राजनीति
त्रिपुरा की कम-प्रचारित ड्रग्स के खिलाफ लड़ाई उत्तेजक हो रही
त्रिपुरा की कम-प्रचारित ड्रग्स के खिलाफ लड़ाई उत्तेजक हो रही

प्रसंग
  • ड्रग्स का खतरा, जिसमें इस की खेती, तस्करी और खपत (उपयोग)शामिल हैं,पहले त्रिपुरा में अनियंत्रित थी, इस पर अब पुलिस सख्त कार्यवाही कर रही है क्योंकि राज्य के मुख्यमंत्री स्वयं इसे जड़ से उखाड़ने में लगे हुए हैं

त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन द्वारा किए गए सबसे महत्वपूर्ण चुनाव से पहले के वादों में से एकतत्कालीन सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के वाम मोर्चा के संरक्षण के तहत चल रहेसभी अपराध गुटोंपर सख्त कार्यवाही करना था। भाजपा के विजन दस्तावेज (जो एक विशेष संगठन, उत्पाद या सेवा के लिए एक आकर्षक विचार या मूल्य या भविष्य की स्थिति का वर्णन करता है), जो चुनाव से पहले जारी किया गया था, ने घोषित किया कि इन अपराध सिंडिकेट्स के लिए सहिष्णुता बिल्कुल नहीं होगी।

सबसे शक्तिशाली अपराध सिंडिकेट्स में से एक दवा उत्पादक संघ था, जो कथित रूप से सीपीआई (एम) द्वारा संरक्षित था और जिसका संचालन त्रिपुरा में हो रहा था, जो विशेषकर उच्च बेरोजगारी वाला, गरीबी से पीड़ित और पिछड़ा राज्य है। इस साल मार्च की शुरुआत में सत्तारूढ़ होने के बाद से, अपने वादे केपक्के भाजपा-स्वदेशी पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा गठबंधन ने ड्रग्स उत्पादकों और गुटोंके खिलाफ सख्त कार्यवाही की है। लगभग एक लाख किलाग्राम से अधिक गांजा और भांग, 5000 किलोग्राम से अधिक हेरोइन और ब्राउन शुगर, कफ सीरप की लगभग दो लाख बोतलें, और लाखों रूपए की डॉक्टरों द्वारा सुझाई जाने वाली नशीली दवाओं के साथ साथ दर्दनिवारक दवाओं को जब्त कर लिया गया है। 300 से अधिक व्यक्तिगिरफ्तार किए जा चुके हैं, जिनमें से अधिकतर लोगों के सीपीआई (एम) के साथ मजबूत संबंध हैं।

लेकिन, त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब, जिनके पास गृहमंत्रालय भी है, ने बताया कि ड्रग्स और ड्रग्स उत्पादक संघों के खिलाफ लड़ाई अब शुरू हो गई है। देब ने बताया, “जो भी हासिल किया गया और जब्त किया गया वह तो एक छोटा नमूना है। यह लड़ाई लंबी चलेगी क्योंकि दवा तस्करों को बड़ी ताकत का संरक्षण प्राप्त है। त्रिपुरा नशीली दवाओं की तस्करी का मुख्य केंद्र बन चुका था और यह म्यांमार से आने वाली दवाओं के साथ-साथ बांग्लादेश में अवैध रूप से जाने वाली दवाओं के लिए एक केंद्रबिंदु बन चुका था। इस फायदेमंद व्यापार में राजनेता और पुलिसकर्मी शामिल थे।लेकिन हमनेड्रग्स उत्पादक संघों को मटियामेट करने और इस व्यवसाय, जो आतंकी संगठनों को भी धन पहुंचाता है, को जड़ से उखाड़ फेंकने की ठान ली है।” नशीली दवा उत्पादकों को तबाह करनेमें उनकी व्यक्तिगत रुचि हैऔर इसके लिए उन्होंने एक विशेष जांच टीम गठित की है जिसमें भरोसेमंद वरिष्ठ पुलिस अधिकारी शामिल हैं, जो ड्रग्स उत्पादकों को ढूढ़ निकालेंगे।

