राजनीति
‘शहरी नक्सलवादी’ वास्तव में क्या करने की कोशिश कर रहे हैं
'शहरी नक्सलवादी' वास्तव में क्या करने की कोशिश कर रहे हैं

प्रसंग
  • नक्सलवाद ने जहाँ ग्रामीण भारत में अपनी ताकत खो दी है, वहीं अब इसका ध्यान शहरी दिमागों’  का उपयोग करके देश को बर्बाद करने पर है।
  • शुरुआत में उनकी योजना उन सभी को एकजुट करने की है जो चालाक होने के साथ-साथ शिक्षित भी हैं और फिर संगठित एवं शातिर तरीके से विनाश के माध्यम से अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की है।

भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा की आगे की जाँच के रूप में 28 अगस्त को पुणे पुलिस ने राष्ट्रव्यापी छापे मारे और कथित पर नक्सलियों के प्रति सहानुभूति दिखाने वाले पाँच लोगों को गिरफ्तार कर लिया। जैसी कि आशंका थी इसके लिए लोगों के बड़े वर्ग द्वारा हू-हल्ला किया गया और इन गिरफ्तारियों को लोकतंत्र पर एक धब्बा बताया गया।

इस मामले की सच्चाई यह है कि इनमें से कुछ व्यक्ति – वरवरा राव, सुधा भारद्वाज, वेरनॉन गोंसाल्विस, अरुण फेरेरा और गौतम नवलखा – हमेशा से रडार पर रहे हैं और 2007 में भी ये लोग कानून के साथ मुठभेड़ कर चुके हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय को सौंपी गई पुणे पुलिस की रिपोर्ट में कहा गया है कि वे लोग नक्सलियों को रसद और वित्तीय सहायता प्रदान कर रहे थे और आतंकवादी समूहों के साथ गठबंधन बनाने के प्रयास कर रहे थे।

दिसंबर 2012 में कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के कार्याकाल में सरकार ने नक्सलियों से जुड़े 128 संगठनों की एक सूची तैयार की थी और उनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए सभी राज्यों को पत्र भेजे गए थे।

जहाँ पुलिस का कहना है कि वे अदालत में एक मजबूत मामला बनाएंगे, वहीं ‘शहरी नक्सलियों’ की संपूर्ण अवधारणा पर सवाल पूछते हुए बहस हो रही है। कुछ लोगों ने तो यह भी पूछा है कि क्या यह अवधारणा सत्य है या मात्र एक कल्पना।

शहरी नक्सलवाद या नक्सलियों के रूप में शहरी मंच की अवधारणा स्वयं यह कहती है कि इसका निर्माण कई वर्षों से हो रहा था। नक्सलियों के एक मुख्य हमदर्द गोविंदन कुट्टी ने 53 पृष्ठ का एक गोपनीय दस्तावेज (स्वराज के कब्जे में) तैयार किया था जिसमें उसने योजना बनाई थी कि उन्हें शहरी मंचों की आवश्यकता कैसे और क्यों है।

यह एक व्यापक दस्तावेज है, जिसे नक्सलियों द्वारा तैयार किए गये ‘दस्तावेज़’ के रूप में माना जाता है और यह अपनाई जाने वाली कार्यप्रणाली का विवरण देता है। शहरी क्षेत्रों में सशस्त्र संघर्ष, विख्यात संगठनों में घुसपैठ, सेना और अन्य सेवाओं में घुसपैठ कुछ ऐसे पहलू हैं जिनका उल्लेख इस दस्तावेज़ में किया गया है।

सफेद पोश घुसपैठिए

पुणे न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष रखते समय, अभियोजन पक्ष ने कहा था कि ऐसे पत्र प्राप्त हुए हैं जिनमें कहा गया था कि टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टीआईएसएस) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से लोगों को भर्ती करने के लिए प्रयास किये जाने चाहिए।

