राजनीति
सरदार पटेल के पिता का क्या नाम था?

प्रसंग
  • भारतीय लोकतंत्र की असल ताकत तब होगी जब कुछ परिवारों का प्रभुत्व पूरी तरह से नष्ट हो जाए और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए पार्टियाँ योग्य और सक्षम नेताओं को आगे लाएँ।

इस बात पर बहस, कि भारत को एक राजवंशीय लोकतंत्र होना चाहिए या नहीं, को कांग्रेस ने स्वयं हवा दी है। प्रधानमंत्री की माँ की उम्र को चुनावी बहस का विषय बना दिया गया था। उनके पिता की अनामिता पर टिपण्णी की गई। तर्क दिया गया था कि अगर आप एक प्रतिष्ठित परिवार की विरासत का प्रतिनिधित्व करते हैं, तो यह आपके पक्ष में एक राजनीतिक बिंदु है। मामूली पारिवारिक पृष्ठभूमि से आने वाले लाखों प्रतिभाशाली राजनीतिक कार्यकर्ता कांग्रेस के नेतृत्व परीक्षण में नाकाम हो जाएँगे। योग्यता, प्रतिभा, लोगों को प्रेरित करने और नेतृत्व करने की क्षमता एक गुण नहीं होगा। कांग्रेस एक राजनीतिक ब्रांड के रूप में केवल एक बड़ा उपनाम मानती है।

इस तर्क को सुनकर, मैंने अपने घनिष्ठ दोस्तों से तीन सवाल पूछे –

  1. गांधी जी के पिता का क्या नाम है?
  2. सरदार पटेल के पिता का क्या नाम है?
  3. सरदार पटेल की पत्नी का क्या नाम है?

मेरे किसी भी मित्र के पास कोई पक्का जवाब नहीं था। यह है कांग्रेस की राजनीतिक त्रासदी और देश पर इसका असर। गांधी जी ने देश में कई असाधारण आंदोलनों की अगुवाई की। उन्होंने सत्याग्रह और अहिंसा के जरिए राजनीतिक जागरूकता पैदा की, यह एक ऐसा माहौल था जहाँ अंग्रेज़ों का भारत में बने रहना असंभव हो गया था।

सरदार पटेल का योगदान भी किसी से कम नहीं था। स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रणी नेता होने के अलावा उन्होंने भारत के उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के रूप में अंग्रेजों के साथ सत्ता के हस्तांतरण के बारे में बातचीत की। उन्होंने 550 से ज्यादा शासकों के साथ भारत के एकीकरण की बात की। उन्होंने कुछ महीनों की छोटी सी अवधि में ही भारत को मौजूदा भूगोल (आकार) दिया। गांधी जी के पिता करमचंद उत्तमचंद गांधी थे, सरदार पटेल के पिता झवेरभाई पटेल और उनकी पत्नी का नाम दिवाली बा था। आधुनिक इतिहासकारों द्वारा की गई व्यापक शोध के बाद भी उनकी पत्नी की कोई तस्वीर या जानकारी उपलब्ध नहीं हो पाई है।

आधिकारिक रूप से ठाठ-बाट वाला परिवार

इसकी वजह साफ है। दशकों तक कांग्रेस का शासन, एक ही परिवार के नाम पर कॉलोनियों, मोहल्लों, शहरों, पुलों, हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों, स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, और स्टेडियमों के नाम रखना ‘गांधीयों‘ को भारत में राजसी गौरव (रॉयल्टी) देने का ही तो इरादा था। वे भारत के कुलीन परिवार के रूप में ‘आधिकारिक तौर पर ठाठ-बाट वाले’ थे। बाकी सब मायने नहीं रखते। और तो और, मुंबई में सरदार पटेल के देहांत पर, प्रधानमंत्री नेहरू ने अपने मंत्रिमंडल के कई सहकर्मियों से अनुरोध किया कि सरदार पटेल को सबसे अच्छी श्रद्धांजलि यही होगी कि वे उनके अंतिम संस्कार वाले दिन मुंबई न जाकर काम करें। तत्कालीन राष्ट्राध्यक्ष और कई केन्द्रीय मंत्रियों ने इस सलाह को मानने से इंकार कर दिया। विजय चौक में उनकी मूर्ति बनाने का प्रस्ताव खारिज कर दिया गया। देश को संसद रोड पर एक गोल यातायात चौराहे पर उनकी मूर्ति स्थापना से ही संतुष्ट होना पड़ा।

