राजनीति
वाजपाई का नेहरू के रूप में चित्रण

वही लोग जो वाजपेई को “भाजपा में कांग्रेसी” के रूप में चित्रित करने का प्रयास करते हैं, उन्ही लोगों ने वाजपेई के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया था जब वह प्रधानमंत्री थे।

पिछले हफ्ते राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने यह साबित कर दिया कि वह अपने से पहले वाले राष्ट्रपति से हट कर हैं जब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के आवास पर वह उन्हें भारत रत्न से सम्मानित करने के लिए गए थे।

लंबे समय से सेवानिवृत्त वरिष्ठ भाजपा नेता के लिए यह एक विलंबित सम्मान था और केवल यूपीए की अशिष्टता के कारण वह इस सम्मान से वंचित थे। प्रधानमंत्री वाजपेई कुछ उन प्रधानमंत्रियों में से एक हैं जिनके लिए कार्यालय छोड़ देने के बाद भी सार्वजनिक स्मृति संवेदनापूर्ण रही है। चाहे वह उनकी राजनीतिक प्रतिभा हो या स्पष्ट वाक-चातुर्य दोनों के माध्यम से उन्होंने करोड़ों देशवासियों के दिलों पर राज किया।

इसके बावजूद, भारत रत्न के पुरस्कार के बाद लिखे जाने वाले लेखों और चर्चाओं पर नज़र रखते हुए कोई सहायता तो नहीं कर सकता लेकिन आश्चर्यचकित हो सकता है साथ ही आज कल की खुला खेल फर्रुखाबादी वाली राजनीति में अटल बिहारी वाजपेई की विरासत भी आलोचना योग्य है।

वाजपेई के राजनीतिक कद और सार्वजनिक लोकप्रियता ने किसी के लिए भी पुरस्कार की योग्यता पर सवाल उठाना लगभग असंभव बना दिया। नई दिल्ली के संस्थान, हमेशा से भाजपा के विरोधी, ने वाजपेई की इस उदार छवि को राजनीतिक दक्षिणपंथ के नेहरू के रूप में पुनः प्रस्तुत करके इस विकट परिस्थिति का जवाब दिया है। इसको मौजूदा भाजपा नेता नरेन्द्र मोदी के विपरीत होना चाहिए था।

“भाजपा में एक कोंग्रेसी व्यक्ति” के रूप में या “हृदय से एक समाजवादी” के रूप में वाजपाई का पुनःस्थापन वास्तव में अटल बिहारी वाजपाई और उनके सभी मायनों के लिए एक विरूपण है।

आइये इस मिथक के साथ प्रारंभ करते हैं जब दुष्प्रचार किया गया था कि सत्ता में आरोहण और प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान वाजपेई ने अपने राजनीतिक विरोधियों से समर्थन और शुभकामनांए प्राप्त की थीं। जिस दिन से वह प्रधानमंत्री पद के एक वैध दावेदार बने थे और भाजपा ने एक बड़ी राष्ट्रीय पार्टी बनाने की ओर अपने कदम बढ़ा दिये थे उस दिन से वाजपाई गली-गलौच, अपशब्दों और उपहास के उसी स्तर पर आ गए थे जिस स्तर पर आज नरेंद्र मोदी हैं। कॉंग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा शर्मनाक गाली-गलौच के एक रिवाजी दौर के बाद वाजपाई द्वारा सोनिया गांधी को दिये गए दिलचस्प जवाब का वीडियो कोई भी यूट्यूब पर देख सकता है।

प्रधानमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान, विपक्ष ने उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाने, उनके स्वास्थ्य के बारे में अफवाह फैलाने और उनके निजी जीवन के बारे में टिप्पणी करने की हद भी पार कर दी थी। यहां तक कि 2004 के अंत में कार्यालय से इस्तीफा देने और सेवानिवृत्ति के बाद भी, लालू प्रसाद यादव ने उन्हें ऑन रिकॉर्ड ‘भारत का अंतिम फासीवादी शासक’ कहा था। जाना-पहचाना लगता है?

दरअसल, वाजपेयी के प्रति भारत की ‘धर्मनिरपेक्ष’ राजनीतिक जनता के दिल में यह बदलाव उनकी पूर्ण सेवानिवृत्ति के बाद आया जब नरेन्द्र मोदी की छाया 7 आरसीआर पर दिखाई देने लगी और भाजपा के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को एहसास हुआ कि बेहद लोकप्रिय वाजपाई से भाजपा में उनके संभावित उत्तराधिकारीयों को अलग करना राजनीतिक पूंजी थी। यह श्रेय वाजपेयी को जाता है कि निरंतर दुर्व्यवहार और तानों के बावजूद, उन्होंने अपने विरोधियों से निपटने के दौरान उन्होंने खुद को संयमित रखा और विशालहृदयता से उनका सामना किया।

वामपंथी बुद्धिजीवियों द्वारा वाजपाई के चरित्रचित्रणों में से एक चित्रण था कि वाजपाई हृदय से एक वामपंथी-उदारवादी थे जो किसी तरह से भाजपा और आरएसएस से बंधे थे लेकिन उनका झुकाव दूसरी तरफ था। यह फिर से, सच्चाई से परे है।