तीन आयाम

त्रिपुरा में नशीली दवा व्यापार के तीन आयाम हैं।पहला है, राज्य के व्यापक हिस्सों में गांजा (कैनबिस) की व्यापक खेती। दूसरा, म्यांमार से देश के अन्य हिस्सों में हेरोइन और अन्य काफी महंगी नशीली दवाओं के परिवहन के लिए एक केंद्र के रूप मेंत्रिपुरा का उपयोग किया जाना। और तीसरा है, त्रिपुरा से बांग्लादेश तक कफ सीरप, दर्दनाशक दवाओं, और डॉक्टरों द्वारा सुझाई जाने वाली अन्य नशीली दवाओं का अवैध निर्यात।

कोलकाता में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) के पूर्वी क्षेत्रीय मुख्यालय के अधिकारियों के मुताबिक,त्रिपुरा में गांजा भांग (कैनबिस) का उत्पादन किया जाता है, जिसकी कीमत लगभग 150 करोड़ रुपये है। म्यामांर, जो कि अफगानिस्तान के बाद नशीले पदार्थों का सबसे बड़ा उत्पादक है, से हेरोइन तथा अफीम तथा इसके जैसे अन्य मादक पदार्थों की तस्करी त्रिपुरा में होती है और समुद्री और हवाई मार्गों से अन्य देशों को आगे के निर्यात के लिए बांग्लादेश पहुंचाए जाने से पहले इन्हें यहाँ पर इकट्ठा किया जाता है। इन दवाओं का एक महत्वपूर्ण भाग असम, बंगाल और बिहार के माध्यम से नेपाल और पूरे भारत मेंसड़क मार्ग द्वारा भी पहुंचाया जाता है।एनसीबी के विशेषज्ञों का कहना है कि यह व्यापार 2,000 करोड़ रुपये से अधिक का है।

तीसराव्यापार है-कफ सीरप और अन्य नशीली दवाओं की आपूर्तिजो काफी लाभ प्रदान करता है और जिसने बांग्लादेश को अपनी गिरफ्त में ले लिया है- यह व्यापार 600 करोड़ रुपये से 700 करोड़ रुपये का है। बांग्लादेश, जो कि एक मुस्लिम राष्ट्र है, में ऐल्कोहल (शराब) पर प्रतिबंध लगा दिया गया है और यहाँ के लाखों युवा मानसिक उत्साह पाने के लिए कफ सीरप, दर्दनिवारक दवा और अन्य दवाओं के आदी हो गए हैं।

कैनबीस (गांजा या भांग)

मुख्यमंत्री देब कहते हैं कि अभी तक राज्य में एक लाख किलोग्राम कैनबिस का उत्पादन किया जा रहा था।और उन्होंने राज्य में गांजा की खेती स्वीकार करने और यहाँ तक कि इसे प्रोत्साहित करने के लिए सीपीआई (एम) को दोषी ठहराया। देब ने कहा, “सम्पूर्ण राज्य में बड़े भू-भाग और यहाँ तक कि माणिक सरकार (भूतपूर्व मुख्यमंत्री) के निर्वाचन क्षेत्र में भी गांजा की खेती होती थी। मैं यह माननेसे इनकार करता हूं कि वह (सरकार) इसके बारे में कुछ भी नहीं जानते थे।वास्तव में, सीपीआई (एम) गांजा की खेती को प्रोत्साहित करती रहती थी और गांजा की बिक्री से प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त करती रहती थी। (इसे और इस रिपोर्ट को पढ़ें)

