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इन्सेफलाइटिस के विरुद्ध उत्तर प्रदेश- डाटा व ज़मीनी पड़ताल की उत्साहजनक कहानी

आशुचित्र- पूर्वी उत्तर प्रदेश के सर्वाधिक प्रभावित 20 जिलों का डाटा दर्शाता है कि इन्सेफलाइटिस में दो वर्षों में 65 प्रतिशत की गिरावट हुई है। यह वर्ष परिवर्तन का सूचक है, जहाँ बीआरडी से अधिक मरीज़ों का उपचार प्राथमिक केंद्रों पर हुआ है। 

जानलेवा बीमारी एक्यूट इन्सेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस), आम भाषा में चमकी बुखार प्रति वर्ष पूर्वी उत्तर प्रदेश में त्राही मचाता है। माना जाता है कि 1978 से अब तक इसने अकेले गोरखपुर के बाबा राघव दास (बीआरडी) मेडिकल कॉलेज व अस्पताल में 10,000 जानें ली हैं।

यह वह वर्ष था, जब पहली बार क्षेत्र में इस बीमारी का लेखा-जोखा रखा गया था। एईएस एक ऐसी बीमारी है, जो दिमाग के बुखार से जुड़ी है। इसके 85 प्रतिशत शिकार 10 वर्ष की आयु से कम के बच्चे होते हैं।

गोरखपुर से 300 किलोमीटर तक के आसपास के क्षेत्र में 40 वर्ष पुराना बीआरडी अस्पताल ही एक मात्र आशा की किरण है। हालाँकि, चिकित्सालय द्वारा दिया गया हाल ही का डाटा किसी चमत्कार से कम प्रतीत नहीं होता है।

पिछले तीन वर्ष का डाटा बताता है कि इन्सेफलाइटिस के कारण मृत्यु में भारी गिरावट हुई है। इस डाटा में पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, नेपाल के सर्वाधिक प्रभावित 20 जिलों से बीआरडी आए मरीजों, गोरखपुर मंडल के छह जिला अस्पताल और 300 प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सम्मिलित किए गए हैं।

गोरखपुर मंडल में छह जिले आते हैं- योगी आदित्यनाथ का गढ़ गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया और महाराजगंज। हालाँकि, एक भी जान खोने का कोई बहाना नहीं हो सकता। फिर भी यह आँकड़ें दिल को सुकून देते हैं।

वर्ष 2018 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ऐक्शन प्लान का प्रभाव पहली बार देखने को मिला। पिछले वर्ष की तुलना में इन्सेफलाइटिस से पीड़ित होने वालों की संख्या आधी से भी कम हो गई। संभवतः इस वर्ष और अधिक गिरावट देखने को मिल सकती है।

मृत्यु संख्या में भारी गिरावट आई है। दो वर्षों में उपरोक्त सुविधा केंद्रों में कुल मिलाकर मृत्यु संख्या में 65 प्रतिशत की गिरावट हुई है। यह दावा आदित्यनाथ ने एक रैली में किया था।

बीआरडी में बच्चों के विभाग की प्रमुख डॉ महिमा मित्तल ने स्वराज्य  को बताया, “यह इन्सेफलाइटिस फैलने का शिखर काल है लेकिन हमारे सामने तुलनात्मक रूप से कम मामले आए हैं।” गोरखपुर मंडल के कुछ डाटा बिंदु-

  • 2015 में 1,951 लोग इस बीमारी से प्रभावित पाए गए थे, जिसमें से 338 की मृत्यु हो गई थी।
  • 2016 में 2,817 प्रभावित लोगों में से 426 की मृत्यु हो गई थी।
  • 2017 में 2,998 प्रभावित लोगों में से 380 की मृत्यु हो गई थी।

उत्तर प्रदेश में इन्सेफलाइटिस मामलों का डाटा-

बीआरडी मेडिकल कॉलेज, छह जिला अस्पताल और सैकड़ों पीएचसी का डाटा (2 अगस्त तक)-

हम देख सकते हैं कि बीमारी से प्रभावितों व मृतकों की संख्या वर्ष दर वर्ष बढ़ रही थी लेकिन 2018 में इन आँकड़ों में गिरावट देखी जा सकती है।

