राजनीति
क्या तीनों राज्यों में भाजपा की हार का कारण ग्रामीण असंतोष था? डाटा से देखें

आशुचित्र- केवल ग्रामीण असंतोष ही भाजपा की हार का कारण नहीं था। कई राष्ट्रीय,राज्य स्तरीय तथा स्थानीय मुद्दों का परिणामों पर प्रभाव रहा।

हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने तीन प्रमुख हिंदी भाषी राज्यों में जीत दर्ज की है। इस 3-0 के आँकड़े का कारण राजनीतिक समीक्षकों द्वारा विमुद्रीकरण से पसरा ग्रामीण असंतोष बताया गया।

भारतीय जनता पार्टी को ग्रामीण क्षेत्रों में मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ में क्रमश: 31 प्रतिशत, 57 प्रतिशत तथा 68 प्रतिशत सीटों का नुकसान हुआ है।

तीनों राज्यों में कुल मिलाकर भाजपा ने ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी आधी सीटें खोई हैं।

चुनाव केवल एक ही कारण से जीते अथवा हारे नहीं जाते बल्कि परिणाम कई कारण तथा उनके मिश्रित असर पर निर्भर करता है।

  • मध्य प्रदेश में विधायकों के लिए एंटी इन्कम्बेंसी, मतदाताओं की भाजपा के लिए निराशा तथा एससी-एसटी अत्याचार रोकथाम अधिनियम प्रमुख कारण रहे।
  • राजस्थान में यही मूल कारण तथा विकास हेतु बदलाव को आवश्यक समझने की लोगों की प्रवृत्ति ने कांग्रेस को समर्थन दिया।
  • छत्तीसगढ़ में लोगों की बदलाव की चाहत, भ्रष्टाचार, आदिवासियों के अधिकार, अजीत जोगी फैक्टर, छत्तीसगढ़ी अस्मिता आदि चुनाव में प्रमुख भागीदार रहे।

बिना डाटा देखे भाजपा की हार का प्रमुख कारण ग्रामीण असंतोष को मान लेना बहुत जल्दबाजी का अनुमान है। यदि ग्रामीण असंतोष ही प्रमुख कारण होता तो कांग्रेस को ग्रामीण बहुल राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में स्पष्ट बहुमत मिलना था लेकिन वह बहुमत का आँकड़ा नहीं छू सकी। मध्य प्रदेश में 230 में से 183 सीटें ग्रामीण क्षेत्रों की हैं। वहीं राजस्थान में 200 में से 162 सीटें ग्रामीण क्षेत्रों की हैं। यदि ग्रामीण असंतोष ही हार का कारण होता तो कांग्रेस छत्तीसगढ़ के अलावा राजस्थान में भी स्पष्ट बहुमत हासिल कर सकती थी जबकि जहाँ बदलाव की प्रवृत्ति भी सहायक थी। यदि यह असंतोष ही कारण होता तो भाजपा ग्रामीण इलाकों में पिछली सीटों को पुन: नहीं जीत पाती। वहीं भाजपा ने ग्रामीण इलाकों में अपनी कुछ सीटों पर पुन: जीत हासिल की तथा कुछ सीटें कांग्रेस से भी छिन लीं। हमें निम्न डाटा पर गौर करना चाहिए-

मध्य प्रदेश-
यदि मध्य प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों का डाटा देखा जाए -# भाजपा ने 54 सीटें बरकरार रखी हैं, 68 सीटें हारी हैं तथा 30 नई सीटें जीती हैं।

  • 2013 में जीती ग्रामीण क्षेत्रों की  44 प्रतिशत सीटें भाजपा ने बरकरार रखी हैं ग्रामीण असंतोष की स्थिति में यह असंभव था।
  • वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा को मिली सीटों में 36 प्रतिशत सीटें उसने कांग्रेस से छिनी हैं।
  • कांग्रेस ने ग्रामीण क्षेत्र की अपने कब्ज़े वाली आधी सीटें खो दी हैं उसने 56 में से केवल 28 सीटों पर ही जीत बरकरार रखी है।

राजस्थान-
यदि हम राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों के परिणाम देखें-