भाजपा की अगुवाई वाली मौजूदा सरकार केसत्ता में आने के बाद गांजे की खेती के खिलाफ सख्त कार्यवाही कीगई।इसनेउन हजारों किसानों को दैनिक मजदूर के रूप में काम करने के लिएअन्य राज्यों में स्थानांतरित होने के लिए मजबूर कर दिया हैजोगांजेसेअपनाव्यापारचलातेथे (इस रिपोर्ट को पढ़ें)। बिडंबना है कि राज्य ने किसानों को अन्य फसलों की खेती करने के लिए समर्थन और सब्सिडी की घोषणा की(इस रिपोर्ट को पढ़ें)!राज्य भाजपा प्रवक्ता मृणाल कांति देब ने कहा, “यह सब सिर्फ यह दिखाने के लिए शुरू किया गया है कि गांजा की खेती कितनी व्यापक थी।हजारों किसान अपनी खेती पर निर्भर थे और करीब दस हजार लोग गांजे की कटाई, ढुलाई और उपभोक्ताओं तक पहुंचाने जैसे कामों में व्यस्त थे। यह एक फायदेमंद व्यवसाय था और सीपीआई (एम) ने इसे न केवल इसलिए प्रोत्साहन और संरक्षण दिया कि इससे लाभ मिलता है बल्कि इसलिए भी कि गांजाकी अवैध खेती और व्यापार उन लाखों लोगों के लिए आजीविका का स्रोत था जिन्हें सीपीआई (एम) आजीविका और नौकरी का वैध साधन नहीं प्रदान कर सकी थी।”

देब का यह कथन सत्य है। त्रिपुरा में जमीन की स्थिति पर पिछले साल के अंत में स्वराज्यद्वारा प्रकाशित इस व्यापक रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि सीपीआई (एम) बहुत ही गरीब किसानों को गांजा की खेती करने के लिए प्रोत्साहित करती रही है। रिपोर्ट का कुछ अंश प्रस्तुत है, “विपक्षी राजनेताओं का कहना है कि इस तरह से तीन चीजें बहुत ही कमजोर हो गईं।गरीब/साधनहीन ग्रामीण अपनी कमाई में वृद्धि से खुशहाल थे; गांजा की बिक्री से प्राप्त धन का एक हिस्सा सत्तारूढ़ पार्टी के खजाने में जा रहा था;और सीपीआई (एम) ने ग्रामीणों पर यह शिकंजा कसा कि जो भी पार्टी की नीतियों का अनादर करेगा उसे गांजा की खेती करने के अपराध में पुलिस से गिरफ्तार करवा दिया जाएगा।”

मुख्यमंत्री देब ने जोर देकर कहा कि उन्होंने त्रिपुरा से भांग/गांजे की खेती, और व्यापार कोरोकने का दृढ़ संकल्प लिया है।देब ने कहा “लाखों युवा इन नशीले पदार्थों के शिकार हो गए थे और धीरे-धीरे हमारा समाज नष्ट हो रहा था।सीपीआई (एम) इसकी बिल्कुल परवाह नहींकरती थी और उसकी एकमात्र चिंता सत्ता में बने रहना था। मैंने एक लक्ष्य निर्धारित किया है कि इस वर्ष के अंत तक, त्रिपुरा में जमीन के किसी भी हिस्से परभांग/गांजेका पौधा नहीं होना चाहिए।अवैध ड्रग बिजनेस में शामिल पुलिस अधिकारियों सहित कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है और कई और लोग सलाखों के पीछे जाएंगे।”

बांग्लादेश के लिए ड्रग्स की तस्करी

त्रिपुरा में अधिकांश दवा भंडारतीन प्रकार की चिकित्सकीय दवाएं – ओपियोइड्स (दर्दनाशक जिनमें कोडेन और मॉर्फिन होता है), केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (सीएनएस) अवसादक, चिंता और नींद विकारों का इलाज करने के लिए(डायजेपाम, अल्प्राजोलम, आदि) उपयोग किया जाता है, और उत्तेजक (जैसे डेक्स्ट्रोएम्फ़ेटामीन, मिथाइलफेनाडेट, और ऐम्फिटेमिनऔर डेक्स्ट्रोएम्फ़ेटामीन का संयोजन), अस्थमा, अवसाद, तंद्रालुता, ध्यान आभाव विकार, और ध्यान आभाव सक्रियता विकार का इलाज करने के लिए इस्तेमाल कियाजाता है – अवैध रूप सेबिना पर्चे के बेचते हैं। इन्हें अलग-अलग या कॉकटेल के रूप में लेते हुए,  व्यक्ति को असीमआनंद मिलता है  जो नशीली दवाओं की लत का कारण बनता है।

वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा कि ज्यादातर दवा कंपनियां इस रैकेट में शामिल हैं, या इससे अवगत हैं और इससे लाभ उठा रही हैं। अधिकारी ने कहा “त्रिपुरा की आबादी लगभग 44.5 लाख है, लेकिन भारतीय फार्मा कंपनियां इस छोटे राज्य में400 करोड़ रुपये से अधिक कीपर्चे वाली दवाओं की बिक्री दर्ज करती हैं।इस आंकड़े के अनुसार, त्रिपुरा में पर्चे वाली दवाओं की प्रति व्यक्ति खपत 900 रुपये प्रति वर्ष से अधिक है,जो देश में सबसे ज्यादा है।और हम इन आंकड़ों में सरकारी स्वास्थ्य देखभाल संस्थानोंद्वारा वितरित, जिनपर राज्य के अधिकांश लोग निर्भर करते हैं, और सीधे प्राप्त की गई दवाओं की बात नहीं कर रहे हैं। यह आंकड़ा असाधारण रूप से बहुत बड़ा और अवास्तविक है और यह स्पष्ट है कि दवा भंडार, डीलर, स्टाकिस्ट, और थोक विक्रेता उनको अवैध रूप सेबिना पर्चे के दवाईयां बेचने और बांग्लादेश में तस्करी करने के लिए,इतनी बड़ी मात्रा में दवाएं प्राप्त करते हैं।हम अनुमान लगाते हैं कि राज्य में 200 करोड़ रुपये से 300 करोड़ रुपये तक की ऐसी दवाएंअसम के माध्यम से देश के अन्य हिस्सों से उचित दस्तावेजों के बिना आती हैं।”

बांग्लादेश में मीडिया की रिपोर्टें प्राप्त हुई हैं जिनमें पर्चे वाली दवाओंकी तस्करीरोकने के लिए ठोस कदम नाउठानेपर भारत की आलोचना की गई है। दोनों देशों के नेताओं के बीच वार्ता के दौरान भी मामला सामने आया है। ढाका मांग कर रहा है कि त्रिपुरा राज्य के अधिकारियों और भारतीय सीमावर्ती रक्षक (सीमा सुरक्षा बल) त्रिपुरा से बांग्लादेश में आने वाली पर्चे वाली दवाओं पर रोक लगा दें।

भाजपा प्रवक्ता देब ने कहा “ऐसा नहीं है कि पिछली सरकार को इस बारे में कुछ नहीं पता था।लेकिन उन्होंने इससेभांग/गांजे की खेती कीतरहहीफायदाउठानेकेलिये प्रोत्साहित किया:इस अवैध व्यापार ने सत्तारूढ़ पार्टी की तिजोरियों को खजाने से भर दिया और उन पुरुष और महिलाओं के लिए (अवैध) आजीविका का साधन प्रदान किया, जो सरकारी नौकरी और व्यावसाय करने में नाकाम थे।”

हाल ही के महीनों में बांग्लादेश ड्रगले जा रहेकई लोग पकड़े गए हैं और पुलिस अधिकारियों का कहना है कि इनमें से अधिकतर गिरफ्तार हुए लोगों का सीपीआई(एम) के साथ मजबूत संबंध हैं या वे पार्टी के कार्यकर्ता हैं।प्रवक्ता देब ने दावा किया, “जोड्रग तस्करी अबपकड़ी जा रहीवह पहले नहींनजरमेंआती थी क्योंकि पुलिस को सीपीआई (एम) नेताओं द्वारा ड्रग बेचनेवालीगाड़ियोंकेपीछे जाने की इजाजत नहीं थी या वेखुदजानानहींचाहतेथे।अब जब हमारे मुख्यमंत्री (बिपलब देब) ने पुलिस को सख्त निर्देश जारी किए हैं और उन्हें नशीली दवाएं बेचने वाला समूहों पर कड़ी कार्यवाही करने लिए पूरी आजादी दे दी है, तो पुलिस अब इन गिरोहों का पर्दाफाश कर रही है।”