अभियोजन पक्ष ने कहा था कि पत्रों में युवा पेशेवर कार्यकर्ताओं को नक्सलवादी गतिविधियों के लिए भर्ती करने का जिक्र किया गया था और उनका लक्ष्य टीआईएसएस जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के पेशेवर थे।

यह अभियोजन पक्ष द्वारा अपने पक्ष में रखी गई दिलचस्प बात है और इस संदर्भ में किसी को भी सीपीआई (माओवादी)-शहरी परिप्रेक्ष्य शीर्षक वाले दस्तावेज से हवाला लेना चाहिए। “White Collar Employees” शीर्षक में यह बात साफ तौर पर बताई गई है कि शहरी बलों को इसमें किस तरह से शामिल होना चाहिए।

इसमें कहा गया है कि “आधुनिक उद्योग में कम्प्यूटरीकरण और स्वचालन के तीव्र प्रसार तथा अर्थव्यवस्था के सेवा क्षेत्र में बढ़ते शेयरों के परिणामस्वरूप सफेद कॉलर-पोश कर्मचारियों की संख्या और अनुपात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इनकी बड़ी संख्या सार्वजनिक क्षेत्र में है और ज्यादातर संगठन बनाए हुए हैं।”

अन्य निकायों के अलावा बैंक, बीमा कंपनियाँ, शिक्षक, सरकारी कर्मचारी आदि इन संगठनों के जीते जागते उदाहण हैं। बिजली, दूरसंचार और अन्य विभागों के इंजीनियर, घरेलू डॉक्टर और पायलट जैसे उच्च स्तर के पेशेवरों के संगठनों में हाल ही मे काफी वृद्धि हुई है। इनमें से कई संगठन काफी शक्तिशाली हैं जिन्होंने देश की अर्थव्यवस्था पर आघात पहुँचाने और उसे अपाहिज बनाने की अपनी योग्यता सिद्ध कर दी है।

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि “चूँकि सभी सफेद कॉलर-पोश कर्मचारी मजदूर और क्रान्तिकारी वर्ग से काफी अच्छे संबंध रखते हैं, कुछ वर्ग कभी-कभी पूंजीपतियों के साथ मिलकर प्रतिक्रियावादी प्रचार के पीड़ित बन जाते हैं। इसलिए,उद्योगों के गरीब श्रमिक वर्ग के लिए कर्मचारी वर्ग के साथ गहरे संबंध बनाए रखने और वर्ग संघर्ष में इसे अस्थिरता से दूर ले जाने के लिए यह जरूरी है।”

इसमें कहा गया है, “हमें सभी उद्योगों और उद्यमों में सफेद कॉलर-पोश और नीले कॉलर पोश दोनों वर्गों की एकता के लिए हमेशा संघर्ष करना चाहिए। हमें लोगों को सामान्य तौर पर कर्मचारी वर्ग और श्रमिक वर्ग को अलग-अलग रखने की पिछड़ी परंपरा का विरोध करना चाहिए। जहाँ भी अलग संगठन मौजूद हैं वहाँ जितना हो सके हमें उतना उनके साथ काम करने का अवसर दिया जाना चाहिए, चाहे यह आंशिक ही क्यों न हो।”

इसके एक दूसरे खंड में कहा गया है कि “वैश्वीकरण के समय में, कम काम और ज्यादा वेतन को लेकर सत्तारूढ़ वर्गों ने इस अनुभाग पर हमला करते हुए एक केन्द्रित प्रोपगंडा शुरू किया है, जिसके अनुसार श्रमिकों का वेतन और संख्या कम होनी चाहिए। इस प्रकार,कुछ वर्गों को भत्ते में कटौती और वेतन में बहुत ही कम बढ़ोतरी पर सहमत होने के लिए मजबूर किया जा रहा है। उनको विभिन्न निजीकरण और स्वैच्छिक सेवानिवृत वाली योजनाओं में भी हाशिए पर रखा गया है। हालांकि वे निरंतर संघर्ष कर रहे हैं लेकिन अक्सर उनको अन्य वर्गों की सहानुभूति और समर्थन हासिल नहीं होता है। हमारे श्रमिक संघों, कानूनी लोकतांत्रिक और गुप्त श्रमिक संगठनों और कभी-कभी पार्टी को बैंक कर्मचारियों, शिक्षकों और पत्रकारों आदि के संघर्षों के साथ विभिन्न तरीकों से एकजुटता व्यक्त करनी चाहिए।”

