।

चार सालों में एक बार आयोजित होने वाली कांग्रेस श्रृंखला में इस साल ये दूसरा है, ने सभी हिन्दुओं को एकजुट होकर अपनी सामान्य समस्याओं पर चर्चा करने और अपनी अनूठी सभ्यता तथा संस्कृति का जश्न मनाने की अनुमति दी, जिसने कई लोगों को परेशान कर दिया। यहाँ तक कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने डब्ल्यूएचसी से अपनी दूरी बरकरार रखी है (पूर्व भाजपा मंत्री और उपराष्ट्रपति वेकैंया नायडू इसमें एकमात्र महत्वपूर्ण आधिकारिक प्रतिभागी थे), अतिरिक्त दिलचस्पी के कारण प्रतिनिधि पंजीकरण को निर्धारित समय सीमा से पहले ही रोक दिया गया था और समारोह के उन तीन दिनों के दौरान होने वाली भीड़ के कारण लोगों को अन्य कमरों मे तक बिठाना पड़ गया था, ये सब कांग्रेस की अप्रत्याशित सफलता थी।

एक तरह से देखा जाए तो यह उम्मीद की जा रही थी कि विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) और अमेरिकी हिन्दू स्वयंसेवक संघ द्वारा आयोजित और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत द्वारा संबोधित कार्यक्रम से कुछ खुराफाती तत्व और हिन्दू विरोधी कार्यकर्ता सामने आएंगे। भारत में हिन्दुओं से भय जीवित है और “(बीमार) वामपंथी उदारवादी” प्रतिष्ठान और मीडिया के बड़े वर्गों को लात मार रहा है (देखिए कि लुटियंस मीडिया के अनुभागों द्वारा डब्ल्यूएचसी में एक अलग कार्यक्रम को कैसे रिपोर्ट किया गया है, यहाँ, यहाँ और यहाँ, और किस तरह से इस आकर्षक दायरे के बाहर के लोगों ने इस समारोह की सूचना दी – यहाँ, यहाँ, यहाँ और यहाँ पढ़ें। इस हिन्दुओं से भय खाने वाले नेटवर्क को पश्चिम में अमेरिकी दक्षिण पंथी (जो धार्मिक रूपान्तरणों को रोकने के लिए किसी भी हिन्दू दावे या प्रयास का विरोध करेगा) और वामपंथी (जो हिन्दू धर्म को राक्षस बनाना पसंद करता है लेकिन कभी भी कोई अब्राहिमिक धर्म नहीं) ईसाईयों के असामान्य संयोजन द्वारा वित्तीय और मीडिया का समर्थन दिया गया था।

यह डब्ल्यूएचसी आयोजकों की बुजदिली के लिए बहुत कुछ बोलता है कि उन्होंने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। हिन्दुत्व के मानक धारकों के कथित “हिंसक” रवैये के लिए बहुत कुछ है।

डब्ल्यूएचसी पर हमले का नेतृत्व करने वाले हिन्दुओं से‌ भय खाने वाले में ऑड्रे ट्रुश्के आमतौर पर सबसे संदेहास्पद थीं, जिन्होंने औरंगजेब के रक्तपातित हाथों को धोने के लिए अपने अकादमिक करियर को समर्पित कर दिया, उन्होंने कभी भी यह ध्यान नहीं दिया कि ऐतिहासिक साक्ष्य के वजन के सामने जोरदार एसिड भी उनकी मदद नहीं कर सकते। इस कट्टरवादी इस्लामिक व्यक्ति के हिन्दू विरोधी शासन को छिपाने के लिए उनके प्रयास उन लोगों को प्रयासों से मेल खाते हैं जो इतना ही हिन्दुओं को सम्मान देते थे। हिन्दुत्व को आघात पहुँचाने का उनका बड़ा योगदान तब सामने आया जब उन्होंने “अग्निपरीक्षा” के दौरान सीता द्वारा राम की निंदा का “दोषपूर्ण” अनुवाद किया। ट्रुश्के का दावा है कि वाल्मीकि रामायण में, “अग्निपरीक्षा के दौरान सीता, राम को स्त्री जाति से भेद करने वाला जानवर और असभ्य बताती है।”. केवल अपने व्यवहारिक ज्ञान से ही यह बात पता चल जाएगी कि इस तरह की भाषा उस युग की साहसी महिलाओं के लिए भी असंभव थी, यहां तक कि राम‌ के फैसले पर सीता के क्रोध पर भी यह असंभव थी। दोषपूर्ण अनुवाद करने के लिए कई विद्वानों द्वारा ट्रुश्के की आलोचना की गई थी। स्पष्ट है, उनकी हिन्दू विरोधी कट्टरता कथित छात्रवृत्ति से बेहतर हो गयी, जो बाद में साक्ष्य में ज्यादा नहीं रही।