  • भाजपा ने 49 सीटें बरकरार रखी हैं, 82 सीटें हारी हैं तथा सात नई सीटें जीती हैं।
  • तथाकथित ग्रामीण असंतोष के बावज़ूद भी 2013 में जीती 37 प्रतिशत सीटें भाजपा यह भी बरकरार रखने में सफल रही है।
  • वहीं 2013 के परिणाम सामान्य से हटकर थे तथा लाभ-हानि का प्रतिशत हमें सदैव सटीक दृश्य नहीं दिखा सकता।

छत्तीसगढ़-

वहीं यदि छत्तीसगढ़ के आँकड़ें देखें जाएँ-

  • भाजपा ने छ: सीटें बरकरार रखी हैं, 35 हारी हैं तथा सात नई सीटें जीती हैं।
  • जीती हुई सीटों में 50 प्रतिशत नई सीटें शामिल हैं, यह ग्रामीण असंतोष के हालात में असंभव है।

समान वोट प्रतिशत-

प्राप्त वोटों के संदर्भ में बात की जाए तो मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में भाजपा तथा कांग्रेस ने लगभग समान वोट हासिल किए हैं। कांग्रेस ने 40.5 प्रतिशत तथा भाजपा ने 39.5 प्रतिशत वोट हासिल किए हैं। राजस्थान में भाजपा ने 38 प्रतिशत तथा कांग्रेस ने 39 प्रतिशत वोट हासिल किए है। छत्तीसगढ़ में ऐतिहासिक जनादेश के कारण भाजपा ने 32 प्रतिशत तथा कांग्रेस ने 42 प्रतिशत वोट हासिल किए हैं।

एससी-एसटी अत्याचार रोकथाम अधिनियम का प्रभाव-

तीन राज्यों की कुल ग्रामीण सीटों में से 40 प्रतिशत एससी-एसटी आरक्षित जिसमें मध्यप्रदेश में 42 प्रतिशत, राजस्थान में 34 प्रतिशत तथा छत्तीसगढ़ में 50 प्रतिशत सीटें आरक्षित थीं। हमने यह देखा था कि दलित तथा आदिवासी समुदाय ने भाजपा के विरुद्ध वोट डाले और वह केवल ग्रामीण असंतोष के कारण नहीं था। मध्य प्रदेश में कांग्रेस का जेएवायएस के साथ गठबंधन ने उसे आदिवासी इलाकों में मदद की। राजस्थान में किरोड़ी लाल मीणा भी एसटी आरक्षित सीटों पर अधिक प्रभाव डालने में असफल रहे। छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी तथा मायावती ने भाजपा को कांग्रेस की तुलना में एससी-एसटी सीटों पर अधिक नुकसान पहुँचाया। भाजपा न तीनों राज्यों में कुल 141 ग्रामीण सीटें हारी हैं तथा इनमें से आधी से ज्यादा आरक्षित सीटें हैं।

  • मध्य प्रदेश में कुल 183 ग्रामीण सीटों में से 77 एससी-एसटी आरक्षित सीटें हैं। 2013 में भाजपा ने इन सीटों में से 53 जीती थीं वहीं 2018 में 24 की संख्या पर आ गई है।
  • राजस्थान में कुल 162 ग्रामीण सीटों में से 55 एससी-एसटी आरक्षित सीटें हैं। 2013 में भाजपा ने इन सीटों में से 46 जीती थीं वहीं 2018 में 16 की संख्या पर आ गई है।
  • छत्तीसगढ़ में कुल 78 ग्रामीण सीटों में से 39 एससी-एसटी आरक्षित सीटें हैं। 2013 में भाजपा ने इन सीटों में से 20 जीती थीं वहीं 2018 में पाँच की संख्या पर आ गई है।

अंत में यही कह सकते हैं कि ग्रामीण असंतोष भाजपा की हार का अकेला कारण नहीं था। कई राष्ट्रीय, राज्य स्तरीय तथा स्थानीय मुद्दों का परिणामों पर प्रभाव रहा और यह सीट-दर-सीट भिन्न थे।

अमिताभ तिवारी एक पूर्व कॉर्पोरेट और निवेश बैंकर हैं जो अब राजनीति और चुनावों में विशेष रुचि ले रहे हैं। उपरोक्त विचार इनके व्यक्तिगत हैं। इनका ट्विटर हैंडल @politicalbaaba है।