भारती / राजनीति
ठाकरे पूछें कि कंगना रनौत के बयानों पर मुंबई क्रुद्ध हो या शहर की बुरी अवस्था पर

यह देखकर तरस आता है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने अभिनेत्री कंगना रनौत पर अप्रत्यक्ष रूप से निशाना साधा है, वहीं पार्टी के बड़बोले नेता संजय राउत और गृह मंत्री अनिल देशमुख ने तो रनौत को अप्रत्यक्ष धमकी देते हुए सीधे ही कह दिया है कि यदि अभिनेत्री मुंबई में असुरक्षित महसूस करती हैं तो उन्हें लौटने की आवश्यकता नहीं है। दूसरी ओर रनौत ने कई बातों के बीच कहा था कि उन्हें मुंबई पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) जैसा लगता है।

कल (7 सितंबर) को मुख्यमंत्री ने रनौत, राउत और देशमुख के बीच शब्द-युद्ध की अप्रत्यक्ष रूप से बात करते हुए कहा, “कुछ लोग उस शहर के प्रति कृतज्ञ होते हैं जहाँ वे रहते और कमाते हैं लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनमें यह कृतज्ञता नहीं है।”

यह बयान नपा-तुला और राउत एवं देशमुख के बयानों की तरह भड़काऊ नहीं है, फिर भी इसके साथ समस्या यह है कि यह गुण-विहीन पूर्ण रूप से एक राजनीतिक बयान है और उस मुख्यमंत्री पर शोभा नहीं देता जिसके राज्य का शासन दुरुस्त न हो। सिर्फ महाराष्ट्र में रहने-कमाने के कारण नागरिक बुरे इंफ्रास्ट्रक्चर, खराब परिवहन सेवाओं या पुलिस विफलताओं (जैसे पालघर में दो साधुओं की हत्या और सुशांत सिंह मौत मामला) के प्रति “कृतज्ञ” हों, ऐसी अपेक्षा रखना गलत है।

ऐसी कोई प्रतिक्रया हमें देखने को नहीं मिली थी जब अभिनेता आमिर खान ने भारत में असुरक्षित महसूस करने जैसी बात पाँच वर्ष पहले कही थी। खान ने कहा था कि उनकी पत्नी विचार करती हैं कि क्या उन्हें भारत छोड़कर चले जाना चाहिए।

उस समय शिवसेना भाजपा के साथ महाराष्ट्र और केंद्र दोनों जगहों पर सत्ता में थी लेकिन खान से देश छोड़कर जाने और वापस न लौटने के लिए किसी ने नहीं कहा था।अब रनौत को अपनी कार्यस्थली मुंबई लौटने के लिए केंद्र से वाई श्रेणी की सुरक्षा देनी पड़ रही है।

ठाकरे को स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि महाराष्ट्र या मुंबई को किस बात पर अपमानित महसूस करना चाहिए? एक अभिनेत्री के बयान पर कि जिस शहर में वह रहती और काम करती है वहाँ का माहौल उसे ठीक नहीं लगता या शहर और राज्य की वास्तविक अवस्था पर?

भारत की व्यापारिक राजधानी में रहने और कमाने वाले अधिकांश लोग अपनी नौकरियों और अन्य स्थानों से बेहतर वेतन मिलने के प्रति कृतज्ञ हैं। वे जिससे असंतुष्ट हैं, वह है मुंबई और राज्य के अन्य स्थानों पर इंफ्रास्ट्रक्चर का बुरा हाल। यदि वह राज्य जो देश में सर्वाधिक कर और आर्थिक वृद्धि का भागीदार है, वह पुलिस या इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में उदाहरण नहीं प्रस्तुत कर सकता तो यह किसकी गलती है?