वास्तव में, वाजपेयी भाजपा के बहुत ही सर्वोत्कृष्ट राजनीतिज्ञ थे। जबकि वह निश्चित रूप से एक उदार दिल वाले व्यक्ति थे लेकिन वह वामपंथी नहीं थे। उनका उदारवाद, भारत के अधिकांश मीडिया अभिजात वर्ग द्वारा प्रचारित उन्मत्त, उग्र अनीश्वरवाद से बहुत अलग था। यह कांग्रेस पार्टी के तथाकथित धर्मनिरपेक्ष उदारवाद (जिसे ईमानदारी से केवल अल्पसंख्यक तुष्टीकरण और डर की सौदेबाजी के रूप में जाना जा सकता है) से भी अलग था। वाजपेयी बहुसंख्यक भारतीयों के लिए उदारवादी थे। वह अत्यंत धार्मिक थे और उन लोगों के लिए सहिष्णु थे, जो अन्य अस्थाओं के अनुयायी थे। असल में, यही मुख्य कारणों में से एक था कि भारतीय जनता इनसे इतना प्यार करती थी।

हमें यह बात भी नहीं भूलनी चाहिए कि वाजपेई ने आरएसएस के एक निष्ठावान सदस्य के रूप में अपने जीवन का एक लंबा समय बिताया है। उन्हें परिवार की विचारधारा वाली शिक्षा दी गई और वह इस पर कायम रहे यहाँ तक कि तब भी, जब जनसंघ तथा भाजपा की सरकार दिल्ली के आस-पास भी नहीं थी। राम जन्मभूमि आंदोलन के माध्यम से भाजपा की उत्पत्ति और आकस्मिक रूप से इसका सत्ता में आना वाजपेई तथा आडवाणी की वैचारिक परिवारों के प्रति प्रतिबद्धता का ही नतीजा था।

किसी भी प्रधानमंत्री पद के सबसे नाज़ुक नीति क्षेत्रों, अर्थव्यवस्था और विदेशी संबंध दोनों में, वह उतने ही यथार्थवादी थे जितना कोई भी भारतीय प्रधानमंत्री हो सकता है।

1999 में दूसरी बार शपथ ग्रहण करने के बाद, उन्होंने पोखरण परमाणु परीक्षण आयोजित करके नरसिम्हा राव सरकार की परमाणु नीति जारी रखी। उनकी सरकार पिछले दशक की गैर-गठबंधन विदेश नीति के बंधनों को तोड़ने वाली पहली सरकार थी। ब्रजेश मिश्रा की कुशल सहायता से, दुनिया में दो सबसे शक्तिशाली लोकतंत्रों के बीच रणनीतिक साझेदारी की नींव रखते हुए उन्होंने भारत-अमेरिकी संबंधों को अगले स्तर तक पहुँचाया।

आर्थिक स्तर पर, वाजपेयी ने आर्थिक उदारीकरण के सबसे अच्छे समय का नेतृत्व किया है जिसे देश ने देखा है – जो कि इस बात से बिलकुल भिन्न है यदि कोई ऐसी अपेक्षा ‘समाजवादी हृदय’ वाले प्रधानमंत्री से करे। नरसिम्हा राव ने शायद 1991 में ही औपचारिक रिबन काट दिया होता, लेकिन वाजपेई के इन छः वर्षों के कार्यकाल ने वास्तव में अर्थव्यवस्था को स्वतंत्र बनाने का कठोर आधारभूत कार्य किया और 8 प्रतिशत विकास दर की नींव रखी जिससे यूपीए को भी लाभ हुआ। वास्तव में, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) और अन्य सरकारी एजेंसियों के निजीकरण का उनका रिकॉर्ड ऐसा है कि नरेंद्र मोदी सरकार, जिसे कुछ भी कहा जा सकता है लेकिन इसकी प्रवृत्ति के कारण इसे समाजवादी नहीं कहा जा सकता, भी इसकी बराबरी नहीं कर सकती है।

यह एक बहुत बड़ी राजनीतिक विडंबना है कि एक समय जब बुद्धिजीवियों में कांग्रेस और उनके दोस्तों ने भाजपा द्वारा सरदार पटेल, मदन मोहन मालवीया और लाल बहादुर शास्त्री की विरासतों के सह-चयन पर, बहुत हँगामा किया था, वे वाजपेयी को उनके वास्तविक राजनीतिक झुकाव से अलग करने के धूर्त प्रयासों में लगे हुए थे।

शायद यह एक बहुत बड़ी समस्या का संकेत है जिसका कांग्रेस और राजनीतिक वामपंथ सामना करता है – यानी आधुनिक राजनीतिक प्रतीक व्यक्तियों की पूर्ण कमी। राजनीतिक दक्षिणपंथ पिछले दो दशकों के भारत के दो सबसे लोकप्रिय राजनेताओं का दावा कर सकती है। हालांकि, ऐसा प्रतीत होता है कि उनके प्रतिद्वंद्वी की प्रतीकात्मकता इंदिरा गांधी के बाद समाप्त हो गई है। पिछले कुछ सालों में हुए हर चुनाव के नतीजों ने गांधी करिश्मा को कम किया है। नरसिम्हा राव पिछले दो दशकों में एकमात्र ऐसे कांग्रेसी नेता हैं जिनकी स्थायी विरासत का दावा किया जा सकता है, लेकिन कांग्रेस ने उनको ऐसा कोई स्थान नहीं दिया है।

अटल बिहारी वाजपाई को एक वामपंथी, समाजवादी वाजपेयी की छवि देने के लिए यह एक कारण हो सकता है। दुर्भाग्यवश उनके लिए, भाजपा अपने प्यारे अटलजी को आसानी से नहीं जाने देगी जैसे कांग्रेस ने अपने सरदार पटेल को जाने दिया था।

प्रफुल शंकर लंदन आधारित आईटी स्ट्रेटेजी कंसल्टेंट हैं। उन्होंने लंकास्टर विश्वविद्यालय से इंटरनेशनल बिजनेस एंड एडवांस स्ट्रेटेजिक थिंकिंग से एमबीए किया है। वह @ShankarPraful पर ट्वीट करते हैं।