राजनीति
कोडागु बाढ़ पीड़ितों की जिंदगी वापस ढर्रे पर लाने के लिए सरकार क्या मदद कर सकती है?
एम रघुराम - 26th September 2018
कोडागु बाढ़ पीड़ितों की जिंदगी वापस ढर्रे पर लाने के लिए सरकार क्या मदद कर सकती है?

प्रसंग
  • सरकार को गंभीर कठिनाईयों में रह रहे कोडागु बाढ़ पीड़ितों का सामान्य जीवन बहाल करने के लिए हर संभव प्रयास करने चाहिए।

सुंदर शहर कोडागु के बारिश, बाढ़ और भू-स्खलन द्वारा नष्ट होने के दो सप्ताह बाद इस क्षेत्र के लोग अपने बिखरे हुए जीवन को समेटने की कोशिश कर रहे हैं, जो उन्होंने जलप्रलय आने के बाद छोड़ा था।

जिला प्रशासन के एक अनुमान के अनुसार कस्बों, गाँवों, कॉफी के बागानों, सड़कों, सार्वजनिक स्थानों, रिसॉर्ट्स, जल भंडारण एवं बुनियादी ढाँचे सहित 12 प्रतिशत भू-भाग पूरी तरह या आंशिक रूप से पानी के साथ बह गया,  5000 से अधिक लोग बेघर हो गये और 2,800 से अधिक लोग अभी भी नहीं जानते कि उन्हें कहाँ जाना है और अभी भी वे राहत शिविरों में रह रहे हैं।

कोडागु का दौरा करने वाले केंद्रीय आपदा प्रबंधन दल के विशेषज्ञों ने नुकसान का सर्वेक्षण किया है और साथ ही मेजर जनरल एस जी ओम्बाथकेरे (सेवानिवृत्त) के नेतृत्व में मैसुरु के इंस्टिट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स  द्वारा साथ रखी गयी एक अन्य तकनीकी टीम ने भी सर्वेक्षण किया है कि कोडागु की अर्थव्यवस्था को हुआ नुकसान व्यापक है और जो अनुमान लगाया गया है वह उससे कहीं अधिक है।

रिपोर्ट में जंगलों के व्यापक विनाश, उन जगहों पर सड़कों का निर्माण, जहाँ उनकी आवश्यकता नहीं थी या जहाँ मोटर वाहनों के लिए कोई योजना नहीं थी, और लापरवाही से किए गये संपत्ति विकास का उल्लेख किया गया है। समिति ने एक चेतावनी के साथ जानकारी दी है कि,” एक प्राकृतिक आपदा से अधिक यह वर्षों से तैयार की जा रही मानव निर्मित आपदा थी, बारिश बहुत ज़यादा हुई लेकिन अगर विकास इतने विवेकहीन तरीके से नहीं किया गया होता तो तबाही इतनी बड़ी और विनाशकारी नहीं होती.

अपने घरों को वापस लौटने वाले लोगों को, विशेषकर मादपुरा, जोदुपला और कुशलनगर आवास कॉलोनियों में, रहना असंभव लगता है क्योंकि अब उनके लिए वहां कुछ भी बचा नहीं है। मदिकेरी राहत शिविर पर ज्योति मांडणा ने ‘स्वराज्य’ को बताया कि “ जो लोग अच्छी कमाई कर आरामदायक जीवन व्यतीत कर रहे थे, अब उनके पास कुछ नहीं है, कुछ भाग्यशाली लोग बड़े जोखिमों के बाद अपने दस्तावेजों को वापस पाने में कामयाब हो पाए हैं लेकिन ऐसे लोगों की संख्या बहुत ही कम लगती है।”

उन्होंने कहा, “यह मेरे लिए बहुत ही अपमानजनक है कि मेरी पत्नी और दो बेटियाँ किसी के द्वारा दान की गई थालियों से भोजन करें, एक-एक निवाला जो हम लोग खाते हैं उसका  जिला अधिकारीयों द्वारा हिसाब रखा जाता है।”

मांडणा ने कहा, “मैंने उनसे अपील की कि हमें स्वयं को महत्वहीन न अनुभव करने दें और हमारे साथ सम्मान तथा सहानुभूति का व्यवहार करें, भगवान न करे कि ऐसा समय किसी का भी आए। जैसा हमारे साथ हुआ वह अभूतपूर्व था। हमने रातोंरात हमारे घर, वाहन, दस्तावेज, जानवर और संपत्ति सब कुछ खो दिया और अब हमने राहत शिविरों में पनाह ली है।”

जब कुशलप्पा और उनके भाई ननजप्पा, जिनका एक फार्म हाउस मदपुरा में था, जब उसी स्थान पर वापस गए जहां पर वे रहते थे तो उन्हें उनके फार्म हाउस का कोई निशान तक न मिला ।

उन्होंने बताया, “हम लोग जगह का पता भी नहीं  लगा सके, जब हम लोगों ने अपनी जीप को पूरी तरह से मिट्टी में दबी हुई पाया जिसका एन्टीना मिट्टी से बाहर दिख रहा था, तब पता चला कि हम लोग इसी जगह पर रहते थे। लेकिन फिर से कोई इसको हमारे लिए खोद कर निकाल नहीं पाएगा क्योंकि इस स्थान पर पहुँचना ही बहुत मुश्किल है।”

