राजनीति
ममता बनर्जी को विरोधियों से निपटना नरेंद्र मोदी से सीखना चाहिए, जानें 2013 की घटना
जपन पाठक - 26th January 2021

सुभाष चंद्र बोस की 12वीं जयंती मनाने के लिए कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल से बेहतर स्थान नहीं हो सकता था। हालाँकि, कुछ लोगों द्वारा ‘जय श्री राम’ के नारे लगाने पर क्रोधित होकर ममता बनर्जी ने इस उत्कृष्ट कार्यक्रम को बिगाड़ दिया। उन्होंने कार्यक्रम में बोलने से मान करके अपनी “टिप्पणियों” को 2 मिनट से भी कम समय में समाप्त कर दिया।

यह ममता बनर्जी के लिए नया नहीं है- उन्होंने अपने तरीके से बहुत कुछ कह दिया। लेकिन अधिक पुरानी बात नहीं है जब अक्टूबर 2013 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अहमदाबाद में स्वयं को इसी स्थिति में पाया था। उस समय मोदी ने परिस्थिति का कैसे सामना किया था और शनिवार को ममता ने क्या किया, दोनों घटनाएँ एक-दूसरे के विपरीत हैं।

29 अक्टूबर को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सरदार पटेल संग्रहालय के उद्घाटन के लिए अहमदाबाद में थे। कार्यक्रम के आयोजक थे गुजरात कांग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री दिनशा पटेल। सरदार पटेल की जयंती पर कार्यक्रम होना था।

कार्यक्रम उस समय पर हो रहा था जब भारत के लोकसभा चुनावों में कुछ महीने ही शेष थे और एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार मोदी थे। कांग्रेस और उसका पारिस्थितिकी तंत्र मोदी के प्रति कैसी भावना रखता है, यह सर्व विदित था।

लेकिन फिर भी जब सिंह अहमदाबाद हवाई अड्डे पर पहुँचे तो मोदी उनके स्वागत के लिए उपस्थित थे। वहीं दूसरी ओर बनर्जी ने मोदी के स्वागत के लिए अपने एक मंत्री को भेजा। विशेष आयोजनों पर विशेष संकेत महत्त्व रखते हैं ताकि यह संदेश जाए कि अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेता प्रमुख राष्ट्रीय मुद्दों पर एक साथ हैं।

संग्रहालय के कार्यक्रम में मंच पर अधिकांश कांग्रेस नेता थे और दर्शकों में अधिकांश कांग्रेस समर्थक। भरत सोलंकी से शंकरसिंह वघेला तक गुजरात के शीर्ष नेता वहाँ उपस्थित थे। मुख्यमंत्री मोदी के प्रति लोग सत्कारशील नहीं थे (दूसरी ओर ‘जय श्री राम’ के कुछ नारे)।

लेकिन जब मोदी ने माइक उठाया तो असहजता या गुस्से का कोई भाव नहीं था। अपने वक्तव्य में उन्होंने अहमदाबाद नगर निगम के कार्यकाल में महिला आरक्षण, शहरी नियोजन और स्वच्छता के लिए सरदार पटेल के कार्यों की सराहना की। यूपीए सरकार से गुजरात को मिले पुरस्कारों को भी उन्होंने रेखांकित किया।

उन्होंने संदेश भी दिया कि भारत में माओवाद और आतंकवाद सफल नहीं हो सकेंगे। उन्होंने राजनीतिक बात भी कही- खेद प्रकट किया कि क्यों सरदार पटेल भारत के पहले प्रधानमंत्री नहीं बन सके लेकिन यह किया गया किसी को नीचा दिखाए बिना।

अपनी ओर से मनमोहन सिंह भी कांग्रेस द्वारा लिखी गई पटकथा पर चले, अन्य बातों के साथ उन्होंने सरदार पटेल की पंथनिरपेक्षता को रेखांकित किया। उनकी टिप्पणियों का लक्ष्य स्पष्ट था और इसपर चर्चा की जा सकती है लेकिन अशिष्ट भाषा के उपयोग का आरोप उनपर नहीं लगाया जा सकता।

वहीं विक्टोरिया मेमोरियल में ममता बनर्जी का व्यवहार एकदम विपरीत था। मनमोहन सिंह की तरह राजनीतिक टिप्पणी न करते हुए मोदी ने अपने लंबे भाषण में राजनीति को बिल्कुल दूर रखा। उनके वक्तव्य का केंद्र थे नेताजी बोस, उनके विज़न की आज उपयोगिता और पश्चिम बंगाल की महानता।

लोकतंत्र में राजनेताओं और काडर के बीच कहा-सुनी सामान्य है और स्वस्थ भी, जब तक उसमें शीलता और आदर हो। 2013 में अहमदाबाद और 2021 में कोलकाता की घटनाओं में कई समानताएँ हैं- भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख चेहरे का जयंती कार्यक्रम, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री दो अलग-अलग पार्टियों के।

लेकिन तब मुख्यमंत्री रहते हुए और अब प्रधानमंत्री रहते हुए मोदी को श्रेय देना होगा कि उन्होंने राजनीति नहीं की। उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ा कि अहमदाबाद में दर्शक उनके विरुद्ध थे या कोलकाता में नेताजी भवन जाते हुए कुछ टीएमसी समर्थकों ने उन्हें काले झंडे दिखाए (कुछ लोगों द्वारा ‘जय श्री राम’ के नारे लगाने से इसकी तुलना भी नहीं की जा सकती)। कुछ आयोजनों में गरिमामय आचरण आवश्यक होता है।

क्यों ममता बनर्जी ने नेताजी मेमोरियल कार्यक्रम में बोलने से मना कर दिया

यही वह जगह है जहाँ ममता बनर्जी ने गलती की। बड़े बहुमत के साथ लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गईं मुख्यमंत्री होने के नाते वे अपना विज़न बताकर कार्यक्रम की गरिमा बढ़ा सकती थीं लेकिन उन्होंने कुछ न कहकर सब कुछ कह देने का सरल मार्ग चुना। नरेंद्र मोदी ने इससे भिन्न आचरण किया और निस्संदेह ही वह अनुकरणीय है।