इस प्रकार, जब डब्ल्यूएचसी का आयोजन हुआ तो ट्रुश्के सवालों के जवाब देने में सबसे पहले पहुंचीं।ट्विटर पर, उन्होंने उन लोगों की सराहना की जिन्होंने इस समारोह मे जाने से इंकार कर दिया था और इसमें जाने वालों को “नफरत करने वाले” कहकर संबोधित किया। उन्होंने कहा कि जो विद्वान इसमें भाग लेने के लिए जा रहे हैं उन्हें “खुद पर शर्मिंदा” होना चाहिए। अपनी कट्टरता का समर्थन करने के लिए, उन्होंने हिन्दुओं से भय खाने वालों की भावनाओं में बहते हुए दावा किया कि हिन्दुत्व हिन्दू धर्म नहीं है। वास्तव में? राजनीतिक हिंदुत्व धर्म हिंदू नहीं है, जबकि राजनीतिक इस्लाम और राजनीतिक ईसाई धर्म हर जगह वैध हो सकता है और मुख्यधारा में हो सकता है? ट्रुश्के के कट्टरवादी ट्वीट को कुछ लोगों से घातक समर्थन प्राप्त हुआ जिसमें से एक पाकिस्तानी हैंडिल (@devigoes4Alpha) है। “शर्मनाक है कि कुछ भारतीय अमेरिकी इन समारोहों का समर्थन करते हैं। मुझे उम्मीद है कि वे और उनके बच्चे # बड़ी टोपी पहने हुए बहुसंख्यक स्वदेशी के द्वारा # कानसास शहर के #ओलाथे बार में मारे जाएं।”

एक और विद्वान लेखक वेंकट धुलिपाला, जिनको ट्रुश्के शर्मिंदा करने की कोशिश कर रहीं थीं, ने शानदार ढंग से शोध करके पुस्तक लिखी है, “क्रिएटिंग अ न्यू मदीना” जिसमें 1947 के बाद “धर्मनिरपेक्ष” की कहानी को झूठा करार दिया कि मुहम्मद अली जिन्ना इस्लामी पाकिस्तान नहीं चाहते थे। धुलीपाल ने इस परिकल्पना को अस्वीकार कर दिया कि पाकिस्तान के निर्माण का जिन्ना का सपना सोच-समझा था, और देवबंद के कई प्रमुख मुस्लिम मौलाना तथा उस समय के अन्य प्रमुख मुस्लिम राजनेताओं ने इस विचार का समर्थन किया और इस पर जोर दिया कि पाकिस्तान के विभाजन का विचार पहले से ही अच्छी तरह से सोच समझकर बनाया गया था, और यह हमेशा इस्लामी धर्मतन्त्र के बारे में था। एक राज्य का, जो एक मुस्लिम गढ़ के रूप में पूर्व स्वतंत्रता, भारत से अलग होने का विचार ठीक उसी तरह की तर्कसंगतता के आधार पर लिया गया था जैसे पैगंबर ने मदीना से भागने का फैसला लिया था: अपनी ताकत बढ़ाने के लिए, और मक्का को फिर से पाने के लिए अपना समय बिताने के लिए था। ट्रुश्के का धुलिपाला पर अप्रत्यछ रूप से बकवास करना उनकी हिंदुओं से भय का हिस्सा है।