बीएसएफ ने बांग्लादेश को ले जायी जाने वाली दवाओं को पकड़ने में अधिक सफलता दर्ज की है।हालांकि सीमा सुरक्षा बल आधिकारिक तौर पर कहता है किऐसा केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा आदेशित अंतरराष्ट्रीय सीमा के साथ बढ़ी सतर्कता के कारण है, वरिष्ठ बीएसएफ अधिकारी निजी तौर पर स्वीकार करते हैं कि राज्य पुलिस द्वारा उठाए गए ठोस कदमों के कारणअब उन्हें ड्रग तस्करों को ढूंढ़कर पकड़ने में प्रोत्साहन मिला है।राज्य के पश्चिमी सिपाहिजाला जिले में भारत-बांग्लादेश सीमा की रक्षा करने वाले बीएसएफ बटालियन के कमांडेंट ने कहा, “पहले, हम जानते थे कि ड्रग तस्कर और सामान जो हम पकड़ेगे और राज्य पुलिस को सौंपेंगे वह बाद में स्थानीय राजनेताओं के आदेश पर छोड़ दिया जाएगा। अब हम जानते हैं कि तस्करों को गंभीर रूप से दंडित किया जाएगा, और इसलिए हम इस तस्करी की जांच में भी बहुत सक्रिय हो गए हैं।”

हालांकिसीपीआई (एम) के राज्य प्रवक्ता गौतम दास ने, अपनी पार्टी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को खारिज कर दिया और कहा कि लगातार वाम मोर्चा सरकारों ने नशीली दवाओं के खतरे से निपटने के लिए अपनी पूरी कोशिश की है।उन्होंने इंगित किया कि वाम मोर्चा के शासनकाल के दौरान भी पुलिस नशीली दवाओं के तस्करो को गिरफ्तार करती और अवैध दवाओं को जब्त करती थी।दास ने कहा, “ऐसा नहीं है कि अचानक दवाओं को जब्त किया जाने लगा है और नशीली दवाओं के तस्कर अब गिरफ्तार किए जा रहे हैं।” दास ने यह भी कहा, “त्रिपुरा में दवा का खतरा उन दिनों से है जब कांग्रेस सत्ता में थी।कांग्रेस नेताओं ने नशीली दवाओं के छल्ले और कार्टेलों को संरक्षित करना शुरू कर दिया।विधानसभा चुनावों से पहले वे कांग्रेसी नेता भाजपा में शामिल हो गए।इसलिए बीजेपी परइस रैकेट में शामिल होने का आरोप नहीं है।

हालांकि, यह उल्लेख किया जाना चाहिए कि राज्य में वाम मोर्चा शासन के दौरान अवैध दवाओं की वसूली महत्वहीन थी।उदाहरण के लिए, 2017 में, पुलिस ने केवल 20 किलोग्राम भांग और खांसी सिरप की 118 बोतलों को जब्त किया थाऔर सिर्फ दो लोगों को गिरफ्तार किया गया था। वर्ष 2016 मेंयह आंकड़े आठ गिरफ्तारियों के साथ 23 किलोग्राम भांग और खांसी सिरप की 200 बोतलें थीं।

