राजनीति
उत्तर प्रदेश महागठबंधन- मतों के गणित की राह इतनी भी आसान नहीं

आशुचित्र- महागठबंधन का लाभ उठाने के लिए सपा और बसपा में सही तरह से मतों का ट्रांसफर होना अनिवार्य है और यहीं से समस्या शुरू होती है।

चुनाव पूर्व गठबंधन के माध्यम से उत्तर प्रदेश (उप्र) में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती और समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष अखिलेश यादव का एक साथ आना राज्य की राजनीति में एक ऐतिहासिक घटना है।

यह गठबंधन दो काम करने में सक्षम रहा है। सबसे पहला, इस गठबंधन ने 1995 में हुए लखनऊ गेस्ट हाउस की घटना के लगभग ढाई दशक के बाद बसपा और सपा के बीच तीव्र शत्रुता को खत्म कर दिया। याद रखने वाली बात यह है कि लखनऊ गेस्ट हाउस की घटना वही थी जहाँ एसपी के गुंडों ने मायावती को मारने की कोशिश की थी और इस प्रकार दोनों पक्षों के बीच संबंधों में लंबे समय से रिश्तों में खटास रही। दूसरा इसने 1993 के इतिहास के पहियों को पीछे कर दिया जब बसपा के कांशीराम और सपा के मुलायम सिंह यादव ने विधानसभा चुनाव में चुनाव के पूर्व उन्होंने गठबंधन किया था।

1993 में सपा ने 256 सीटों पर और बसपा ने 164 सीटों पर चुनाव लड़ा। सपा ने 17.94 प्रतिशत के वोट शेयर के साथ 109 सीटें जीतीं और बसपा ने 11.12 प्रतिशत के वोट शेयर के साथ 67 सीटें जीतीं। सपा को 17.94 फीसदी और बसपा को 11.12 फीसदी वोट मिले। उनका संयुक्त वोट शेयर 29.06 फीसदी था। दिलचस्प बात यह है कि 256 निर्वाचित क्षेत्रों में लड़े चुनावों में सपा का वोट शेयर 29.48 प्रतिशत और बसपा का 164 निर्वाचित क्षेत्रों में वोट शेयर 28.53 प्रतिशत था।

चुनाव लड़ने वाले निर्वाचन क्षेत्रों में सपा और बसपा के पास समान वोट शेयर और वह भी उनके संयुक्त कुल वोट शेयर के लगभग समान ही थे और यह एक स्पष्ट संकेत था कि दोनों पार्टियों ने अपने वोट एक दूसरे को हस्तांतरित कर दिए थे।इन्होंने 4 दिसंबर 1993 को मुलायम सिंह यादव के साथ मुख्यमंत्री (सीएम) के रूप में सपा-बसपा की सरकार बनाई।

1993 उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों में सपा और बसपा
क्या अखिलेश-मायावती इतिहास दोहरा सकते हैं?
यहाँ पूछा जाने वाला महत्त्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या अखिलेश और मायावती यूपी में 2019 के लोकसभा चुनावों में इतिहास दोहरा पाएँगे?

1993 के बाद से गोमती में बहुत पानी बह चुका है। 1993 में सपा-बसपा के साथ आने के बाद कांशीराम के ‘ऑल इंडिया बैकवर्ड (एससी, एसटी और ओबीसी) और अल्पसंख्यक समुदायों कर्मचारी महासंघ’ (बीएएमसीईएफ) के माध्यम से अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और दलितों के बीच लंबे समय तक सामाजिक बंधन 1978 के बाद से बना रहा। गठबंधन के पीछे एक और कारण भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खिलाफ उनकी आम दुश्मनी थी जो एक साल पहले 6 दिसंबर 1992 को ‘रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद’ विध्वंस के कारण उन्हें एक साथ आने का एक और कॉमन एजेंडा मिला। 2019 में उनका साथ आना उनके और दलित और ओबीसी जैसे सामाजिक समूहों के बीच एक चौथाई सदी से चली आ रही तीव्र दुश्मनी है जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं।