21वीं शताब्दी के हिंदुओं से भय खाने वालों की एक प्रमुख विशेषता खुद को “वास्तविक हिंदू धर्म” के बचावकर्ता के रूप में चित्रित करना है, इस प्रकार वे स्वयं को हिंदुत्व को “अन्य”, जो अपमानजनक और बुरा हो सकता है, के रूप में चित्रित करने की इजाजत देते हैं। ट्रुश्के की इस रणनीति के बाद दो अन्य डब्ल्यूएचसी को नुकसान पहुंचाने वाले, अवाज, जो एक वकालत मंच है, के साथ, जिन्होंने भारी भुगतान करके शिकागो ट्रिब्यून में विज्ञापन लगवाया था, जिसमें स्वामी विवेकानंद की तस्वीर पूरे पृष्ठ पर छपी थी। इस विज्ञापन ने असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (एनआरसी) पर सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी के लिए प्रवृत्त संदर्भ दिए और स्वामी को अपने अनिवार्य रूप से हिंदू विरोधी बनाने के लिए कट्टरपंथ पर उद्धृत किया। यह उनको सीमित तरीके से उद्धृत करता है: “सांप्रदायिकता, कट्टरता, और … धर्मान्धता, लंबे समय से इस खूबसूरत धरती पर कब्जा किए हुए है। लेकिन उनका समय आ गया है … ।“

उद्धरण हिंसक हिंदुत्व (डब्ल्यूएचसी निश्चित रूप से ऐसा नहीं कर रहा था, लेकिन सच्चाई आपकी पसंदीदा झूठी कथाओं में क्यों दखल दे?) की प्रशंसा करने वालों की कथित कट्टरता पर निर्देशित प्रतीत होता है, लेकिन इसे इसके पूर्ण संदर्भ में देखे बिना यह अर्थहीन है। स्वामी जिसने हिंदू धर्म को फिर से जीवंत किया था, वास्तव में सच्चाई और ईश्वर की ओर अपने मार्ग को खोजने के लिए हर धार्मिक विश्वास प्रणाली के अधिकार के बारे में बात करते हैं। वह अप्रत्यक्ष रूप से सच्चाई और ईश्वर के विशिष्टवादी रूपों को झूठा ठहरा रहे थे।

उन्होंने जो कहा उसका पूरा संदर्भ यहां दिया गया है, और संसद के समापन सत्र में उन्होंने जो कहा उससे उद्धरण, धार्मिक वा्रतालाप की जरुरतों को पूरा करने के लिए काफी हैं।

11 सितंबर, 1893 को अपने जोरदार भाषण में स्वामी विवेकानंद ने कहा, “वर्तमान सम्मेलन” ”जो आज तक के सबसे पवित्र समारोहों में से है, गीता में बताए गए इस अद्भुत सिद्धांत का प्रमाण है – जो भी मुझ तक आता है, चाहे फिर वह कैसा भी हो, मैं उस तक पहुंचता हूँ लोग चाहे कोई भी रास्ता चुनें, आखिर में मुझ तक ही पहुँचते हैं। सांप्रदायिकताएँ, धर्मान्धता और इसके भयानक वंशज हठधमिर्ता लंबे समय से इस खूबसूरत पृथ्वी को अपने शिकंजों में जकड़े हुए हैं। इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है। कितनी बार ही यह भूमि खून से लाल हुई है। कितनी ही सभ्यताओं का विनाश हुआ है और न जाने कितने देश नष्ट हुए हैं। अगर ये भयानक दैत्य नहीं होते तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता, लेकिन अब उनका समय पूरा हो चुका है। मुझे पूरी आशा है कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद सभी हठधर्मिताओं, हर तरह के क्लेश, चाहे वे तलवार से हों या कलम से और सभी मनुष्यों के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेंगे।”

तलवार और कलम का संदर्भ स्पष्ट है: यह उत्पीड़न के माध्यम से रूपान्तरण के बारे में है, और कलम अन्य धर्मों, विशेषकर हिंदू धर्म के बारे में, कुछ आपत्तिजनक कहने के लिए नहीं है। असल में, स्वामी विवेकानंद ने ट्रुस्के के सत्य के एक संस्करण को मिटा दिया होगा। वे विश्व हिंदू कांग्रेस में शामिल हुए थे भले ही वह कुछ बिंदुओं पर आयोजकों से असहमत रहे हों।

स्वामी जी की बातों के तात्पर्य के बारे में किसी संदेह की अवस्था में, जब उन्होंने 27 सितंबर 1893 को फिर से बात की तो इसको पूर्णरूपेण स्पष्ट करते हुए रेखांकित कियाः “धार्मिक एकता के आधार के बारे में बहुत कुछ कहा गया है। मैं अपने खुद के सिद्धांत के बारे में नहीं बताना चाहता।