बहुत से लोग मानते हैं कि बारदोली सत्याग्रह में सरदार पटेल की भागीदारी की वजह से वह एक किसान नेता थे। दूसरी ओर, वह अहमदाबाद के सबसे सफल बैरिस्टरों में से एक थे। पंडित जी ने अपने पूरे करियर में भले ही एक भी केस नहीं लड़ा लेकिन फिर भी उनको एक महान वकील माना जाता था। प्रतीकवाद की वजह से भोलाभाई देसाई की अगुवाई में वरिष्ठ वकीलों के पीछे बैठने के लिए वह केवल एक बार अदालत गए थे जहाँ देसाई लाल किले के अंदर विद्रोह के लिए सुनवाई में तीन आईएनए अधिकारियों के लिए बहस कर रहे थे।

दूसरों की कीमत पर ठाठ-बाट पालने का खतरा

उन लोगों, जिन्होंने बहुत अधिक योगदान किया, की कीमत पर एक परिवार को आधिकारिक तौर पर आकर्षक बनाने का खतरा देश और पार्टी, जिनसे वे संबंधित हैं, दोनों के लिए संकटपूर्ण हैं। पटेल और सुभाष चंद्र बोस जैसे अन्य महान दिग्गजों का योगदान कम करके बताया जाता है। एक परिवार के सदस्यों को बहुत ही महत्त्वपूर्ण माना जाता है। उनकी पथभ्रष्टता राष्ट्रीय पथभ्रष्टता बन जाती है। पार्टी इसे अपनी विचारधारा मानकर उन्हें स्वीकार कर लेती है। जब पंडितजी ने अपनी बेटी को अपने उत्तराधिकारी का पद प्रदान किया तो उन्होंने भारत में राजवंशीय लोकतंत्र की बुनियाद रखी। 1975 में जब वह तानाशाह बन गईं तो भारत को “अनुशासित लोकतंत्र” में बदलना पार्टी की विचारधारा बन गई। जब 1984 में सिखों का नरसंहार हुआ, तो उनके (सिखों के) खिलाफ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को वैध चुनावी रणनीति माना गया। आज भाजपा-विरोध ने कांग्रेस को ऐसी स्थिति में में पहुँचा दिया है जहाँ यह अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के साथ भी समझौता कर सकती है और माओवादियों, संप्रदायवादियों और विघटनकर्ताओं से सहमत हो सकती है।

देश राजवंशीय नीतियों के लिए कीमत चुकाता है जैसा कि हमने कई क्षेत्रों में देखा है। तीन परिवारों, जिनमें से दो श्रीनगर में हैं और एक नई दिल्ली में है, ने पिछले 71 वर्षों से जम्मू-कश्मीर के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया है। परिणाम स्पष्ट हैं। कांग्रेस में नेतृत्व के राजवंशीय सिद्धांत को देखते हुए कई अन्य पार्टियों ने भी उसी सिद्धांत का पालन किया है। ऐसे संगठनों में कोई आंतरिक पार्टी लोकतंत्र नहीं है, कोई वैचारिक सिद्धांत नहीं हैं। सहयोगी या दल बदलने और पुराने राजनीतिक विरोधियों के साथ हाथ मिलाने में कोई समस्या नहीं है। आंध्र प्रदेश में एनटीआर ने राजनीतिक खालीपन को भर दिया और कांग्रेस के लिए एक विकल्प बनाया। धीरे-धीरे पार्टी वर्तमान मुख्यमंत्री के नियंत्रण में आती गई जो हर आम चुनाव में दल-बदल करना चाहते हैं। यहाँ कोई दूसरा नेतृत्व नहीं है और प्रस्तावित विकल्प “विरोधियों का गठबंधन” है।