इसका एक और पहलू 2014 के बाद से उप्र में भाजपा की लगातार बढ़त भी है। भाजपा ने वास्तव में राम मंदिर निर्माण पर हिंदू दक्षिणपंथी द्वारा डाला गया दबाव को किनारे रखा और विशुद्ध रूप से विकास का एजेंडा और समावेशी राजनीति को अपनाया है जिसका नतीजा यह रहा कि दलित और ओबीसी दोनों ही पार्टी में काफी हद तक एकीकृत हो चुके हैं।

इसके अतिरिक्त, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जाति ने पिछड़े समुदायों को ओबीसी नेतृत्व में एक विकल्प दिया है। लोकसभा (2014) और विधानसभा चुनाव (2017) में भाजपा की भारी जीत ने पार्टी को दलित-ओबीसी सांसदों और विधायकों की एक बड़ी टुकड़ी के साथ प्रदान किया है जो दलितों और ओबीसी तक पहुंच बना सकते हैं और इन दो उप-समूहों को एकीकृत कर सकते हैं।

इसके अतिरिक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जाति ने पिछड़े समुदायों को ओबीसी नेतृत्व में एक विकल्प दिया है। लोकसभा (2014) और विधानसभा चुनाव (2017) में भाजपा की भारी जीत ने पार्टी को दलित-ओबीसी सांसदों और विधायकों की एक बड़ी टुकड़ी का साथ प्रदान किया है जो दलितों और ओबीसी तक पहुंच बना सकते हैं और इन दो उप-समूहों को एकीकृत कर सकते हैं।

इस आलोक में उप्र में 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के भाग्य पर वर्तमान सपा-बसपा गठबंधन के प्रभाव का सावधानीपूर्वक आकलन करने की आवश्यकता है।

वोटों की हस्तांतरणीयता- मिथक या वास्तविकता?
मार्च 2018 में गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव के आधार पर वोटों के हस्तांतरण के बारे में कई लोगों ने अनुमान लगाने की कोशिश की। सपा-बसपा गठबंधन ने इन दोनों उपचुनावों में भाजपा को हराया जबकि इन दोनों सीटों का प्रतिनिधित्व भाजपा के राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य द्वारा किया गया था।। हालाँकि वे यह भूल जाते हैं कि उप-चुनावों में बसपा ने भाग नहीं लिया था और इसलिए दलित वोट आसानी से सपा उम्मीदवारों को हस्तांतरित हो सके थे। क्या 2019 के लोकसभा चुनावों में भी दलित वोटों का सपा को हस्तांतरण संभव होगा?

कई कारणों से संभावनाएँ बहुत क्षीण हैं।

एक, 2019 के संसदीय चुनावों की तैयारी में जुटे 80 लोकसभा उम्मीदवारों की तरफ से बसपा को कई परेशानियों का सामना करना होगा क्योंकि अब वह केवल 38 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। अस्वीकृत उम्मीदवारों के राजनीतिक भविष्य को एक बड़ा झटका लगेगा क्योंकि उनके निर्वाचन क्षेत्रों को सीट बँटवारे के कारण सपा को सौंप दिया जाएगा। हर संभावित बीएसपी उम्मीदवार की रातों को नींद हराम हो रखी है की मायावती द्वारा ना जाने किसको सीट मिलेगी या कौन बली का बकरा बनेगा। क्या बली का बकरे बने सभी उम्मीदवार अभी भी सपा उम्मीदवारों का समर्थन करेंगे जिनके पास राजनीतिक दुश्मनी का लंबा इतिहास है? सपा के उम्मीदवारों पर भी यही बात लागू होती है। अखिलेश यादव को भी अपने 40 उम्मीदवारों को बाली का बकरा बना पड़ेगा।शायद अभी तक दोनों पार्टियों  ने आने वाले उस भूकंप को नहीं भांपा है जो उनके अचानक सीट के बटवारे से पार्टी के अंदर आने वाला है।