लेकिन यहाँ पर अगर कोई आशा करता है कि यह एकता सभी धर्मों में से किसी एक की जीत होने और अन्य धर्मों के नष्ट हो जाने से आएगी, तो उसके लिए मैं कहता हूँ, ‘आपकी आशा पूरी होना असंभव है।’ क्या मैं चाहता हूं कि ईसाई हिंदू बन जाए? भगवान न करे। क्या मैं चाहता हूं कि हिंदू या बौद्ध ईसाई बन जाएं? भगवान न करे।”

संक्षेप में, स्वामी ने जिस सांप्रदायिकता के बारे में बात की थी वह थी विरोधी धर्मों की कटु आलोचना करने और मूर्खतापूर्ण धर्म परिवर्तन को स्वीकार करने की सांप्रदायिकता। इसी पद्धति को आज विहिप और आरएसएस अपनाते हैं और वे निश्चित रूप से विवेकानंद की विचारधारा से अलग/भिन्न नहीं हैं।

आवाज ने विहिक की छवि खराब करने के लिए स्वामी के उद्धरण का स्पष्ट रूप से दुरुपयोग किया, और असम एनआरसी पर इसका ध्यान इस सिद्धांत की और अधिक पुष्टि करता है। विज्ञापन में पढ़ें- “भारत के असम राज्य में लाखों लोगों का, विशेषरूप से मुस्लिमों का वर्गीकरण “प्रवासियों” के रूप में किया जाता है, भले ही वे दशकों से, यहाँ तक कि पीढ़ियों से भारत में रहकर काम कर रहे हैं। यदि प्रधानमंत्री मोदी और उनके समर्थक यह धारा नहीं बदलते हैं, तो 40 लाख (4 मिलियन) लोग सांप्रदायिकता और धर्मांधता, जिनके बारे में विवेकानन्द ने एक शताब्दी पूर्व ही आगाह कर दिया था, के कारण भारतीय नागरिकता और मूल अधिकार से वंचित रह जाएंगे।”

विज्ञापन इस उपदेश के साथ समाप्त होता है, “जिन्हें किसी भी देश की नागरिकता नहीं प्राप्त है उन 40 लाख (4 मिलियन) लोगों को न छोड़िए।

सबसे बुरी बात यह कि, “दुनिया देख रही है।“

यह विज्ञापन ‘सच्चाई का दमन, झूठ का ढिंढोरा’ का एक अनोखा उदाहरण है। इसका मतलब है- सच्चाई को दबाकर सफेद झूठ को स्वीकार करना।

एनआरसी के अंतिम प्रारूप में 40 लाख लोगों को बाहर कर दिए जाने के दावे में अधिकतर मुस्लिम संदिग्ध हैं, जिसके लिए एनआरसी ने बहिष्कार की धार्मिक संरचना का विवरण नहीं दिया है। वास्तव में, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का दावा है कि बहिष्कृत लोगों में 25 लाख लोग हिंदू बंगाली और 13 लाख लोग मुस्लिम बंगाली हैं।

यदि बनर्जी की बात सही है तो आवाज का तर्क साफ तौर पर गलत है। निर्वासित लोगों में ज्यादातर लोग हिंदू हैं न कि मुस्लिम।

दूसरा उल्लेखनीय बिंदु है आवाज के विज्ञापन का दावा। दावा यह है कि 40 लाख लोगों को एनआरसी से बाहर करने का काम मोदी सरकार का है। हालांकि यह निश्चित रूप से पार्टी की विचार पद्धति है कि बांग्लादेश से आए हुए सभी अवैध प्रवासियों की पहचान की जानी चाहिए और यदि संभव हो तो उन्हें निर्वासित (बांग्लादेश द्वारा उन्हें वापस स्वीकार न करने पर निर्वासन नहीं होगा।) किया जाना चाहिए। विज्ञापन में ऐसा कोई जिक्र नहीं किया गया है कि कानून के तहत असम में एनआरसी सूची संकलित की जा रही है, और सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसकी जाँच की जा रही है। इसलिए, गैरकानूनी लोगों के पास कोई कानूनी उपाय नहीं है इसलिए पहचान होते ही उनको अस्वीकार कर दिया जाएगा और ऐसा इसलिए किया जाएगा क्योंकि मोदी सरकार गैरकानूनी अप्रवासियों को निर्वासित करना चाहती है। एनआरसी को मुस्लिम विरोधी बनाने के लिये फिर से सबसे अहम बात छोड़ दी गई थी।