विधायक अपचु रंजन के अनुसार, विभिन्न संगठनों के राहत एवं बचाव कार्यकर्ताओं ने प्रभावित लोगों को अपने घरों तक वापस पहुँचाने का प्रयास किया है, लेकिन केवल 1 फीसदी लोग ही अपने घरों की पहचान कर सके और उनमें से करीब 10 फीसदी लोगों ने अपने घरों को ऐसी हालत में पाया कि उनमें दोबारा नहीं रहा जा सकता । मदिकेरी में एक राहत शिविर की यात्रा के दौरान रंजन ने ‘स्वराज्य’ को बताया कि “हम पुनर्वास कॉलोनियों की रफ्तार बढ़ाने के लिए राज्य सरकार पर दबाव डाल रहे हैं। हमने कोडगु जिले में अलग-अलग स्थानों पर 200 एकड़ से अधिक भूमि की पहचान की है, जहाँ पर हम प्रत्येक 7 लाख रुपये की लागत से पक्के घरों का निर्माण करवा रहे हैं- सरकार, कई निगम और अन्य संगठन पुनर्वास कार्यक्रम में योगदान देने के लिए आगे आए हैं। कोडगु के अलावा कहीं और इन कॉलोनियों का निर्माण करने का कोई सवाल ही नहीं है।”

कोडगु के एक और विधायक के.बी. बोपैय्या ने बताया, “यहाँ ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने कॉफी के बागान, खेतिहर भूमि, घरों तथा वाहनों सहित 20 एकड़ से ज्यादा जमीन खो दी है। हालांकि, व्यक्तिगत आधार पर नुकसान और भी ज्यादा हुआ है, हम उचित तरीकों से उनको फिर से बसाने की कोशिश करेंगे। हमने पहले ही मुख्यमंत्री राहत निधि से एक बड़ी रकम देने का वादा किया है।”

इस विनाश का एक और परिणाम यह हुआ कि मदापुरा होले और अट्टी होले ने कई जगहों पर भूस्खलन हो जाने की वजह से अपना जलमार्ग बदल लिया है। यह दोनों नदियाँ कावेरी की दो प्रमुख सहायक नदियाँ हैं, और राज्य जल संसाधन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि अगले मानसून में कावेरी में उनका प्रवाह प्रभावित होगा, कोडगु क्षेत्र का इस मानसून में बारिश का साल भर का कोटा केवल एक हफ्ते में पूरा हो गया है। यही भूस्खलन की वजह भी है। कोडगु का 80 फीसदी से ज्यादा भूभाग बारिश और भूस्खलन से प्रभावित नहीं हुआ है लेकिन 12 फीसदी भूभाग व्यापक नुकसान की चपेट में आया है जहाँ पर अब खेती या वृक्षारोपण जैसे कामों को और अंजाम नहीं दिया जा सकता है।

विभाग एक विशेषज्ञ रिपोर्ट पर यह पड़ताल कर रहा है कि मिट्टी के ढीला होने और 3.4 तीव्रता के भूकंप में कहीं हरंगी बांध से होने वाले रिसाव की कोई भूमिका तो नहीं थी। 9 जुलाई 2018 को यह भूकंप आया था। कर्नाटक राज्य प्राकृतिक आपदा निगरानी निगम ने इसे माइक्रोट्रेमर नाम दिया है।

उत्तर-पश्चिमी कोडगु के हरंगी जलाशय के जलग्रहण क्षेत्र में होने वाले विनाशकारी भूस्खलन ने 7 कोडवा नाडों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। कोडवा राष्ट्रीय समिति के अध्यक्ष एन यू नचप्पा कोडवा ने ‘स्वराज्य’ को बताया कि “यहाँ से विस्थापित हुए लोग अब सड़कों पर पनाह लिए हुए हैं और उन्हें सम्मानित तरीके से पुनर्वासित करने की आवश्यकता है।”

“भूस्खलन पीड़ितों की जिम्मेदारी लेने के लिए इन सभी प्रयासों में एक मंत्रालय की स्थापना की जरुरत है जिसमें सभी संबंधित विभाग हों, जो उन्हें स्थायी रूप से पुनर्वासित कर सके.