“जब शहरों/कस्बों के स्तर पर संयुक्त व्यापार संघ निकायों का गठन किया जाता है तो फिर हमें भी कर्मचारियों के संघों की सभी स्थानीय शाखाओं को एक साथ आने का प्रयास करना चाहिए। इससे किसी भी तरह के जोर जबरदस्ती और संघर्ष के समय संयुक्त कार्यक्रमों और पारस्परिक एकजुटता को व्यवस्थित करने में मदद मिल सकती है।”

शहर में पसार रही है पैर

सुरक्षा और खुफिया ब्यूरो के अधिकारियों ने ‘स्वराज्य’ से कहा कि यह लंबे समय से इस पर काम चल रहा है। उनका प्रमुख उद्देश्य यह है कि इसका प्रचार करना और यह सुनिश्चित करना कि लोकतंत्र खतरे में है, भले ही कोई भी सरकार सत्ता में हो।

नक्सलियों ने यह महसूस किया है कि एक मजबूत सशक्त शहरी बल से ग्रामीण संघर्ष को और अधिक मजबूत बनाया जा सकता है। नक्सलियों का पत्र बताता है कि 1990 के अंत में अपनी नौवीं कांग्रेस के दौरान, एक व्यापक शहरी बल बनाने का आह्वान किया गया था। इस बल में तथाकथित रूप से धर्मनिरपेक्ष ताकतों और सताए गए धार्मिक अल्पसंख्यकों को शामिल किया जाएगा। पत्र बताता है कि उनका इरादा हिंदू फासीवादी ताकतों के जैसे एक मजबूत संगठन का निर्माण करना था।

पत्र आगे बताता है, “यह काम हमारी कागजी कार्यवाही में बहुत सालों से चला रहा है, लेकिन अभी तक इसके लिए न के बराबर काम किया गया है। इसके नाकाम होने के पीछे के मुख्य कारण को बताएं तो वह हमारे शहरी संगठनों की कमजोरी है, लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण कारण अल्पसंख्यकों के बीच हमारे काम की उपेक्षा है।”

एक राजनीतिक कार्यक्रम के माध्यम से संयुक्त धर्मनिरपेक्षवाद

नक्सलियों ने यह महसूस किया कि एक राजनीतिक कार्यक्रमों के माध्यम से धर्मनिरपेक्ष व्यक्तियों को एकजुट करके शहरी बल का निर्माण नहीं किया जा सकता। इसे जनता के बीच प्रभावी करने के लिए इसमें विशेष रूप से अल्पसंख्यकों को शामिल करना था और इसलिए अल्पसंख्यकों के बीच प्रभावी ढंग से जमीनी स्तर पर काम, विशेष रूप से मुसलमानों के बीच, किया जाना चाहिए था।

गोविंदन कुट्टी ने सुझाव दिया था कि, “हालांकि, देश के लगभग हर शहर में ध्रुवीकरण के चरम पर होने के कारण, यह तभी संभव है कि जब हम हिंदू-बाहुल्य क्षेत्रों से कम से कम कुछ प्रभावशाली लोगों को बाहर निकालते हैं और उनको गरीब मुस्लिमों की बस्तियों और झोपड़ियों वाले इलाके में बसाने का फैसला लेते हैं। किसी भी संयुक्त मोर्चे का निर्माण करने वाला यह पहला कदम होगा।”