जिन पार्टियों पर प्रश्नचिह्न लगा है वे भी कीमत चुकाती हैं। केवल उन्हीं नेताओं का राजनीतिक भविष्य उज्ज्वल है जो राजवंशीय दलों के नेताओं द्वारा स्वीकार्य हैं। अगर कोई परिवार की गरिमा को धूमिल करता है तो उसे पार्टी से बाहर कर दिया जाता है या अधिकारहीन कर दिया जाता है। प्रतिभा के लिए कोई जगह नहीं है। योग्यता का कोई प्रभाव नहीं। संगठनात्मक संरचना मौजूद नहीं है। पार्टी का जादू ही पार्टी का वोट बैंक है। परिवार के चारों ओर भीड़ ही कार्यकर्ता है।

राजवंशीय पार्टियों की कमजोरी

हालाँकि इस तंत्र की एक महत्त्वपूर्ण कमजोरी है। पार्टी की शक्ति वंश की वर्तमान पीढ़ी की शक्ति के सहअस्तित्व में है। यदि वह नेतृत्व करने में प्रेरणाहीन या अधूरे पाए जाते हैं तो पार्टी को अपनी सफलता के लिए वर्तमान बड़े दिग्गजों के समूह पर निर्भर होना पड़ेगा। यह समूह केवल 44 लोकसभा सीटों जितना हो सकता है, कभी कुछ कम और कभी कुछ ज्यादा। नेता की अनभिज्ञ प्रतिक्रियाएँ नई विचारधारा बन जाती है। हालाँकि स्थिति का आशावादी पक्ष यह है कि भारत बदल रहा है। इसमें एक व्यापक मध्यम वर्ग है और बहुत मजबूत महत्वाकांक्षी वर्ग मध्यम वर्ग में शामिल होने का इच्छुक है। यह महात्वाकांक्षी भारत पार्टियों और नेताओं का आकलन बहुत रूखे तरीके से करता है। उन पर जो थोपा जाता है उसे वे स्वीकार नहीं करते हैं। वे कठिन और तीखे प्रश्न पूछते हैं और उनका मानदंड बहुत कठिन है। वे सत्यनिष्ठ नेताओं की तलाश करते हैं, वे ऐसे पुरुषों और महिलाओं की तलाश करते हैं जो उन्हें प्रेरित कर सकें, जो निर्णायक हों और जो राष्ट्र का नेतृत्व कर सकें। उनके लिए उपनाम कोई मायने नहीं रखता और क्षमता और योग्यता ही सबकुछ है।

2019 की चुनौती

भारतीय लोकतंत्र की असल ताकत तब होगी जब कुछ परिवारों का प्रभुत्व पूरी तरह से नष्ट हो जाए और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए पार्टियाँ योग्य और सक्षम नेताओं को आगे लाएँ। साल 2014 में यह बात काफी हद तक साबित हो गई थी जब ज्यादातर राजवंशीय पार्टियों को बहुत ही बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा था। 2019 का भारत 1971 के भारत से अलग है। अगर कांग्रेस पार्टी चाहती है कि 2019 का चुनाव मोदी, जो कि एक कम जान पहचान वाले माता-पिता के बेटे हैं, और एक ऐसे व्यक्ति के बीच हो जो अपनी योग्यता, क्षमता और पात्रता के बजाय केवल अपने माता-पिता की वजह से जाना जाता है, तो भाजपा यह चुनौती खुशी से स्वीकार करेगी। इसको 2019 के लिए एजेंडा बनने दीजिए।

इस लेख को वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा अपने फेसबुक पेज पर किए गए पोस्ट से सीधे प्रकाशित किया गया था।

अरुण जेटली भारत सरकार के वित्त एवं कॉरपोरेट मामलों के मंत्री हैं।