म्यांमार से ड्रग्स

म्यांमार में उत्पादित हेरोइन एवं अफीम जैसे अन्य यौगिकों के साथ ही उस देश में उत्पादित क्रिस्टल मेथेम्फेटामाइन जैसे सिंथेटिक ड्रग्सने भी मिजोरम और मणिपुर के माध्यम से त्रिपुरा में अपना रास्ता तलाश लिया।एनसीबी के अधिकारियों के अनुसार त्रिपुरा के माध्यम से म्यांमार परागमन से 1000 करोड़ रुपये केड्रग्स का अनुमान लगाया गया है (और अधिकारियों का कहना है कि यह एक रूढ़िवादी अनुमान है)।पिछले 15 वर्षों में म्यांमार में उत्पादित ड्रग्स के पारगमन के लिए त्रिपुरा उभर कर सामने आया है, एनसीबी के अधिकारियों ने बताया कि इन ड्ग्स का परिवहन अन्य मार्गों के बाद थाईलैंड और दक्षिण-पश्चिमी म्यांमार से ही गहन चौकसी के साथ हुआ था।

“ड्रग तस्करों को अब भारत में अपने सामानों को खिसकाना आसान लगता है जहाँ सतर्कता में लापरवाही है।मणिपुर और मिजोरम की घनी जंगली अंतर्राष्ट्रीय सीमा म्यांमार के साथ जुड़ी हुई हैऔर तथ्य यह है कि म्यांमार में उस क्षेत्र के बड़े इलाके नशीली दवाओं के मालिकों और विद्रोहियों के नियंत्रण में हैं जिन पर म्यांमार सेना का नियंत्रण कम है, जो सीमा को पार करके नशीली दवाओं की तस्करी को आसान बनाता है। ड्रग्स का सामान मिजोरम और मणिपुर में उतरने के बाद तुरंत त्रिपुरा के लिए जमीनी मार्ग से ले जाया जाता है, जहाँउसे सुरक्षित घरों में रखा जाता है और फिर बांग्लादेश में तस्करी किया जाता है जहाँ से माल समुद्री मार्ग और वायु मार्ग के माध्यम से अन्य देशों में भेज दिया जाता है।इन तस्करी किए गये ड्रग्स का एक बड़ा हिस्सा असम और बंगाल के माध्यम से नेपाल में स्थानीय मांग को पूरा करने के लिए और अन्य देशों को हवाई मार्ग द्वारा परिवहन के लिए भी पहुँचाया जाता है।कोलकाता में ब्यूरो के (एक डिप्टी डायरेक्टर जनरल की अध्यक्षता वाले)क्षेत्रीय कार्यालय के वरिष्ठ एनसीबी अधिकारियों ने कहा, “ऐसा इसलिए है क्योंकि नेपाल और बांग्लादेश दोनों में, माल की जाँच (हवाई अड्डों पर दोनों देशों में और समुद्री बंदरगाहों के मामले में बांग्लादेश में) बहुत ढीली है और कस्टमएवं अन्य अधिकारियों को रिश्वत देना आसान है।”एक बार फिर, इस ड्रग्स व्यापार को पिछली सत्तारूढ़ व्यवस्था द्वारा समर्थन दिया गया था, लोकिन सीधे तौर पर उनकी भगीदारी नहीं थी। भाजपा प्रवक्ता देब ने कहा,”उनके (सीपीआई (एम) नेताओं के) संरक्षण के बिना, त्रिपुरा में इस ड्रग तस्करी रैकेट का विकास नहीं हो सका।और यह मानना कि वे इससे लाभ नहीं उठाते, मूर्खता होगी।इसकी (म्यांमार से दवा तस्करी) शुरुआत रातोंरात नहीं हो सकी। सिर्फ इसी वजह से इस गिरोह का पर्दाफाश हो रहा है।”

