राजनीति
उत्तर प्रदेश में ‘अतिरिक्त कोविड मौतों’ पर चयनित डाटा गलत चित्र प्रस्तुत करता है

हाल ही में एक रिपोर्ट आई जिसमें उत्तर प्रदेश का मृत्यु डाटा सूचना के अधिकार (आरटीआई) के माध्यम से प्राप्त किया गया था जो कि पारदर्शिता की दिशा में एक सराहनीय कदम है। लेकिन जिन अवधियों की बात इसमें की गई थी, वह अजीब था।

सिर्फ इसलिए यह डाटा अजीब नहीं था कि जुलाई 2019 से मार्च 2020 और जुलाई 2020 से मार्च 2021 के बीच नौ-नौ माहों की अवधि ली गई है, बल्कि इसलिए भी अजीब था क्योंकि लॉकडाउन के विरूपण भी इसमें हैं।

पहली अवधि में मृत्यु आँकड़े कम थे क्योंकि मार्च के अंतिम 10 दिनों में लॉकडाउन रहा था और दूसरी अवधि में मृत्यु आँकड़े अधिक हैं क्योंकि जून 2020 में लॉकडाउन खुला था और जुलाई तक पुराने आँकड़े जोड़े जाते रहे होंगे।

ये जो अवधियाँ चुनी गई हैं, ये न तो कैलेंडर वर्ष के अनुसार हैं, न वित्तीय वर्ष और न ही कोविड-19 की पहली या दूसरी लहर के अनुसार। इन सभी विसंगतियों को अनदेखा कर भी दें तो यदि यह विश्लेषण मात्र डाटा और उसी से निष्कर्ष निकालता तो उत्तर प्रदेश की कोविड-19 परिस्थिति को समझने में हमारी सहायता होती।

दुर्भाग्यवश, सभी डाटा के निष्कर्ष बताने की बजाय विश्लेषण में कुछ डाटा का ही उपयोग किया गया है। रिपोर्ट में प्रदेश के 75 जिलों में से मात्र 24 चयनित जिलों की ही बात है। दोनों अवधियों के बीच मौतों में 110 प्रतिशत (1.97 लाख अतिरिक्त मौतें) का अंतर है।

इस भ्रमित करने वाले तथ्य को काफी रेखांकित किया गया। इस प्रकार का चयनित डाटा कितना निरर्थक है, इसे आप 2017-19 के नागरिक पंजीयन सेवा (सीआरएस) के डाटा के समान विश्लेषण से देखें जहाँ हम सर्वाधिक मौत वाले 24 जिलों को चयनित कर लेते हैं।

आप देख सकते हैं कि मन से चुने हुए जिलों में वृद्धि अत्यधिक है, कुछ में तो कुल वृद्धि की 6-15 गुना वृद्धि देखी गई, वह भी कोविड से काफी पहले। जिलों के डाटा में किसी भी वर्ष में काफी अंतर रहता है, विशेषकर उन राज्यों में जहाँ पंजीयन प्रणाली कमज़ोर है, वहाँ यह अपेक्षित होता है।

रिपोर्ट में रेखांकित 110 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश के मृत्यु ट्रेंड की बजाय विश्लेषण के लिए अपनाए गए तरीकों के विषय में अधिक कहते हैं। इस बात की पुष्टि इस तथ्य से भी हो जाती है जो रिपोर्ट में लिखा है कि 20 अन्य जिलों में (2 से 48 प्रतिशत) की गिरावट भी देखने को मिली है लेकिन विश्लेषण में इन 20 जिलों को नहीं जोड़ा गया।

(इसी प्रकार ओडिशा के उदाहरण में भी देखा गया जहाँँ चयनित 24 जिलों की बजाय सभी 30 जिलों को लेने पर अतिरिक्त मौतों के अनुमान में 50 प्रतिशत की गिरावट देखने को मिली। यहाँ लेखक ने चयनित जिलों और सभी जिलों, दोनों के ट्रेंड साझा करके सही किया।)

लेकिन बात इससे अधिक है। मैंने उल्लेख किया कि लॉकडाउन के कारण संभवतः जुलाई 2019 और मार्च 2020 के बीच, विशेषकर मार्च के अंतिम दिनों में मृत्यु के आँकड़े कम हुए। इस अवधि की मासिक मृत्यु 2018 से 28 प्रतिशत और 2019 से 21 प्रतिशत कम है।

आप नीचे दी गई टेबल में देखें कि कैसे अध्ययन की अवधि के आँकड़े 2018 और 2019 के कम हैं। यदि हम तुलना करने के लिए 2018 का वर्ष ले लें, तब भी ‘अतिरिक्त’ मौतों का आँकड़ा 36 प्रतिशत से घट जाएगा।

परिणामों में इस अत्यधिक उछाल के लिए कई कारण उत्तरदायी हैं लेकिन यह विश्लेषण हमें उत्तर प्रदेश की अतिरिक्त मौतें को बारे में क्या बताता है? कुछ भी नहीं।

वास्तविकता यह है कि उत्तर प्रदेश में अतिरिक्त मौतें त्रुटिपूर्ण अवधियों को लेकर चयनित विश्लेषण के रेखांकित परिणाम से काफी कम हैं। विश्लेषण यह बताता है कि पूरा डाटा होने के बावजूद भी रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख नहीं है कि पूरे उत्तर प्रदेश में क्या परिस्थिति है।

एक ऐसा प्रणालीगत डाटा उजागर करना जो किसी महत्त्वपूर्ण विषय को समझने में हमारी सहायता करे, जन सेवा होगी। हालाँकि, विश्लेषक की भूमिका यहीं समाप्त नहीं हो जाती है। यदि पारदर्शिता के साथ डाटा साझा नहीं किया जाए तो वह लोगों के हित में नहीं होगा।

अलग दिखने वाले डाटा बिंदुओं को जान-बूझकर चुन लेने से विश्लेषण बदतर हो जाता है। किसी भी विश्लेषण में कुछ पूर्वधारणाएँ अपनाने के लिए विश्लेषक स्वतंत्र होता है लेकिन डाटा वस्तुनिष्ठ होता है, इसके ऊपर आप पूर्वधारणाएँ नहीं थोप सकते हैं।

इस विश्लेषण की आलोचना के बाद आप उत्तर प्रदेश में सभी कारणों से हुई मृत्यु आँकड़ों का निम्न चार्ट देखिए। प्रत्यक्ष है कि 24 चयनित जिलों में दिखाई गई 110 प्रतिशत की वृद्धि के विपरीत उत्तर प्रदेश में दैनिक मौत पंजीयन 2020 में एकल अंक से भी बढ़े थे।

तथ्य है कि सीआरएस 2019 के अनुसार उत्तर प्रदेश में औसत रूप से 79,000 मासिक मौतें होती थीं, यानी उपरोक्त चित्र में लाल रेखा को और ऊपर होना चाहिए था। हालाँकि, यह अंतर स्रोत डाटा और सीआरएस डाटा के अंतर के कारण हुआ होगा, जान-बूझकर नहीं किया गया है।

स्पष्ट है कि लॉकडाउन के कारण मार्च से मई के बीच मौत पंजीयन कम हुए। हालाँकि इनमें से कुछ को लॉकडाउन की समाप्ति के बाद जोड़ दिया गया होगा जिससे अंतर कर पाना अब असंभव है।