बीआरडी में इन्सेफलाइटिस वार्ड के भीतर

रामनिवास और गौरी देवी का सबसे बड़ सात वर्षीय पुत्र हल्के बुखार के साथ घर लौटा। अभिभावकों ने घर पर ही उसका उपचार करने का प्रयास किया लेकिन वह कुछ दिनों में उल्टी करने लगा।

वे निकटतम दवाखाने गए और स्टोर प्रबंधक की सलाह पर लैन 15 कैप्सूल खरीदे, जिनका एसिडिटी संबंधी पेट की समस्याओं के लिए उपयोग होता है। उल्टी रुक गई लेकिन जल्द ही बच्चे में झटकी (ग्रामीणों की भाषा में) के लक्षण देखे गए। यानी कि परिवर्तित मानसिक अवस्था।

“उसकी आँखें घूमती थीं और वह अपने आप चल नहीं पा रहा था।”, गौरी बताती हैं। उनके गूंगे पति मोटरसाइकल रिपेयर करके रोज़ी-रोटी कमाते हैं। दो सप्ताह पूर्व दंपत्ति 60 किलोमीटर की यात्रा कर देवरिया जिले के नौतन हथियागढ़ गाँव से गोरखपुर के बीआरडी आ गए।

अपने सात वर्षीय पूत्र के साथ बीआरडी में गौरी और रामनिवास

इन्सेफलाइटिस वार्ड में उनका बच्चा लेटा हुआ था और गौरी बताती हैं, “उसकी हालत में बहुत सुधार हुआ है। अब वह हमसे बात भी करने लगा है। हालाँकि, वह अब भी चल नहीं पा रहा है।”

बीआरडी में प्रथम वर्ष का एमडी छात्र, जो मरीज़ का फॉर्म भर रहा था, उनसे पूछता है, “आप पीएचसी क्यों नहीं गए?”
गौरी कहती हैं, “हमें क्या पता?”

डॉक्टर कहते हैं, “क्या आप हमें बच्चे के टीकाकरण के प्रमाण-पत्र दिखा सकते हैं?”
गौरी कहती हैं, “ये सब हमें क्या पता?”

डॉक्टर मेरी तरफ देखते हुए कहते हैं, “देखा आपने, टीकाकरण के प्रति जागरूकता के प्रयासों के बावजूद ये लोग उदासीन हैं।”

सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, देवरिया में दो जिला अस्पताल और लगभग 100 पीएचसी व सीएचसी हैं।

गौरी को डॉक्टर कहते हैं, “क्या आपके घर में कोई शिक्षित है? उनसे टीकाकरण की जानकारी को जल्द से जल्द वॉट्सैप करने को कहिए।”

एक नर्स आती है और एईएस के लक्षण दिखाने वाले इस बच्चे को दो सुई लगाती है। यह बच्चा इस वर्ष बीआरडी में इस बीमारी से प्रभावित 173 लोगों में से एक है, जिसमें से 30 को नहीं बचाया जा सका।

26 अगस्त को जब लेखिका यहाँ गई थीं तो यह बच्चा ही केवल इस वार्ड में था।

अपने कक्ष में डॉ मित्तल बताती हैं कि अनाड़ी वैद्यों के पास से आने वाले मरीजों की संख्या में भारी गिरावट आई है। “अधिकांश मरीज़ प्राथमिक या जिला स्तरीय स्वास्थ्य केंद्रों से रेफर होकर यहाँ आते हैं।”, वे कहती हैं।

वार्ड के बाहर अरशद अंसारी अपने परिवार के साथ ज़मीन पर बैठे हैं। उनका तीन साल का पुत्र भर्ती हुआ है व उसकी जाँच चल रही है। पेशे से दर्जी, अंसारी महाराजगंज के अमहवा खास गाँव से 100 किलोमीटर दूर यहाँ आए हैं।