हिंदुओं के खिलाफ मुद्दा आधारित मोर्चा

शहरी नक्सलवाद के उदय के प्रमुख कारणों में से एक यह भी है कि यहाँ एक एन्टी हिन्दू फ्रंट बनाया जा रहा था। नक्सलियों को ऐसा लगा कि मुद्दे आधारित संगठन को हिंदुओं का विरोध करने और “शिक्षा के भगवाकरण” से लड़ने के लिए बनाया जा सकता है।

उन्होंने यह भी महसूस किया कि हिंदू अपने एजेंडे को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे थे और इसलिए इस शहरी बल के निर्माण का कार्य और भी महत्वपूर्ण हो गया। नक्सलियों ने कहा कि सभी शहरी संगठनों को इसे अभ्यास में लाने के लिए गंभीर रूप से योजना बनानी चाहिए।

भारतीय सेना में घुसपैठ

नौवीं कांग्रेस के बाद, यह महसूस किया गया कि शहरी क्षेत्रों से ग्रामीण सशस्त्र संघर्ष की सहायता की जानी चाहिए। कुट्टी ने सुझाव दिया कि शहरी आंदोलन से ग्रामीण संघर्ष की सहायता की जा सकती है। दस्तावेज के अनुसार, कुछ शर्तों में सामग्री और कर्मचारियों की प्रत्यक्ष एवं तत्काल सहायता तथा अन्य में लोगों के संघर्ष के बाद की अवस्था में निर्णायक लड़ाई के लिए लंबी अवधि की तैयारी शामिल है।

कुट्टी आगे कहते हैं कि “सेना, अर्धसैनिक बलों, पुलिस और राज्य के प्रशासनिक तन्त्र के उच्च स्तर की जानकारी रखना बहुत महत्वपूर्ण है”। इन निकायों के भीतर विद्रोह के लिए समर्थन बनाने के लिए दुश्मन के बारे में जानकारी प्राप्त करना और यहां तक कि पर्याप्त जानकारी प्राप्त होने के बाद, विद्रोह को भड़काना भी आवश्यक है। अन्य प्रकार की तकनीकी सहायता भी संभव है।”

उन्होंने कहा “शहर दुश्मन के गढ़ हैं और दुश्मन बलों का एक बड़ा संक्रेंद्रण हैं। इसलिए, इस कार्य का केंद्र बिंदु शहर होना चाहिए। इस तरह के काम को नागरिक क्षेत्र से प्राप्त संपर्कों से निरंतरता बनाकर या तो फिर प्रत्यक्ष रूप से दुश्मन रैंक में पैठ बनाने के लिए कामरेड का निर्धारण करके किया जा सकता है।”

“तरीका चाहे जो भी हो, काम बहुत ही विशेष प्रकार का है, जिसके लिए उच्च स्तर की राजनीतिक विश्वसनीयता, कौशल और धैर्य की जरूरत होती है। इस तरह के काम निचले स्तर की समितियों की जानकारी के बिना होना चाहिए और काम का ब्योरा प्रत्यक्ष रूप से केवल कामरेडों के साथ होना चाहिए।”

“इस कार्य के साथ संबद्ध देश भर में फैले छावनी शहरों में काम करने की योजना की आवश्यकता है। यहां तक कि इन शहरों की नागरिक आबादी के बीच भी इस तरह के काम हमें दुश्मन रैंकों में पैठ बनाने के लिए आवश्यक जानकारी और सूऱाग दे सकते हैं।”

“हमें पुलिस, अर्धसैनिक और सैन्य बलों में पैठ के अवसरों को भुनाना चाहिए। हमें उन लोगों के साथ गुप्त रूप से संपर्क बनाना चाहिए, जो पहले से ही इसमें मौजूद हैं। जहां संभव हो, हमें बाहर ही उनसे मिलना चाहिए। इस तरह के काम को स्थानीय निकायों को सूचित किये बिना सीधे उच्च समितियों द्वारा निर्देशित किया जाना चाहिए।”