ठाकरे की शिवसेना मुंबई में दीर्घकाल से सत्ता में है लेकिन शहर में विश्व की सबसे बड़ी झुग्गी-बस्ती (स्लम), खराब इंफ्रास्ट्रक्चर, सबसे महंगे घर और निम्न जीवन स्तर है। लेकिन इससे ठाकरे या राउत या देशमुख अपमानित महसूस नहीं करते हैं जबकि रनौत के बयानों से उनका पारा चढ़ जाता है।

महाराष्ट्र, विशेषकर मुंबई, पुणे और ठाणे में सर्वाधिक कोविड-19 संक्रमण है लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य की विफलता से ठाके और राउत के अभिमान को ठेस नहीं पहुँचती है। रनौत के बयानों पर तुरंत प्रतिक्रिया आ जाती है, उनकी आलोचना होती है और नगर निगम के अधिकारी भी देखने पहुँच जाते हैं कि उनके कार्यालय ने किसी नियम का उल्लंघन तो नहीं किया है। रनौत के बायनों से पहले उन्हें किसी उल्लंघन की चिंता नहीं थी लेकिन अब हो गई है।

रनौत का करियर बनाने में भूमिका निभाने वाले शहर के प्रति कृतज्ञता के अभाव के प्रति चिंतित होने की बजाय ठाकरे को इससे चिंतित होना चाहिए कि कैसे राज्य नागरिकों, स्थानीय या प्रवासियों, को निराश कर रहा है। ठाकरे किसपर लज्जित महसूस करें, उसकी एक आंशिक सूची यहाँ दी हुई है-

पहला, राजनेताओं और नौकरशाहों की मूक सहमति में भू-माफिया ने अचल संपत्ति के बड़े टुकड़ों को हड़प लिया है और इसलिए भारत में मुंबई मेट्रपॉलिटन क्षेत्र की भूमि सबसे महंगी है। इससे राज्य के शहरी क्षेत्रों में रहने वाले 99 प्रतिशत लोग घर खरीद नहीं पाते। शिवसेना और इसके नेताओं को इसपर लज्जित होकर सिर झुकाना चाहिए, न कि किसी अभिनेता के बयानों पर ताव दिखाना चाहिए।

दूसरा, मुंबई की सड़कों पर हर मानसून में पानी भरा होता है, गड्ढों के कारण गाड़ियों की गति अत्यंत धीमी होती है। भारत के दो मेट्रो शहरों, मुंबई और ठाणे में लंबे समय से सत्ता धारण करने वाली शिवसेना को अपनी इस विफलता पर लज्जित होना चाहिए।

तीसरा, मुंबई की सब-अर्बन ट्रेन जिसे शहर की जीवन रेखा भी कहा जाता है, वह केंद्र का उपहार है। क्या ठाकरे इसके प्रति कृतज्ञ हुए हैं? राज्य के योगदान से इस नेटवर्क और शहरी परिवहन इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाने की बजाय ठाकरे के बेटे आदित्य के नेतृत्व में आरे कॉलोनी के लिए पर्यावरण का मुद्दा उठाकर तत्कालीन भाजपा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस द्वारा शुरू की गई मेट्रो परियोजना को धीमा करने का प्रयास किया गया था।

फडणवीस सरकार द्वारा तीव्र गति से मेट्रो, मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे पर किए गए प्रगति कार्य और 1990 के दशक में भाजपा के नितिन गडकरी द्वारा निर्मित अनेकों फ्लाईओवर के प्रति ठाकरे कृतज्ञ नहीं हैं। ठाकरे को इसपर शर्म नहीं आती कि मुंबई और नवी मुंबई को जोड़ने वाले समुद्री पुल (ट्रान्स-हार्बर लिंक) की परियोजना जो शहर के केंद्र का भार कम कर सकती थी, वह 20 वर्षों से धूल खा रही है।

इस परियोजना में अचल संपत्ति के निहित स्वार्थों के कारण विलंब हुआ जो चाहते थे कि विकल्प तलाशे जाएँ उससे पहले वे महंगी दरों पर केंद्रीय मुंबई की संपत्तियाँ बेचें। किसी नागरिक को जानवरों की तरह धक्के खाकर ट्रेनों में यात्रा करने के लिए विवश नहीं होना चाहिए लेकिन शहर की संपत्ति ने नागरिकों की सेवा करने की बजाय राजनेताओं की जेब भरी है।

एक राज्य पूंजी जो अपने नागरिकों के साथ ऐसा व्यवहार करती है, उसके प्रति नागरिक कैसे कृतज्ञ हों, इसका अनुमान आप ही लगाइए। रनौत अकेली नहीं हैं जो इससे क्रुद्ध हैं कि शहर और राज्य कैसे चल रहा है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।