राजनीति
कैसे खत्म होगी मेवात में मलेरिया से लड़ाई?

प्रसंग
  • अकेला नूह (या मेवात) जिला राज्य में मलेरिया के दो-तिहाई मामलों का जनक है।
  • स्वराज्य ने समस्या को समझने के लिए नूह के सबसे ज्यादा प्रभावित गांवों का दौरा किया।

 

यह संकट का संकेत है कि हरियाणा के नूह (पहले मेवात) जिले के उजिना में प्रवेश करने पर हमसे मिलने वाला पहला निवासी ही मलेरिया का एक रोगी निकलता है।

43 वर्षीय मोहन सिंह ने तीन दिनों तक लगातार बारिश के बाद थरथराना शुरू कर दिया। उन्होने जल्द ही खुद को तेज बुखार में जकड़ा हुआ पाया। मंगलवार (24-जुलाई-2018) को मौसम साफ होने के साथ मोहन अपने घर के बाहर बैठे हुए धूप सेंक रहे थे लेकिन इतने कमजोर थे कि बात करने में भी सक्षम नहीं थे। उनके पड़ोसी मदन सिंह ने कहा, “घर-घर में बुखार है। हर साल वही कहानी।”

उजिना इस जिले में सबसे बुरी तरह प्रभावित क्षेत्र है जो हरियाणा में मलेरिया के बोझ का दो-तिहाई हिस्सा है। यह नूह की 13 लाख आबादी में से 9 प्रतिशत आबादी का घर है लेकिन जिले में मलेरिया के मामलों में 75 प्रतिशत मामले यहीं के हैं।

पिछले साल, सरकारी प्राथमिक स्वस्थ्य केंद्र (पीएचसी) ने नूह, जहां 13 पीएचसी हैं, में मलेरिया के कुल 3643 मामलों में से 2468 मामले उजिना में दर्ज किए। यहाँ तक कि इस साल भी उजिना में पीएचसी ने जुलाई के मध्य तक नूह में 492 मामलों में से 350 मामले यहाँ होने की सूचना दी।

मदन सिंह कहते हैं, मलेरिया के मरीजों की वास्तविक संख्या कई गुना ज्यादा है जैसा कि अधिकांश निवासी निजी चिकित्सकों के पास चले जाते हैं।

निवासियों का कहना है कि वे शामों से डरते हैं। पास के ही रानिका गाँव के एक निवासी आरिफ मोहम्मद का कहना है कि “मैं शर्त लगा सकता हूँ कि आप यहाँ एक रात नहीं काट पाएंगे। यहाँ बहुत ज्यादा मच्छर हैं।”

उजिना और पूरे नूह को क्या बीमार करता है?

उजिना और नूह में यह प्रकोप कारकों के संयोजन का परिणाम है लेकिन यह उजिना नाले में गंदा और स्थिर पानी है जो क्षेत्र में मच्छरों से पैदा होने वाली बीमारियां लेकर आता है। नाला दो दर्जन गांवों से गुजरते हुए फ़रीदाबाद से पुनहना तक बहता है। मानसून के आसपास स्वस्थ्य विभाग गैंबूसिया मछली को नाले में छोड़ता है जो मच्छर के लार्वा को खा जाती है। विभाग पेप्सिको संयंत्र से प्राप्त काले तेल को भी नाले में डालता है लेकिन यह पर्याप्त नहीं है।

आरिफ ने कहा, “नाला पूरे साल गंदा रहता है। वह साल के बाकी समय में इसके लिए पर्याप्त काम नहीं करते हैं।”

उहिना पीएचसी में स्वास्थ्य निरीक्षक दयानंद कुमार, जो 38 गांवों की सेवा करते हैं, ने कहा कि नूह की चिकनी मिट्टी समस्या को और बढ़ाती है। उन्होंने कहा, “भारी बारिश के बाद इसकी मिट्टी पर लंबे समय तक छोटे-छोटे पोखर बन कर रह जाते हैं।”

मंगलवार (24-जुलाई-2018) को जब स्वराज्य ने क्षेत्र का दौरा किया तो स्थिर पानी के कुंड हर जगह देखे जा सकते थे। विडम्बना यह है कि पीएचसी के ही किनारे एक खुला नाला मलेरिया के स्रोत के रूप में दिखाई दिया।

निवासियों का कहना है कि इन पोखरों की सफाई कभी नहीं की जाती है; अधिकारियों का कहना है कि यह स्वास्थ्य विभाग के कार्यक्षेत्र से परे है। दयानंद कुमार ने कहा कि उन्होंने क्षेत्र में पाँच ‘प्रजनन जांचकर्ता’ तैनात किए हैं, लेकिन उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उन्हें कई और जांचकर्ता चाहिए।