दो, मायावती और अखिलेश यादव ने चुनावी गठबंधन के अंकगणित पर विचार तो किया है लेकिन सामाजिक गठबंधन के रसायन शास्त्र पर नहीं। ओबीसी को सामाजिक पदानुक्रम में दलितों के टकराव की स्थिति में रखा गया है और इसलिए एसपी-बीएसपी के शीर्ष नेताओं के शामिल होने का मतलब यह नहीं है कि दो सामाजिक समूह एक साथ आ सकते हैं। यहाँ तक ​​कि कुछ पार्टी के वफादारों को अपने नेताओं की आज्ञाओं का पालन करते हुए कई लोग कांग्रेस या भाजपा से दूर भी हो सकते हैं।

तीसरा, मायावती को बसपा के वोटरों में से जो भी पार्टी चाहे वे उन्हें स्थानांतरित करने की अपनी क्षमता के लिए जाना जाता है लेकिन वहीं अखिलेश ऐसी किसी भी क्षमता के लिए नहीं जाने जाते हैं। 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव-राहुल गांधी के गठबंधन में इसकी एक साफ झलक नज़र आई। यादव ने माना था कि वोटों के निर्बाध हस्तांतरण के साथ गठबंधन को 300 से अधिक सीटें मिलेंगी। लेकिन यह अखिलेश यादव के साथ सिर्फ 47 सीटें और कांग्रेस केवल सात सीटों के साथ हाँफती रही।

अंत में, भाजपा के सहयोगियों और सपा-बसपा-कांग्रेस गठबंधन के बीच एक द्विध्रुवी प्रतियोगिता भाजपा के लिए निश्चित रूप से बहुत चुनौतीपूर्ण होती लेकिन अब कांग्रेस निश्चित रूप से सपा-बसपा गठबंधन को नुकसान पहुँचा सकती है और इस तीन-स्तरीय प्रतियोगिता में दोनो के वोट  बैंक में सेंध लगेगी। इसके अतिरिक्त शिवपाल सिंह यादव की प्रगतिशील समाज पार्टी लोहिया (पीएसपीएल) की वजह से भी अखिलेश यादव के वोट बैंक में सेंध लग सकती है।

एक पल के लिए अगर यह मान लें कि 2017 के विधानसभा चुनावों में सपा और बसपा ने कुल सीटों में से आधी सीटों पर चुनाव लड़ा और उनका संचयी वोट शेयर 22.03 प्रतिशत (संचयी वोट शेयर का आधा हिस्सा वे सभी सीटों पर चुनाव लड़कर प्राप्त किया) जबकि उन्हें 1993 के विधानसभा चुनावों में 29.06 प्रतिशत वोट मिले थे।

2017 विधान सभा चुनावों में सपा-बसपा का प्रदर्शन
काल्पनिक रूप से अगर हम मानते हैं कि सपा-बसपा अपने 2017 के वोट शेयर को बनाए रखने में सक्षम होंगे तो कम से कम उस स्थिति में वे 2019 में यूपी में 13 से 15 लोकसभा सीटें जीत सकते हैं। लेकिन अगर वे वोट ट्रांसफर करने में विफल रहते हैं तो एक दूसरे को और अपने रैंकों से परित्याग का सामना करना पड़ सकता है और फिर से उन्हें उसी अपमान का सामना कर सकते हैं जो उन्हें 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान करना पड़ा था जिसमें सपा सिर्फ पाँच लोकसभा सीटों पर सिमट गई थी और बसपा को खाली हाथ ही रहना पड़ा था।

इसलिए एक दुर्जेय सपा-बसपा गठबंधन के सामने उत्तर प्रदेश में खेल अभी भी व्यापक रूप से चालू है।

एके वर्मा कानपुर में सामाजिक एवं राजनीतिक अध्ययन केंद्र के निदेशक हैं।