“हमें साधारण हवलदारों और सैनिकों की समस्याओं के बारे में नियमित रूप से प्रचार करना चाहिए। हमें उनके बारे में ज्वलंत मुद्दों को उठाना चाहिए और उन्हें आंदोलन के लिए उकसाना चाहिए।“

“हमें ऐसे क्षेत्रों में काम के लिए योजना तैयार करने के उद्देश्य से छावनी शहरों, औपचारिक कारखाने क्षेत्रों आदि की भी जानकारी रखनी चाहिए। हमें इस तरह के बल इकट्ठा करने और उत्पन्न करने की भी कोशिश करनी चाहिए जो इस तरह के काम करने में सक्षम हों।”

शहरी सैन्य संचालन की स्थापना

हालांकि सम्पूर्ण शहरी नक्सल सिद्धांत का उद्देश्य प्रचार करना तथा हिंसा भड़काना रहा है, शहरी सैन्य संचालन स्थापित करने के लिए एक ठोस योजना भी थी। उनका कहना है कि ग्रामीण क्षेत्र सैन्य संचालन के लिए मुख्य क्षेत्र हैं। हालांकि, कुछ सैन्य उद्देश्य ऐसे हैं जिन्हें शहरी क्षेत्रों में संचालन के माध्यम से पूरा करना होता है। शहरों और लिखित प्रमाणों में पीपुल्स गुरिल्ला आर्मी / पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की स्थायी संरचनाओं की स्थापना की भी आवश्यकता थी, नक्सली भी योजना बना चुके थे।

इस पर विस्तार पूर्वक चर्चा करें, तो लिखित प्रमाणों से यह भी पता चलता है कि इन शहरी टीमों की भूमिका इस प्रकार के लक्ष्य पाने की थी जैसे कि सैन्य महत्व की संरचनाओं, लोगों का विनाश, गोला बारूद के भंडारों का विध्वंश और संचार व्यवस्था तथा तेल प्रतिष्ठानों का विनाश आदि।

विशेषज्ञों की राय

रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के पूर्व विशेष सचिव अमर भूषण ने ‘स्वराज्य’ को बताया कि शहरी नक्सलवाद को एक मिथक मानने का विचार केवल बकवास की बात है। अभियान में अब कोई विचारधारा बाकी नहीं है। यह वास्तव में एक अच्छा व्यवसाय बन गया है। अभियान स्थानीय डॉनों और बाहरी तत्वों के नियंत्रण में है।

भूषण शहरी नक्सलवाद से संबंधित एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू की ओर संकेत करते हैं और कहते हैं कि वे हथियार और फन्ड के प्राथमिक परिवाहक हैं। इसके विपरीत विदेशों से हथियार लाने के लिए एक उचित माध्यम है।  शहरी नक्सलवादी पाइपलाइन बिछाते हैं जिससे हथियार और धन दोनों ही चीजें जंगलों तक पहुंच सकें।

पूर्व रॉ अधिकारी ने बताया, यद्यपि ग्रामीण क्षेत्रों में यह मसला निष्क्रिय है लेकिन शहरी क्षेत्रों में ये लोग इसे क्रियाशील रखते हैं। उनके पास केवल एक ही एजेंडा है जो भारत की अशांति का कारण बन रहा है और उनके हितों तथा कारनामों को हवा दे रहा है। तथाकथित बुद्धिजीवी, पत्रकार और कई अन्य लोग हैं जो इस बहुत ही खतरनाक आंदोलन का हिस्सा हैं। वे या तो गैर-सरकारी संगठनों या विश्वविद्यालयों में काम करते हैं और अपने उद्देश्य को क्रियाशील रखते हैं। इन लोगों द्वारा किए गए मानवाधिकारों के हनन के विपरीत तथ्य यह है कि वे भारत में एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं जो हिंसक है और मेरे विचार से, यह उनकी खतरनाक योजना है।

विकी ननजप्पा एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। इनका ट्विटर हैंडल @vickynanjappa है।