अरशद अंसारी

हल्के बुखार से यह शुरू हुआ था और कुछ दिन में बच्चा उल्टी करने लगा था। फिर बच्चे ने अपने माता-पिता की आवाज़ पर प्रतिक्रिया देना भी बंद कर दिया और अपने आप ही कमज़ोर पड़ता गया। नौतनवा ब्लॉक के जिला अस्पताल ने उन्हें यहाँ भेजा।

“सुविधाओं में बहुत सुधार हुआ है।”, अरशद बताते हैं, जो कि कुछ वर्ष पहले अपनी माँ के इलाज के लिए यहाँ आए थे लेकिन निराश हुए थे। इस बार उन्हें अपने बच्चे के लिए आसानी से बेड मिल गया।

बीआरडी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अनाम रहने की इच्छा व्यक्त करते हुए बताया, “बीआरडी पर सुविधाओं में सुधार हेतु सरकार ने अपने ऐक्शन प्लान के तहत 100 करोड़ रुपये खर्च किए हैं।”

पिछले वर्ष अस्पताल को 71 बेड का नया विंग मिला था, जिसमें वेंटिलेटर और पीआईसीयू (पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट) सहित एक नव-निर्मित आईसीयू है। इसमें 78 रेडियेंट वॉर्मर्स हैं। मित्तल बताती हैं, “अब बच्चों के वार्ड में करीब 500 बिस्तर हैं।”

“देखभाल के लिए महत्त्वपूर्ण (क्रिटिकल केयर) उपकरणों में वृद्धि हुई है। कर्मचारी संख्या में भी वृद्धि हुई है। अब हमारे पास 100 से अधिक नर्सें हैं। विभाग और क्षमता बढ़ी है। सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि सरकार मरीज़ों द्वारा उपभोग की जा रही सभी चीज़ों का खर्च उठा रही है जैसे उनकी दवाइयाँ, भोजन और जाँच प्रक्रियाएँ।”, वे कहती हैं।

उन्नत इंफ्रास्ट्रक्चर के कारण बीआरडी में मृत्यु दर में काफी कमी आई है। काफी समय पहले इन्सेफलाइटिस से प्रभावित बीआरडी में एडमिट, हर तीसरा मरीज़ अपने प्राण खो बैठता था।

2017 में मृत्यु दर सुधरकर 15 प्रतिशत हुई। इसका श्रेय पूर्वी उत्तर प्रदेश के 38 जिलों में मानसून से पहले चलाए गए जेई (जापानी इन्सेफलाइटिस) टीकाकरण को दिया गया था, जिसमें 88 लाख बच्चों को लक्षित किया गया था। 2018 में मृत्यु दर 11 प्रतिशत थी। इस वर्ष अगस्त तक यह 9 प्रतिशत रही है।

साथ ही बीआरडी आने वाले मरीज़ों की संख्या में गिरावट हुई है, जिसका अर्थ है कि इस क्रिटिकल केयर सुविधा पर से भार कम हुआ है।

यह वर्ष परिवर्तन का सूचक है, जहाँ बीआरडी से अधिक मरीज़ों का उपचार प्राथमिक केंद्रों पर हुआ है। सरल शब्दों में कहा जा सकता है कि जैसे-जैसे बीमारी का प्रभाव कम हो रहा है, वैसे-वैसे अधिक मरीज़ों का उपचार प्राथमिक स्तर पर ही हो जा रहा है।

यह योजनानुसार ही है क्योंकि सरकार चाहती है कि इस बीमारी को प्राथमिक स्तर पर ही रोका जाए क्योंकि तब ही यह प्रभावी होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि 59 प्रतिशत मामलों में एईएस का पता ही नहीं चलता है (सरकारी ऐक्शन प्लान में बताया गया है)। इस बीमारी का इलाज नहीं है। केवल इसके लक्षणों का उपचार किया जा सकता है।

शुरुआती कुछ घंटों में बुखार को बढ़ने से पहले रोकना सबसे सटीक उपचार है। यह तब ही संभव है, जब लक्षणों की पहचान करके आवश्यक उपचार किया जाए। स्थानीय स्तर पर।