जबकि अधिकांश निवासी कृषि से जुड़े हैं, वहीं बड़ी संख्या में लोग मछली की खेती करते हैं, जो, फिर से, स्थिर पानी का एक कारण है और जो मलेरिया का कारण बनने वाले लार्वा को साथ लिए हुए मच्छरों के लिए प्रजनन स्थलों के रूप में कार्य करता है।

प्रकोप को नियंत्रित करने के लिए स्वास्थ्य विभाग मुख्य रूप से कीटनाशक स्प्रे (जिसे इंडोर रेसिडुअल स्प्रे या आईआरएस कहा जाता है) और फॉगिंग, जो दोनों महंगे उपाय हैं, पर निर्भर है। कुमार ने बताया, “आईआरएस 90 दिनों में एक बार किया जाता है। हमने इसे अप्रैल में किया था और दूसरे राउंड की तैयारी कर रहे हैं।” हालांकि, निवासी शिकायत करते हैं कि यह केवल कुछ हफ्तों तक ही राहत प्रदान करता है।

अपने बचाव में स्वास्थ्य विभाग सरकारी आंकड़ों का हवाला देता है जो वर्षों से मलेरिया के मामलों में लगातार गिरावट का संकेत देते हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) के रिकॉर्ड के अनुसार, 2015 में 6,638 मामलों के मुकाबले 2016 में 5,075 मामले रह गये थे। नूह जिले में मलेरिया के मामले कम हो रहे हैं और पिछले साल घटकर 3,646 रह गए थे। आंकड़े पिछले चार वर्षों में जिले में मलेरिया के कारण कोई भी मौत न होने का दावा भी करते हैं जिसमें वे 2015 को एक अपवाद बताते हैं, जब तीन लोगों ने अपनी जिंदगी इस बीमारी के कारण खो दी थी।

कुमार ने कहा, “हमने बड़े पैमाने पर घातक पीएफ की घटनाओं को नियंत्रित किया है।” पीएफ (प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम) और पीवी (प्लाज्मोडियम विवाक्स) परजीवी की दो प्रजातियां हैं जो मलेरिया का कारण बनती हैं। पीएफ एक गंभीर रूप है जिसमें मस्तिष्क संबंधी समस्याएँ होती हैं जबकि पीवी हल्का होता है। हालांकि दोनों का इलाज संभव है। जब 1996 में 1,300 मौतों के साथ सबसे खराब मलेरिया प्रकोप से नुह को झटका लगा था, तब जांच किए गए मामलों में से आधे मामले पीएफ के पाये गए थे। पिछले साल केवल 545 मामले पीएफ के लिए सकारात्मक थे।

लेकिन दो दशकों तक हिंदी दैनिक के लिए काम करने वाले एक नुह-आधारित पत्रकार ने स्वराज्य को बताया कि वहाँ से पूरी खबरें नहीं आ पाती हैं। उन्होंने कहा, “यदि मलेरिया से एक भी व्यक्ति मरता है तो यह प्रशासन के लिए बहुत शर्म की बात है। इसलिए वे आंकड़ों को दबा देते हैं। अगर मौतें होती हैं, तो वे इसके लिए अन्य कारकों को दोष देते हैं।”

उजिना गांव के निवासी शेर सिंह ने कहा, “मौतें हर समय होती हैं”, लेकिन गम्भीर मरीज आमतौर पर डिस्चार्ज होने से पहले ही पीएचसी छोड़ देते हैं, इसलिए उनकी मृत्यु का सरकारी रिकॉर्ड नहीं होता है।

स्वास्थ्य कर्मियों की कमी, सबसे बड़ी बाधा

नूह जिले के महामारी विज्ञानी विमलेश नारायण तिवारी ने स्वराज को बताया कि मलेरिया को कम करने का सबसे प्रभावी उपाय तत्काल जांच और उपचार है। स्वास्थ्य कार्यकर्ता डोर-टू-डोर जाकर रेपिड डायग्नोस्टिक टेस्ट किट, जो 15-20 मिनट में परिणाम प्रदान करती है, का उपयोग करके मरीज का बुखार चेक करते हैं और फिर उपचार शुरू करते हैं।

लेकिन नूह में स्वास्थ्य कर्मियों की संख्या आपराधिक रूप से कम है। जिले में लगभग 30,000 किट हैं, लेकिन इनका उपयोग करने के लिए कुछ ही लोग हैं। बहुउद्देशीय स्वास्थ्य पर्यवेक्षकों या एमपीएचएस, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य में मास्टर डिग्री रखते हैं, के 19 स्वीकृत पदों में से 13 पद खाली हैं। बहुउद्देशीय स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं या एमपीएचडब्ल्यू, जो जमीनी स्तर पर कार्य करने वाले कार्यकर्ता हैं, के 94 स्वीकृत पदों में से 88 पद खाली हैं। स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि विभाग को वास्तव में 250 से अधिक एमपीएचडब्ल्यू की जरूरत है। विभाग में जिला मलेरिया अधिकारी और सहायक मलेरिया अधिकारी जैसे वरिष्ठ पदों की रिक्तियों को भी भरने की जरूरत है।

विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी, जो नाम जाहिर नहीं करना चाहते थे, ने स्वराज को बताया कि कुशल स्वास्थ्य कर्मी या अधिकारी प्लेग की तरह इस बेहद अविकसित नूह जिले से बचते हैं।

दरअसल, अभी हाल ही में नीति अयोग के द्वारा जारी की गई भारत के सबसे पिछड़े जिलों की सूची में नूह जिला सबसे निचले पायदान पर था। यह बहुत ही शर्म की बात है, जबकि यह नई दिल्ली से केवल 2 घंटे की दूरी पर स्थिति है और यह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का हिस्सा भी है।

अधिकारी ने बताया, बहुत खराब साक्षरता दर (कुछ क्षेत्रों में 6 प्रतिशत से भी कम), पीने और सिंचाई के उद्देश्य के लिए पानी की अनुपलब्धता (जैसा कि यहां भूजल बहुत ही खारा है) और बेतरतीब शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था जैसे कारकों का संयोजन, नूह को इसके कर्मों की सजा दिलाता है।

मेओ मुसलमानों के घर मेवात को 1966 में राज्यों के पुनर्गठन के बाद भूतपूर्व पंजाब से सांस्कृतिक क्षेत्र के रूप में अलग किया गया था और इसके आधे क्षेत्र को राजस्थान तक विस्तारित किया गया था। 2005 में हरियाणा के इस क्षेत्र को जिला घोषित किया गया, जिसमें 75 प्रतिशत मेओ मुस्लिम आबादी थी। 2016 में इसे नूह नाम दिया गया।

सरकारी अरुचि और सामाजिक बहिष्कार ने सुनिश्चित किया है कि मेवात एक विफलता बना रहा है; आज यह ज्यादातर कुख्यात गिरोहों और यहां तक कि आतंकवादियों से संबंधों के लिए भी जाना जाता है।

जिले का पिछड़ापन भी सरकार के कई स्वास्थ्य प्रयासों में बाधा डालता है। मिसाल के तौर पर, नसबंदी के डर से टीकों का विरोध किया जाता है और यहां तक कि फॉगिंग और कीटनाशक दवाओं के छिड़काव को संदेह के साथ देखा जाता है। जन्म नियंत्रण पर भी असहमति प्रकट की जाती है।

यह साझा करते हुए कि 80 प्रतिशत मलेरिया रोगी बच्चे हैं, तिवारी ने कहा, “ज्यादातर परिवार गरीब हैं फिर भी उनके छह से सात बच्चे हैं। उनके नंगे शरीर पर आसानी से संक्रमण हो जाता है। कुपोषण अधिक होने के कारण उनकी रोग प्रतिरोधकता क्षमता भी कम है। एनीमिया भी बड़े पैमाने पर है।”

नूह में बार-बार और लंबी बिजली कटौती होती है, जो निवासियों को खुले में सोने के लिए मजबूर करती है। प्रशासन ने हाल ही में 1.7 लाख मच्छरदानियां वितरित की हैं, लेकिन प्रशासन का कहना है कि कम से कम तीन लाख मच्छरदानियों की और आवश्कता है। यहाँ पानी की भी विकट कमी है जो निवासियों को पानी जमा करने के लिए मजबूर करती है। रानिका निवासी नदीम खान ने बताया कि उनकी पत्नी पीने का पानी लाने के लिए रोजाना 2 किलोमीटर दूर जाती हैं। निवासी भी आदतन बारिश के पानी से भरी बाल्टियाँ बाहर छोड़ देते हैं।

यह काफी स्पष्ट है कि मलेरिया के वार्षिक प्रकोप को नियंत्रित करने के लिए जिले को कई मोर्चों पर विकसित करने की जरूरत है। मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने हाल ही में जिले के लिए 3,427 करोड़ रुपये की घोषणा की थी जिसमें एक बहुत आवश्यक जल पाइपलाइन परियोजना के लिए 1,185 करोड़ रुपये शामिल हैं।

यह देखा जाना है कि सरकार अपने वादे को कब पूरा करती है। तब तक जिले को आवश्यक स्वास्थ्यकर्मियों के एक अंश के साथ ही मलेरिया से लड़ाई लड़नी चाहिए।

स्वाती गोयल शर्मा स्वराज्य में एक वरिष्ठ संपादक हैं। वह @swati_gs पर ट्वीट करती हैं।