राजनीति
आखिर शिव सेना चाहती क्या है?
आखिर शिव सेना चाहती क्या है?

प्रसंग
  • शिव सेना के सामने तीन राजनैतिक विकल्प हैं – भाजपा के साथ रहना, यूपीए से सम्बन्ध बनाना और, गहन आत्म-मंथन।

“आखिर आप चाहते क्या हैं?”

हिंदी फिल्मों में बहुधा ये वाक्य नायिका उसे परेशान करते हुए खलनायक से पूछती है। यही प्रश्न आज कल महाराष्ट्र की जनता शिव सेना से कर रही है।

मुंबई में शिव सेना भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का समर्थन ले कर बृहनमुंबई महानगर पालिका में शासन कर रही है। महाराष्ट्र राज्य की देवेन्द्र फडनवीस सरकार में सेना के पाँच कैबिनेट एवं छः राज्य मंत्री सम्मिलित हैं। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में भी एक कैबिनेट मंत्री पद सेना के पास है। लेकिन ये आंकड़ें किसी को पता न हो और वो सेना के भाषण सुने, तो लगेगा कि भाजपा की सबसे बड़ी विपक्षी शिव सेना ही है।

2014 से ही शिव सेना फंसी हुई है। भाजपा के साथ राजनैतिक युति ना उगली जा रही है और ना ही निगले। भाजपा महाराष्ट्र में छोटे भाई की भूमिका निभाते निभाते एकदम फर्राटे से आगे निकल गई। और बड़ा भाई चार साल से हाथ मलते हुए सोच रहा है कि कैसे उसका खोया हुआ सम्मान वापस आये।

नगर निगम से ले कर लोक सभा के चुनावों तक में महाराष्ट्र की जनता ये कहते हुए थक गयी कि बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर। परंतु यह सच्चाई कड़वी है और सेना के गले उतर नहीं रही है। प्रत्येक दिन सेना का कोई ना कोई वक्ता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के विरुद्ध टीका-टिप्पणी कर ही देता है।

गौर से देखें तो शिव सेना के पास तीन राजनैतिक विकल्प हैं।

पहला और सबसे सुगम पथ है भाजपा के साथ बने रहना। इस विकल्प में 2019 के चुनावों के लिए सेना फिर से 20-22 लोक सभा और 144 विधान सभा (कुल संख्या की आधी) सीटों की मांग कर सकती है। भाजपा आसानी से तो नहीं परंतु 18-20 लोक सभा सीटें और 120 के लघभघ विधान सभा सीटें देने के लिए कदाचित् मान जाए। हां, सेना को भाजपा की प्रभुसत्ता स्वीकार करनी होगी।

परंतु सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के विरूद्ध उनके दल में दंगल होने की भी संभावना रहेगी। सेना के लिए यह स्लो मोशन डेथ विकल्प है। इस व्यवस्था में राज्य में युति की सरकार बनने पर भाजपा का ही मुख्यमंत्री बनेगा।

दूसरा और सबसे दुष्कर विकल्प है कांग्रेस एवं राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के साथ नये राजनैतिक संबंध बनाना। शिव सेना इन दलों से लड़ झगड़ के ही महाराष्ट्र की राजनीति में प्रासंगिक रही है। एकदम से इन्ही दलों के साथ समझौता करना बहुत बड़ा जोखिम उठाना होगा। तीन दल मिल कर लोक सभा की सीटों का आवंटन कैसे करेंगे? परंतु यह भी सच है कि इस युति के पास जातिगत समीकरण का ब्रह्मास्त्र होगा।

यदि सेना यह कदम उठाती है तो भाजपा भी सेना के असंतुष्ट नेताओं को अपने साथ जोड़ने का पूरा प्रयास करेगी। इस विकल्प में सेना टूट सकती है किन्तु एक सर्वदलीय गठबंधन में महाराष्ट्र की विपक्षी कमान संभालने का उत्तरदायित्व भी उठा सकती है। यह बहुत कठिन खेल है, परंतु सेना यदि स्वयं को महाराष्ट्र की सच्ची शक्ति मानती है, तो उसे इस फ्रंट फुट शॉट को खेलने से झिझकना नहीं चाहिए।

तीसरा और सबसे नैतिक कदम ये होगा कि शिव सेना अपने इतिहास में झांके। मुंबई की एक हिंदू पार्टी के रूप में सेना की पहचान बनी। मुंबई के मूलनिवासियों को कोई कठिनाई हो तो शिव सेना से सदा सहायता मिलेगी यह बात प्रत्याभूत थी। जय भवानी, जय शिवाजी की गूंज शिव सेना की प्रेरणा थी।

आज की पार्टी देखें तो उसका चाल, चरित्र, एवं चेहरा एक सौ अस्सी अंश घूमा दिखता है। जिन बांग्लादेशियों को मुंबई से बाहर रखने की बात बालासाहेब ने वर्षों वर्षों  की, उन्हीं को भारत में पनाह देने वाले काकाओं एवं दीदीयों के साथ आज के सैनिक दिखते हैं। जिस अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की निंदा करते करते सेना ने मुंबई के मिल क्षेत्र में अपनी धाक जमाई, अब वे स्वयं उसी नीति को अपना रहे हैं।

महाराष्ट्र में कल्याण-डोंबिवली एवं जलगांव ऐसे शहरी क्षेत्र हैं जहां भाजपा एवं शिव सेना राजनीति की दो धुरियां हैं। इन नगर निकायों में दो भगवा दलों का पूर्ण नियंत्रण है।

क्या शिव सेना स्वयं को भाजपा का विकल्प देखती है? क्या स्वयं के बल पर सेना अपनी स्वरूप एवं अस्तित्व विद्यमान रख सकती है? क्या शिव सेना भाजपा की दी हुई सत्ता से दूर रह कर अपने मूलभूत संरचना को पुनर्जीवित कर सकती है? यह वो प्रश्न हैं जो महाराष्ट्र की राजनीति को आने वाले वर्ष में परिभाषित करेंगे।

हिंदी फिल्मों में ये भी कहा गया है कि कभी कभी जीतने के लिए कुछ हारना भी पड़ता है। क्या शिव सेना समीपावधि में ठोकर खा कर दीर्घकालीन लाभ के लिए प्रयासरत होगी?

उद्धव ठाकरे के आसपास के परामर्शदाताओं को देख कर इस बात का संदेह बना रहेगा। क्या उद्धव ठाकरे और उनके पुत्र आदित्य भाजपा के भगवा से भी अधिक प्रगाढ़ रंग प्रदेश पर चढ़ाएंगे?

यदि इस प्रश्न का उत्तर ना है तो मध्यम  अवधि में शिव सेना का राजनैतिक पतन निश्चित है।