गोरखपुर मंडल में नोडल स्वास्थ्य अधिकारी डॉ वीके श्रीवास्तव ने बताया, “स्थानीय केंद्रों से बीआरडी तक लाने के लिए भी सरकार आवश्यकता होने पर मुफ्त परिवहन सेवा प्रदान कर रही है।”

गाँवों के भीतर- स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों की यात्रा

कुशीनगर जिले के हाटा ब्लॉक के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को हाल ही में तीन बेड वाला वेंटिलेटर से लैस पीआईसीयू मिला है (गोरखपुर मंडल के अंतर्गत स्थापित किए गए 12 पीआईसीयू और मिनि पीआईसीयू में से एक)।

हाटा ब्लॉक स्थित पीआईसीयू

यहाँ के निवासी व बच्चों के डॉक्टर लाल बाबू यादव बताते हैं, “यह बहुत आवश्यक सुविधा है और अभी तक इसने 26 मरीजों की सहायता की है। पिछली सरकार के समय से इस केंद्र पर एक इन्सेफलाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर (ईटीसी) है।”

स्वयं डॉ यादव इस केंद्र पर नव-नियुक्त हैं। उन्होंने बीआरडी पर कई वर्षों तक अध्ययन और कार्य किया है। वे रिकॉर्ड देखकर बताते हैं कि पिछले वर्ष केंद्र ने एईएस से पीड़ित 22 लोगों का उपचार किया था। इस वर्ष उनके पास मात्र आठ मामले आए हैं और कोई मृत्यु नहीं हुई है। “स्वच्छता के प्रति जागरूकता ने महत्त्वपूर्ण भूमिक निभाई है।”, वे बताते हैं।

10 किलोमीटर दूर डुमरी सवांगी पट्टी गाँव से गीता सिंह उनकी आठ वर्षीय बेटी, जिसे थोड़ा बुखार था, के साथ इस केंद्र पर आई थीं। उन्होंने कहा कि पहले उनके परिवार को कभी सीएचसी जाने लायक नहीं लगा और वे निजी डॉक्टरों के पास ही जाया करती थीं। इस बार उन्होंने आशा कार्यकर्ताओं की सलाह मानी और यहाँ आईं। “यह केंद्र काफी विकसित हो गया है।”, वे कहती हैं।

आठ वर्षीय बेटी के साथ गीता सिंह

40 वर्ष की आयु के आसपास का एक पुरुष पेट दर्द की समस्या के साथ यहाँ आया हुआ था। वह शिकायत करता है, “सारा ध्यान बुखार वाले बच्चों को ही दिया जा रहा है। उन्होंने मेरी जाँच नहीं की और मुझे दो दिन पहले वापस भेज दिया था।”

कुशीनगर के कासिया ब्लॉक में एक सीएचसी पर निवासी डॉक्टर अरुण कुमार पांडे डाटा देखकर बताते हैं कि  2017 में 17 एईएस मामले आए थे, जिनमें से तीन को बीआरडी भेजा गया था। 2018 में 11 मामले आए, जिनमें से हमें किसी को रेफर करने की आवश्यकता नहीं पड़ी। इस वर्ष केंद्र पर चार एईएस मरीज़ों का उपचार किया है और किसी को रेफर नहीं करना पड़ा। इस काल में कोई मृत्यु नहीं हुई है।

कासिया ब्लॉक का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र

डॉ पांडे इस सुधार का श्रेय सरकार के टीकाकरण व जागरूकता अभियान को देते हैं जो, 2018 में दस्तक नाम से चलाया गया था। इसके अंतर्गत, चिकित्सकों, नर्सों, आशा कार्यकर्ताओं, ग्राम सभाओं और शिक्षिकों को प्रशिक्षित कर स्वच्छता और निरोधक देखभाल के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए घर-घर भेजा गया था।

“गाँवों में कई महिलाएँ अपने बच्चों को शौचालय के बाद साफ करके हाथ नहीं धोती हैं। बच्चों के मैले को गंदा नहीं समझा जाता है। यदि महिलाएँ साबुन से हाथ धोती हैं तो उन्हें ताने मारे जाते हैं। जागरूकता अभियान ने इसे और ऐसी अजीब आदतों को सही किया।”, दिल्ली में कई वर्षों तक कार्य करने वाले डॉ पांडे ने बताया।