कोडवा ने कहा, “कोडागु के बारे में मीडिया जो दिखा रही है वह पूरी तरह से गलत है। मीडिया के एक वर्ग ने दर्शाया कि कोडगु पूरी तरह से तबाह नहीं हुआ है, इसके केवल कुछ इलाके ही प्रभावित हुए हैं जहाँ सामान्य जीवन जीना मुमकिन नहीं था।”

“इसका नतीजा यह होगा कि असल पीड़ितों को नजरअंदाज किया जाएगा और

इस तबाही को नदी के तटों पर अतिक्रमण और फसल नुकसान के सामने भुला दिया जाएगा, और सरकार इन सभी चीजों को सामान्य घटना बताकर खारिज कर आवश्यकतानुसार मदद देने से इंकार कर सकती है, और इससे अपना किनारा कर सकती है।”

राज्य सरकार द्वारा आपदा की गंभीरता के कम आँकलन पर कोडवा राष्ट्रीय समिति (सीएनसी) ने भी इसके प्रति निराशा व्यक्त की है। कोडवा ने बताया, “कोडगु क्षेत्र में उत्तर-पश्चिमी भाग के 7 कोडवा नाद के 20 × 30 किलोमीटर दायरे का क्षेत्र गंभीर रूप से प्रभावित था, और यदि यह सही तरीके से पेश किया गया है तो संयुक्त राष्ट्र आपदा प्रबंधन निधि और अन्य अंतर्राष्ट्रीय आपदा राहत निधि के साथ-साथ प्रवासी समुदाय से सहायता प्राप्त करने का पात्र होगा।”

कोडवा ने आरोप लगाया ,“अफसोस की बात है कि कई एनजीओ लोगों को एक नए घर के वादे और रहने के खर्चे के प्रावधान पर उनकी संपत्तियां वन विभाग के नाम करने के लिए दबाव दाल रहे हैं. इस तरह का प्रदर्शन विदेशी संगठनों से चंदा प्राप्त करने में मदद करेगा, और कोई भी नहीं जानता कि क्या इससे पीड़ितों को मदद मिलेगी।”

सीएनसी के अधिकारियों के अनुसार, “उन्होंने यह भी कहा कि कुछ अनैतिक तत्व बैंक खाते खोल रहे थे और उनमें सहायता राशि दान करने के लिए विज्ञापन दे रहे थे और इस प्रकार के 1,000 से अधिक खाते हैं। सरकार द्वारा इस पर रोक लगाए जाने की आवश्यकता है और धोखाधड़ी को रोकने के लिए एक उच्च स्तरीय जांच शुरू की जानी चाहिए।”

राहत प्रभावित शिविरों को तब तक बंद नहीं किया जा सकता जब तक कि अंतिम प्रभावित व्यक्ति की हालत में सुधार न हो जाए। “हम भी इस विचार से सहमत हैं कि हर कोडवा, जिसने अपना सब कुछ खो दिया है, को सरकार द्वारा पर्याप्त मात्रा में मुआवजा दिया जाना चाहिए। उन्हें नया आवास (कालोनी) उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि जिन किसानों की कई एकड़ कृषि योग्य भूमि और कॉफी के बागान नष्ट हो गए हैं उनका भूमि राजस्व रिकॉर्ड सरकारी कार्यालयों से पुनः निकाला जाना चाहिए और उन्हें उतनी ही भूमि दी जानी चाहिए।”

सीएनसी कुछ मीडिया हाउसों की भी आलोचना करती है जिन्होंने कोडगु बाढ़ पीड़ितों की सहायता करने के रूप में चल निधि द्वारा काफी मात्रा में धन इकट्ठा किया। समिति ने दावा किया कि उनमें से कुछ को काफी मात्रा में विदेशी सहायता राशि प्राप्त हुई है लेकिन वह प्रभावित लोगों तक कभी नहीं पहुंची। सरकार को जांच करनी चाहिए कि मीडिया हाउसों ने कितना धन इकट्ठा किया और उसमें से कितना दिया। सीएनसी ने अनुमान लगाया कि कोडगु और केरल के बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत राशि इकट्ठा करने के लिए 1,000 से अधिक खाते खोले गए थे।

मेट्टलु और सुरलाबिनाद गांवों के आपदा पीड़ितों ने उसी भूमि पर रहने का फैसला किया है जहां वे रहते थे, और उन्होंने सीएनसी को बताया कि वे सरकार द्वारा भूमि देने और कालोनी देने पर राजी नहीं हैं। सुरलाबिनाद के माच्याह कहते हैं कि दो गांवों में अब भी मलबा जमा हुआ है जिन्हें हटाने की जरूरत है, और उनके अनुसार दोनों गांवों में 100 से ज्यादा परिवार थे, इन परिवारों की कुल जमीन लगभग 600 एकड़ थी।

क्या रोहिंग्या मुसलमानों को कोडगु में शामिल किया गया था?

कोडवा लोगों ने आरोप लगाया कि पुनर्वास पर गड़बड़ी और अस्तव्यस्तता में, सरकारी एजेंसियों ने बांग्लादेशी नक्सल तत्वों और रोहिंग्या मुसलमानों को राहत शिविरों में रहने की इजाजत दी है। सीएनसी ने उप-आयुक्त (डिप्टी कमिश्नर) से लोगों की गिनती करने और राहत शिविरों में आश्रय पाने वाले प्रत्येक व्यक्ति के वंशजों का रिकॉर्ड तैयार करने को कहा। यदि यह नहीं किया जाता है, तो ये नक्सल तत्व और रोहिंग्या मुसलमान समाज में कोडगु जिले के निवासियों के रूप में मिश्रित हो जाएंगे।

रघुराम तटवर्ती कर्नाटक के निवासी हैं और सांप्रदायिक राजनीति पर लिखते हैं।