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, जो ड्रग व्यापार पर छापा डालने वाली प्रवर्तन शाखा के कामकाज की निगरानी करते हैं, ने कहा कि जब तक नई सरकार सत्ता में नहीं आई,इस साल की शुरुआत तक म्यांमार से हेरोइन और सिंथेटिक ड्रग्स जैसेअधिक मूल्य वालेड्रग्स की रोकथाम के लिए बहुत कम काम किया गया था।पुलिस अधिकारी ने कहा, “पहली बार हमने ऐसेड्रग्स को जब्त करना और तस्करी करने वालों को गिरफ्तार करना शुरू किया है।”उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ने उन्हें ड्रग्स उत्पादकों की जाँच और छापा डालनेके स्वतंत्राप्रदान की थी और इन ड्रग्स उत्पादकों को समाप्त करने के लिए समय सीमा निर्धारित की है।

पूर्व मंत्री एवंपाजपा नेता रतन चक्रवर्ती के अनुसार, नशीली दवाओं की तस्करी करने वालों ने उनकापीछा करने के कारण मुख्यमंत्री देब को मारने की योजना बनाई है (इस रिपोर्ट को पढ़ें)।स्वराज्य से बात करते हुए चक्रवर्ती ने बताया कि देब के जीवन को इस खतरे के बारे में गृहमंत्री राजनाथ सिंह को जानकारी मिली है।चक्रवर्ती,जो कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए थे और राज्य में कांग्रेस की पिछली सरकारों में मंत्री थे, ने कहा,”ड्रग्स तस्करी करने वाले एवं अन्य गिरोह सीपीआई (एम) शासन के तहत विकसित हुए और इसमें मार्क्सवादियों का हाथ था। अक्सर वे ही मुख्य स्तम्भ थे।अब जब इन गिरोहों पर छापा डाला जा रहा है, तो वे धमकी दे रहे हैं।”उन्होंने बताया कि त्रिपुरा में ड्रग्स तस्करी और ड्रग्स गिरोहों की शुरुआत तब से हुई जब 1998 में माणिक सरकार ने राज्य की बागडोर संभाली थी।चक्रवर्ती ने कहा, “उस समय से, कई अपराध संघोंकी उत्पत्ति हुई थी और उनमें से ड्रग उत्पादक संघ सबसे प्रमुख और खतरनाक थे।”

मिशन

मुख्यमंत्री देब ने कहा कि त्रिपुरा को एक ड्रग्स मुक्त राज्य बनाना उन्होंनेअपना निजी मिशन बना लिया है।वह ड्रग्स के खिलाफ अभियान चला रहे हैं और पुलिस जाँच एवं ड्रग उत्पादकोंतथा तस्करों के खिलाफ कार्रवाई की निगरानी कर रहे हैं (इस रिपोर्ट को पढ़ें)।उनके सहयोगियों का कहना है कि प्राथमिक कारण यह है कि मुख्यमंत्री फिटनेस के लिए एक बहुत ही जागरुक व्यक्ति हैं जो रोजाना व्यायाम करते हैं और उत्साहपूर्वक स्वस्थ जीवन की वकालत करते हैं।एक करीबी सहयोगी ने कहा, “इस प्रकार, ड्रग्स के खिलाफ यह कड़ी कर्रवाई उनका निजी मिशन है, जो उनके दिल के करीब है।”

मुख्यमंत्री देब हर उपलब्ध सार्वजनिक मंच से ड्रग्स के खतरे के बारे में बात करते रहते हैं और सार्वजनिक रूप से दोहराते रहते हैं कि ड्रग्स के खिलाफ लड़ाई पूरी ताकत के साथ जारी रहेगी जब तक कि त्रिपुरा से खतरे समाप्त नहीं हो जाते। ड्रग्स के खिलाफ त्रिपुरा की लड़ाई की सूचना है, यद्यपि यह लड़ाई अभी कमजोर है।लेकिन, जैसा कि देब कहते हैं, ड्रग्स के खिलाफ युद्ध लंबे समय के लिए तैयार किया जाएगा और अपने प्रचार के लिए नहीं किया जा रहा है। वे कहते हैं, “यह एंटी-ड्रग्स धर्मयुद्ध त्रिपुरा के भविष्य और राज्य के युवा लोगों के लिए है।”

जयदीप मजूमदार ‘स्वराज्य’ के एक सहयोगी संपादक हैं।