एक तरफ जहाँ डॉक्टरों-मरीज़ों से वार्ता और इन केंद्रों पर जाकर देखने से बीमारी के कम फैलाव और उससे भी काफी कम मृत्यु दर का अहसास हुआ, वहीं कुशीनगर के एक प्राथमिक केंद्र पर डॉक्टर ने इसमें एक गड़बड़ी के प्रति चिंता व्यक्त की।

उनके अनुसार, प्राथमिक केंद्रों पर डॉक्टरों पर इतना दबाव है कि वे कम मामलों को रिपोर्ट कर रहे हैं और मरीज़ों को बीआरडी भेजने से कतरा रहे हैं। इससे मरीज़ों की जान को खतरा उत्पन्न हो रहा है।

उन्होंने बताया कि नए निर्देशों में मरीज़ों को बीआरडी रेफर करते समय डॉक्टर को अपना नाम और फोन नंबर बताना होता है। “कई ऐसा करने से बचते हैं क्योंकि बाद में ‘तुच्छ रेफरल’ पर उनकी खिंचाई होगी। इसलिए मरीज़ों की जान दाँव पर लगाकर कुछ डॉक्टर उन्हें बीआरडी रेफर नहीं कर रहे हैं।”, उन्होंने कहा।

वहीं, डॉ यादव ने इस संभावना को नकार दिया। “इसका अर्थ केवल इतना है कि प्राथमिक केंद्रों पर डॉक्टरों की जवाबदेही बढ़ी है। यह अच्छी बात है। अब केवल उन्हें ऐसे मामलों से निपटने के लिए बेहतर प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है।”, उन्होंने कहा।

कुशीनगर के स्वास्थ्य केंद्र का प्रवेश द्वार

आसपास के गाँवों में ग्रामीणों से वार्ता ने स्थिति का एक मिश्रित चित्र प्रस्तुत किया। कुछ लोगों ने बताया कि आशा कार्यकर्ता नियमित रूप से उनसे मिलकर उन्हें स्वास्थ्य और स्वच्छता संबंधी जानकारी देती हैं। वहीं कुछ ने बताया कि टीकाकरण अभियान के अलावा उनसे कभी कोई मिलने नहीं आया।

दिमागी बुखार के विषय में जागरूकता और जानकारी व स्वास्थ्य केंद्रों पर भी मिश्रित प्रतिक्रिया मिली और यह आय, आयु और साक्षरता स्तर के अनुसार अलग-अलग थी। उदाहरण स्वरूप, 10वीं कक्षा तक पढ़ने वाली सुकरौली गाँव की 32 वर्षीय उषा देवी जानती थीं कि सुअरों से जेई फैलता है लेकिन 64 वर्षीय उनकी अशीक्षित पड़ोसी को इसके विषय में कोई जानकारी नहीं थी।

जेई क्यूलेक्स मच्छर के कारण होती है। मच्छर की यह प्रजाति वहाँ पनपती है जहाँ मानसून के समय धान रोपने के लिए पानी रोककर रखा जाता है। सुअर और बगुला जैसे पानी के पक्षी इसे फैलाने का काम करते हैं। हालाँकि कई महिलाओं ने बताया कि वे जानती हैं कि भूलना, अस्थिरता और चिड़चिड़ापन के लक्षण देखे जाने पर उन्हें तुरंत स्थानीय सरकारी अस्पताल पर ले जाना है।

क्षेत्र में एईएस कुछ इस प्रकार फैलता है- खेलने के बाद बच्चा अत्यधिक थका-हारा घर पहुँचता है। माता-पिता पाते हैं कि उसे बुखार है और मेडिकल स्टोर से बिना प्रिस्तक्रिप्शन के उसे दवाई दे देते हैं। कुछ घंटों या दिनों में बच्चा बेहोशी की हालत में बड़बड़ाना और भ्रमित महसूस करने के लक्षण दिखाने लगता है।