इससे भी बदतर बात यह है कि हिंदू अप्रवासियों, जो इस्लामिक बांग्लादेश में उत्पीड़न के शिकार होने के कारण यहाँ भागकर आए थे, और मुस्लिम अप्रवासियों, जो बेहतर आजीविका की तलाश में सीमा पार आ गए, के बीच अंतर करने का कोई प्रयास नहीं है। थोड़ा आश्चर्यजनक तथ्य है कि इन अप्रिय सच्चाइयों को छिपा दिया गया और एनआरसी डब्ल्यूएचसी को हराने वाली एक छड़ी बनकर रह गई। कुल मिलाकर, यह एक “हिंदू” जनसमूह है और सभी “हिंदू” अपराधों के लिए ज़िम्मेदार है, भले ही वे जिसकी मांग कर रहे हैं वह अवैध प्रवासन पर कानूनों के प्रवर्तन की मांग से ज्यादा कुछ नहीं हो। विवेकानंद उद्धरण का दुरुपयोग क्यों न किया जाए अगर यह शिकागो में हिंदू-झुकाव में मदद करता है?

हिंदूफोबिया के तीसरे भाग को समारोह में ही देखा गया था, जब कुछ उपद्रवी घुसपैठ करने में कामयाब हो गये (अवैध रूप से कोई जुड़ सकता है, क्योंकि सम्मेलन केवल पंजीकृत प्रतिनिधियों के लिए खुला था) और उद्घाटन समारोह के समापन के समय आरएसएस की “तानाशाही” पर हंगामा खड़ा कर दिया। जिस समूह ने शिकागो साउथ एशियन्स फॉर जस्टिस नामक एक संगठन से संबंधित होने का दावा किया था, उसने पुलिस की मदद के साथ होटल के सुरक्षा कर्मचारियों द्वारा बाहर निकाले जाने से पहले बैनर दिखाते हुए नारेबाजी की।

उपद्रव करने वाले लोग यदि भारत विरोधी नहीं थे तो स्पष्ट था कि वे स्पष्ट रूप से हिंदू विरोधी थे: कोई भी भारतीय समूह खुद को दक्षिण एशियाई नहीं कह सकता है जब तक अधिकांश सदस्य या सदस्यों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा गैर-भारतीय नहीं होता है। दूसरे, समूह ने यह नहीं बताने के लिए कि वे कौन थे, पूरी तरह से बनावटी तर्क दिया। होटल वेस्टिन लोम्बार्ड में सुरक्षा कर्मियों द्वारा बाहर कर दिए जाने के बाद एक पीड़ित के बयान में कहा गया कि, जहाँ विश्व हिंदू कांग्रेस का आयोजन हुआ था, उन्हें वहाँ यह कहना था: “हमने यह तय करने में काफी समय लगाया कि क्या हमारे साक्ष्यों के साथ हमारे नाम शामिल करना है और अंततः उन लोगों, जो हमला करना, चोट पहुँचाना और यहाँ तक कि संभवतः हमें मारना चाहते हैं, से आसन्न प्रतिक्रिया के खिलाफ खुद को बचाने के लिए इसके खिलाफ फैसला किया। हालांकि हम फिर से दोहराना चाहते थे कि हम में से कई जाति विशेषाधिकार के साथ हिन्दू परिवारों से हैं जो हिंदुत्व के आतंकवादी राष्ट्रवाद को पहचानते और अस्वीकार करते हैं।”

इस तथ्य को छिपाने का क्या दयनीय प्रयास है कि प्रदर्शनकारियों में से अधिकांश या तो हिंदू नहीं थे, या हिंदू अपनी विरासत से शर्मिंदा थे। और यह दिखाने का नाटक करना कि अमेरिकी हिंदू उन पर हमला करेंगे, इसका मतलब है कि उन्हें अमेरिकी कानून में भी विश्वास नहीं है।

5ऑड्रे ट्रुश्के के  विचारात्मक भाई बहन जानते हैं कि उनकी हिंदूफोबिया को कैसे छिपाना है। विश्व हिंदू कांग्रेस ने निःसंदेह यह साबित कर दिया है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वह @TheJaggi पर ट्वीट करते हैं।