राजनीति
तीन तलाक़ विधेयक- भाजपा की राजनीति के बावजूद आलोचकों के पास कोई ठोस वजह नहीं

आशुचित्र-

  • जिस तरह एक पुरुष महिलाओं के समूह में महिलाओं द्वारा निर्धारित नियमों के अलावा प्रवेश करना चाहे तो इसे भेदभाव नहीं कहा जा सकता। सबरीमाला प्रवेश नियम इसी वर्ग में आते हैं।
  • सबरीमाला मुद्दे में व्याप्त भेदभाव तथा तीन तलाक़ में व्याप्त भेदभाव की तुलना करना अनुचित है।

नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) का तीन तलाक़ बिल जिसे मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक 2018 कहा जाता है, लोकसभा में 27 दिसंबर को बहुमत से पास हो गया लेकिन राज्यसभा में इसके विरोध की अधिक संभावनाएँ हैं जहाँ बड़ी संख्या में सांसद इसके विरोध में हैं।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तीन तलाक़ को अमान्य करार दिए जाने के बाद इस विधेयक की आवश्यकता पड़ी थी। कानूनी तौर पर अदालत द्वारा किसी बात को गैर-कानूनी घोषित कर देने का तात्पर्य यह नहीं कि उसके लिए किसी कानून की आवश्यकता नहीं है। अदालत मूल्यों का समर्थन करती है लेकिन कानून को बेहतर तरीके से बनाना विधान मंडल के हाथ में है जिससे वकीलों, पुलिस तथा निचली अदालतों को मुद्दे को समझने में स्पष्टता रहे।

कहा जा सकता है कि इसमें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का राजनीतिक उद्देश्य है तथा वह बिल पास करवा कर केवल यह दिखाना चाहती है कि उसके विपक्षी दल मात्र अल्पसंख्यकों के ही शुभचिंतक हैं। उसी दाँव पर विपक्ष भी अल्पसंख्यकों के वोट की राजनीति कर रहा है। यदि संपार्श्विक कारणों से सरकार बिल को जल्द ही पारित करवाना चाहती है तो इसमें विपक्ष की बिल को संयुक्त चयन समिति द्वारा परखे जाने की मांग केवल प्रक्रिया में देरी करने का तरीका है। इसमें दोनों ही राजनीति कर रहे हैं।

बिल के वर्तमान रूप के विरोध में सबसे मज़बूत तर्क एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी द्वारा उठाया गया है। उनके अनुसार जब अदालत समलैंगिकता तथा व्यभिचार को अपराध मुक्त बता रही है ऐसे में तलाक़ को अपराध युक्त नहीं बताया जा सकता। वर्तमान में जो विधेयक लोक सभा में पारित हुआ है उसके अनुसार तीन बार तलाक़ बोलकर तलाक़ देने वाले पुरुषों को जेल हो जाएगी तथा उन्हें पीड़ित महिला की सहमति अथवा दंपत्ती में सुलह के बाद ही ज़मानत दी जाएगी।

लेकिन विरोध पक्ष के तर्क अनुचित है- जब दहेज की माँग को गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया है तथा वयस्क पुरुष और नाबालिग महिला में सहमति के साथ बनाए गए यौन संबंध भी कानूनी तरीके से बलात्कार घोषित किया गया है। इसके बाद यह कहना प्रश्न खड़ा कर देता है कि केवल तीन तलाक़ को ही गैरकानूनी घोषित किया जा रहा है। समाज तथा रिवाज़ एक ही गुनाह को अलग नज़र से देखते हैं तथा एक ही समाज एक गुनाह को अलग-अलग समय पर अलग नज़रिए से देखता है। कुछ देशों में गांजा और भांग कानूनी रूप से सही है लेकिन कुछ देशों में इनके लिए मृत्युदंड का प्रावधान है।

अत: समाज की किसी चीज़ को कानूनी अथवा गैरकानूनी बनाने की इच्छा से कोई भी सख्त नियम नहीं बनाया जा सकता। जब मुस्लिम पुरुष समझने लगें कि यह इस्लामी कानून द्वारा दिया गया अधिकार है ऐसे में तीन तलाक़ को गैर-कानूनी क़रार देना गैर वाज़िब नहीं है। वहीं उसे गैर-कानूनी नहीं करार दिया जा सकता जब वही समाज स्वीकार करे कि तीन तलाक़ कोषेर नहीं है। जब धार्मिक ग्रंथों की उदार व्याख्याओं को अथवा रिवाज़ों की अनुचित प्रक्रियाओं को बड़े पैमाने पर स्वीकार किया जाए तब कानून बनाना सुलभ होता है।

विधेयक के विरोध में एक और तर्क है कि यह महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए नहीं बल्कि मुस्लिम पुरुषों को निशाना बनाने के उद्देश्य से लाया गया है। यदि हम यह तर्क स्वीकारते हैं तो हमें यह भी स्वीकारना होगा कि घरेलू हिंसा तथा बलात्कार के लिए बनाए गए कानून भी महिला को न्याय दिलाने से अधिक पुरुष को निशाना बनाते हैं। बलात्कार को ऐसी हरकत बताया जाता है जो केवल एक पुरुष एक महिला के साथ कर सकता है। लेकिन ऐसा नहीं है तथा कानून बलात्कार को अन्य यौन शोषण के बराबर नहीं रखता है और अधिनियम में लिंग के संदर्भ में निष्पक्ष रहता है। तो क्या बलात्कार का कानून पुरुषों को निशाना बनाने का उद्देश्य रखता है?

सर्वोच्च न्यायालय के सबरीमाला पर लिए निर्णय की तुलना इससे करने के भी प्रयास किए गए जिसे खुद भाजपा ने केरल में चुनौती दी है तथा तीन तलाक़ मुद्दे पर भाजपा कानून बनाना चाहती है।

लेकिन यह अनुचित तुलना है। पहला, सबरीमाला की प्रथा केवल उसी मंदिर में है न कि स्वामी अयप्पा के अन्य मंदिरों में। वहीं सबरीमाला में भी यह प्रतिबंध सारी महिलाओं के लिए नहीं अपितु केवल प्रजनन आयु वर्ग की महिलाओं के लिए है। यहाँ महिलाओं के लिए कोई सामान्यीकृत भेदभाव नहीं है जैसा कि दलितों के साथ दशकों पहले मंदिर में प्रवेश से रोकने के लिए होता था।

जिस तरह एक पुरुष महिलाओं के समूह में महिलाओं द्वारा निर्धारित नियमों के अलावा प्रवेश करना चाहे तो इसे भेदभाव नहीं कहा जा सकता। सबरीमाला प्रवेश नियम इसी वर्ग में आते हैं।

आलेख 26 संप्रदायों की विशेष प्रक्रिया के संरक्षण का अधिकार देता है और सर्वोच्च न्यायालय अयप्पा श्रद्धालुओं को संप्रदाय नहीं घोषित करने में निश्चित गलती कर रहा है। एकमात्र तथ्य कि अयप्पा के भक्तों का खुद को हिंदू मानना सच्चाई से दूर नहीं कर सकता कि हिंदू धर्म भिन्न रिवाजों तथा मान्यताओं का समूह है जिसका कोई भी लिखित कट्टरवाद नहीं है जो उन्हें एक धर्म में बांध सके। आप किसी भी जाति के हो सकते हैं तथा यह इस पर निर्भर नहीं करता कि आप किसे अपना इष्टदेव मानते हैं अथवा आप किसी विशेष ग्रंथ को ही अपना धर्मिक ग्रंथ कहते हैं।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।