कुछ बच्चे कई घंटों तक बेहोश रहते हैं, कुछ को दौरे आते हैं, कुछ चल-फिर नहीं पाते, कुछ अपने माता-पिता को नहीं पहचान पाते, कुछ भ्रांत हो जाते हैं जैसे पंखा उनके ऊपर गिर रहा हो ऐसी चीज़ें उन्हें दिखाई देती है, कुछ को साँस लेने में परेशानी होती है। सामान्यतया परिजन बच्चे को निकटतम चिकित्सक के पास ले जाते हैं लेकिन जब हालत बिगड़ती है तो बीआरडी की तरफ दौड़ते हैं और पहले से खिंचाव में काम कर रहे चिकित्सालय पर और दबाव आ जाता है।

बच्चों के लिए सुविधाओं में वृद्धि होने के बाद अब यह अधिक बच्चों की देखभाल कर सकता है। हालाँकि, स्थानीय इकाइयों के सशक्तिकरण के साथ बीआरडी आने वाले मरीज़ों की संख्या घट भी रही है। भारतीय जनता पार्टी के उत्तर प्रदेश प्रवक्ता डॉ चंद्रमोहन इसका श्रेय “सरकार की इच्छा शक्ति” को देते हैं।

वे कहते हैं, “हमने इन्सेफलाइटिस से लड़ाई को प्राथमिकता दी।” उनके अनुसार इस समस्या को अकेले स्वास्थ्य विभाग पर छोड़ने की बजाय अनेक विभागों को इससे लड़ने का कार्य सौंपने से यह प्रभावी हो पाया है।

एक तरफ जहाँ योगी सरकार मार्च 2017 में सरकार गठित करने के बाद से कहती आ रही थी कि वे इस बीमारी के निदान के प्रति गंभीर हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार बनने के पाँच महीने बाद बीआरडी में ऑक्सीजन की कमी से शिशुओं की मृत्यु से पनपे विवाद ने उनके संकल्प को और बल दिया।

अब सरकार अपेक्षा से अधिक कर रही है। इस बीमारी से प्रभावित होने के बाद कई बच्चे लकवा, निष्क्रिय हाथ-पैर आदि विषमताओं को जीवन भर झेलते हैं इसलिए गोरखपुर में उनके लिए एक पुनर्वास केंद्र भी शुरू किया गया है। इसे कौशल विकास के लिए समेकित क्षेत्रीय केंद्र कहा जाता है। देशभर में ऐसे केवल 15 केंद्र हैं और उप्र के अलावा किसी प्रदेश में ऐसे दो केंद्र नहीं हैं। उप्र में ऐसा दूसरा केंद्र लखनऊ में स्थित है।

कौशल विकास हेतु समेकित क्षेत्रीय केंद्र, गोरखपुर

गोरखपुर केंद्र के निदेशक रमेश पांडे बताते हैं कि यहाँपर इस केंद्र का उद्देश्य इन्सेफलाइटिस से प्रभावित बच्चों की सहायता करना है। अभी तक इस केंद्र पर 12 ऐसे बच्चों की थैरेपी की जा चुकी है। “उपचार के बाद भी कई बच्चों को दौरे आते हैं तो कुछ को दिमागी पक्षाघात हो जाता है। कुछ गर्दन, हाथ-पैरों जैसे अंगों पर से नियंत्रण खो देते हैं। इन्हें दीर्घावधि तक सहायता चाहिए।”, पांडे ने बताया।

कुल मिलाकर इन्सेफलाइटिस की खतरनाक बीमारी से न सिर्फ स्वास्थ्य केंद्रों पर लड़ा जा रहा है बल्कि इससे बचाव और उपचार के लिए जागरूकता भी लाई जा रही है। और सबसे हृदयस्पर्शी बात यह है कि प्रभावित बच्चों के लिए पुनर्वासन केंद्र है जो उनके बाधित बचपन को एक नई दिशा देगा।

स्वाति गोयल शर्मा स्वराज्य में वरिष्ठ संपादक हैं। वे @swati_gs के द्वारा ट्वीट करती हैं।